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द्वा सुपर्णा — Word-by-Word Meaning

द्वा सुपर्णा

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

द्वा सुपर्णा
dvā suparṇā
दो सुन्दर पंखों वाले पक्षी
सयुजा
sayujā
घनिष्ठ रूप से संयुक्त, सदा साथ रहने वाले, अभिन्न साथी
सखाया
sakhāyā
मित्र, सखा
समानं वृक्षम्
samānaṁ vṛkṣam
एक ही वृक्ष (एक ही शरीर, अथवा सांसारिक जीवन का वृक्ष)
परिषस्वजाते
pariṣasvajāte
वे आलिंगन करते हैं, बैठते हैं, लिपटे रहते हैं
तयोः अन्यः
tayoḥ anyaḥ
उन दोनों में से एक (जीवात्मा)
पिप्पलम्
pippalam
मीठा फल (कर्म का फल, सुख और दुःख)
स्वादु अत्ति
svādu atti
स्वादपूर्वक खाता है, मीठे (और कड़वे) फल का स्वाद लेता है
अनश्नन्
anaśnan
बिना खाए, भोग न करते हुए (दूसरा पक्षी नहीं खाता)
अन्यः
anyaḥ
दूसरा (परम आत्मा, ईश्वर, साक्षी)
अभिचाकशीति
abhicākaśīti
देखता रहता है, केवल साक्षी होता है, शान्त भाव से दीप्त रहता है

Complete Translation

दो सुन्दर पंखों वाले पक्षी, सदा साथ रहने वाले मित्र, एक ही वृक्ष पर बैठे हैं। उनमें से एक उस वृक्ष के मीठे फल को स्वादपूर्वक खाता है, और दूसरा बिना खाए केवल देखता रहता है। (एक पक्षी जीवात्मा है जो कर्मफलों का भोग करता है; दूसरा परमात्मा है जो साक्षीमात्र होकर शान्त भाव से देखता है।)

Origin & History

Source: Mundaka Upanishad, Verse 3.1.1 (also Shvetashvatara Upanishad 4.6)

Author: Traditional (Upanishadic)

Period: Vedic / Upanishadic

तीसरे मुण्डक को आरम्भ करते हुए ऋषि एक अविस्मरणीय चित्र अंकित करते हैं: स्वर्णिम पंखों वाले दो पक्षी, घनिष्ठ मित्र, एक ही वृक्ष पर बैठे हैं। एक उस वृक्ष के मीठे-कड़वे फल का स्वाद लेता है; दूसरा कुछ न खाते हुए शान्त वैभव में देखता रहता है। वृक्ष शरीर और अनुभव का जगत है; फल खाने वाला पक्षी जीवात्मा है जो सुख-दुःख में बँधा है, और केवल देखने वाला पक्षी परम आत्मा है। उपनिषद आगे कहता है कि जब शोकग्रस्त जीव उस दूसरे पक्षी — पूज्य ईश्वर — को देखता और उसकी महानता को जान लेता है, तब उसका शोक मिट जाता है — इस प्रकार यह चित्र मोक्ष का द्वार बन जाता है।

Frequently Asked Questions

द्वा सुपर्णा का क्या अर्थ है?
द्वा सुपर्णा का अर्थ है 'दो पक्षी'। यह श्लोक एक ही वृक्ष पर बैठे दो अभिन्न पक्षियों का वर्णन करता है: एक फल खाता है जबकि दूसरा केवल देखता है। यह कर्मफलों का भोग करने वाली जीवात्मा और शान्त वैराग्य से साक्षी रहने वाले परमात्मा का प्रतीक है।
द्वा सुपर्णा कहाँ से आया है?
यह श्लोक अथर्ववेद के मुण्डक उपनिषद (3.1.1) में आता है और श्वेताश्वतर उपनिषद (4.6) में भी पाया जाता है। यह सम्पूर्ण वेदान्त की सर्वाधिक प्रसिद्ध उपमाओं में से एक है।
दोनों पक्षी किसका प्रतिनिधित्व करते हैं?
मीठा-कड़वा फल खाने वाला पक्षी जीव है, वह व्यक्तिगत आत्मा जो सांसारिक अनुभव और उसके फलों में लीन है। बिना खाए केवल देखने वाला पक्षी परमात्मा है, परम आत्मा, अपरिवर्तनीय साक्षी। वे एक के ही निम्न और उच्च स्वरूप रूप में साथ रहते हैं।
अगले श्लोक का उपदेश क्या है?
मुण्डक आगे कहता है कि जब तक जीव स्वयं को 'भोक्ता' मानता है तब तक वह अपनी असहायता पर शोक करता है, किन्तु जब वह उस दूसरे पक्षी — पूज्य ईश्वर और अपने ही सच्चे स्वरूप — को देखकर उसकी महिमा को पहचान लेता है, तब वह शोक से मुक्त हो जाता है। इस प्रकार यह श्लोक आत्मज्ञान द्वारा मोक्ष की ओर संकेत करता है।

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