द्वा सुपर्णा
अन्य नाम / खोज: dva suparna · dva suparna sayuja sakhaya · two birds on a tree · dvā suparṇā
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✦ अर्थ
द्वा सुपर्णा अर्थात् 'दो पक्षी', वेदान्त की सबसे सुन्दर और प्रसिद्ध उपमाओं में से एक है, जो मुण्डक और श्वेताश्वतर दोनों उपनिषदों में आती है। दो शाश्वत मित्र पक्षी एक ही वृक्ष पर बैठे हैं — एक वृक्ष के मीठे-कड़वे फल खाता है, दूसरा शान्त भाव से केवल देखता है। फल खाने वाला पक्षी जीवात्मा है जो अनुभव और कर्मफल में बँधा है, और देखने वाला पक्षी परमात्मा है; जब जीव उस शान्त साक्षी को देखकर उसे अपना ही स्वरूप पहचान लेता है, तब मोक्ष होता है।
उत्पत्ति और कथा
Mundaka Upanishad, Verse 3.1.1 (also Shvetashvatara Upanishad 4.6) · Traditional (Upanishadic) · Vedic / Upanishadic
तीसरे मुण्डक को आरम्भ करते हुए ऋषि एक अविस्मरणीय चित्र अंकित करते हैं: स्वर्णिम पंखों वाले दो पक्षी, घनिष्ठ मित्र, एक ही वृक्ष पर बैठे हैं। एक उस वृक्ष के मीठे-कड़वे फल का स्वाद लेता है; दूसरा कुछ न खाते हुए शान्त वैभव में देखता रहता है। वृक्ष शरीर और अनुभव का जगत है; फल खाने वाला पक्षी जीवात्मा है जो सुख-दुःख में बँधा है, और केवल देखने वाला पक्षी परम आत्मा है। उपनिषद आगे कहता है कि जब शोकग्रस्त जीव उस दूसरे पक्षी — पूज्य ईश्वर — को देखता और उसकी महानता को जान लेता है, तब उसका शोक मिट जाता है — इस प्रकार यह चित्र मोक्ष का द्वार बन जाता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
उपनिषद घोषणा करता है कि जिस क्षण जीव, अपने बन्धन में शोकमग्न, मुड़कर उस दूसरे पक्षी — उस प्रभु को जो उसका अपना ही वास्तविक स्वरूप है — देखता है और उसकी महिमा में आनन्दित होता है, उसी क्षण वह समस्त शोक से पार हो जाता है; इस प्रकार साक्षी आत्मा का यह एक दर्शन जीव को मुक्त कर देता है।
मंत्र
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द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते । तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥
dvā suparṇā sayujā sakhāyā samānaṁ vṛkṣaṁ pariṣasvajāte tayoranyaḥ pippalaṁ svādvattyanaśnannanyo abhicākaśīti
अर्थ:दो सुन्दर पंखों वाले पक्षी, सदा साथ रहने वाले मित्र, एक ही वृक्ष पर बैठे हैं। उनमें से एक उस वृक्ष के मीठे फल को स्वादपूर्वक खाता है, और दूसरा बिना खाए केवल देखता रहता है। (एक पक्षी जीवात्मा है जो कर्मफलों का भोग करता है; दूसरा परमात्मा है जो साक्षीमात्र होकर शान्त भाव से देखता है।)
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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द्वा सुपर्णा पाठ के लाभ
जीव (जीवात्मा) और परम आत्मा (परमात्मा) का एक ही वृक्ष पर बैठे दो पक्षियों का गहन वेदान्तिक चित्र प्रस्तुत करता है।
वैराग्य सिखाता है — सुख-दुःख में फँसे 'भोक्ता' से पीछे हटकर शान्त साक्षी रूप में स्थित होने का।
ध्यान में पहचान को अनुभव करते अहं से मौन, सदा देखते रहने वाले आत्मा की ओर मोड़ने के लिए प्रयोग किया जाता है।
कर्मफल से अछूती साक्षी-चेतना को प्रकट करके शान्ति और शोक से मुक्ति लाता है।
इस बोध को जगाता है कि व्यक्तिगत आत्मा और परम आत्मा अन्ततः एक ही हैं, जो मोक्ष की ओर ले जाता है।
आत्मा, ईश्वर और जगत के सम्बन्ध पर चिन्तन के लिए एक प्रिय श्लोक।
द्वा सुपर्णा जप विधि
'द्वा सुपर्णा' को धीरे-धीरे पढ़ें और एक ही वृक्ष पर दो पक्षियों का चित्र मन में लाएँ। अपने ही अनुभव में 'फल खाने वाले पक्षी' को देखें — वह भाग जो सुख, दुःख और कर्मफलों में डूबा है — और फिर 'देखने वाले पक्षी' को, वह शान्त चेतना जो प्रभावित हुए बिना यह सब केवल देखती है। अपनी 'मैं'-भावना को उस साक्षी में स्थिर करें। उपनिषद सिखाता है कि जैसे ही जीव शोक से मुड़कर इस शान्त प्रभु को देखता है, वह परम शान्ति और मुक्ति प्राप्त करता है।