द्वा सुपर्णा — Word-by-Word Meaning
द्वा सुपर्णा
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
Complete Translation
Origin & History
Source: Mundaka Upanishad, Verse 3.1.1 (also Shvetashvatara Upanishad 4.6)
Author: Traditional (Upanishadic)
Period: Vedic / Upanishadic
तीसरे मुण्डक को आरम्भ करते हुए ऋषि एक अविस्मरणीय चित्र अंकित करते हैं: स्वर्णिम पंखों वाले दो पक्षी, घनिष्ठ मित्र, एक ही वृक्ष पर बैठे हैं। एक उस वृक्ष के मीठे-कड़वे फल का स्वाद लेता है; दूसरा कुछ न खाते हुए शान्त वैभव में देखता रहता है। वृक्ष शरीर और अनुभव का जगत है; फल खाने वाला पक्षी जीवात्मा है जो सुख-दुःख में बँधा है, और केवल देखने वाला पक्षी परम आत्मा है। उपनिषद आगे कहता है कि जब शोकग्रस्त जीव उस दूसरे पक्षी — पूज्य ईश्वर — को देखता और उसकी महानता को जान लेता है, तब उसका शोक मिट जाता है — इस प्रकार यह चित्र मोक्ष का द्वार बन जाता है।
Frequently Asked Questions
द्वा सुपर्णा का क्या अर्थ है?▼
द्वा सुपर्णा कहाँ से आया है?▼
दोनों पक्षी किसका प्रतिनिधित्व करते हैं?▼
अगले श्लोक का उपदेश क्या है?▼
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