एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति — Word-by-Word Meaning
एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
इन्द्रम्
indram
इन्द्र (स्वर्ग के स्वामी)
मित्रम्
mitram
मित्र (दिन और सौहार्द्र के मैत्रीपूर्ण देव)
वरुणम्
varuṇam
वरुण (ब्रह्मांडीय ऋत और जल के देव)
अग्निम्
agnim
अग्नि (पवित्र अग्नि)
आहुः
āhuḥ
वे (उसे) कहते हैं, नाम देते हैं
अथो
atho
और भी, इसके अतिरिक्त
दिव्यः
divyaḥ
दिव्य, स्वर्गीय
सः
saḥ
वही (वही एक)
सुपर्णः
suparṇaḥ
सुन्दर पंखों वाला (दिव्य पक्षी / सूर्य)
गरुत्मान्
garutmān
गरुत्मान् (पंखयुक्त दिव्य प्राणी, गरुड)
एकम्
ekam
एक (अद्वितीय, अविभाज्य सत्ता)
सत्
sat
सत्, सत्य, जो विद्यमान है
विप्राः
viprāḥ
ज्ञानी, ऋषि, प्रेरित द्रष्टा
बहुधा
bahudhā
अनेक प्रकार से, अनेक नामों से
वदन्ति
vadanti
कहते हैं, वर्णन करते हैं, पुकारते हैं
यमम्
yamam
यम (धर्म और पितरों के स्वामी)
मातरिश्वानम्
mātariśvānam
मातरिश्वा (ब्रह्मांडीय वायु / प्राण)
Complete Translation
वे उसी एक को इन्द्र, मित्र, वरुण और अग्नि कहते हैं, और वही दिव्य सुन्दर पंखों वाला गरुत्मान (सुपर्ण) भी है। सत्य एक ही है, किन्तु ज्ञानी जन उसे अनेक प्रकार से वर्णित करते हैं — उसी को अग्नि, यम और मातरिश्वा भी कहते हैं। वस्तुतः वह एक ही सत् तत्त्व अपने भिन्न-भिन्न रूपों के अनुसार ऋषियों द्वारा अनेक नामों से पुकारा जाता है, फिर भी वह सदा एक ही रहता है।
Origin & History
Source: Rigveda 1.164.46
Author: Rishi Dirghatamas Auchathya
Period: Vedic period (c. 1500 BCE or earlier)
यह पंक्ति ऋग्वेद के प्रसिद्ध पहेली-सूक्त, जिसे अस्य वामस्य सूक्त कहते हैं, के एक श्लोक का समापन करती है; यह सूक्त अन्धे ऋषि दीर्घतमा को आरोपित है। यह सूक्त ब्रह्मांड, सूर्य, काल और दिव्य तत्त्व के विषय में गूढ़ प्रश्न उठाता है। इस श्लोक में ऋषि वैदिक देवताओं की आभासी अनेकता का समाधान यह घोषित करके करते हैं कि वह एक सत् (एकं सत्) ही है जिसे ज्ञानी जन अनेक नामों से सम्बोधित करते हैं — इन्द्र, मित्र, वरुण, अग्नि, दिव्य गरुत्मान्, यम और मातरिश्वा।
Frequently Asked Questions
'एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति' का क्या अर्थ है?▼
इसका अर्थ है 'सत्य (अथवा जो विद्यमान है) एक ही है; ज्ञानी उसे अनेक नामों से पुकारते हैं।' यह सिखाता है कि इन्द्र, अग्नि, वरुण और यम जैसे विविध देवता एक ही परम सत्ता के भिन्न-भिन्न नाम और शक्तियाँ हैं।
यह श्लोक कहाँ से आया है?▼
यह ऋग्वेद १.१६४.४६ का उत्तरार्ध है, जो ऋषि दीर्घतमा औचथ्य को आरोपित एक दीर्घ दार्शनिक सूक्त (अस्य वामस्य सूक्त) से लिया गया है। यह समस्त मानव शास्त्रों में एकता के प्राचीनतम कथनों में से एक है।
हिन्दू धर्म में यह श्लोक इतना महत्त्वपूर्ण क्यों है?▼
इसे प्रायः हिन्दू धर्म की समावेशी दृष्टि के हृदय के रूप में उद्धृत किया जाता है — कि एक ही सत्य अनेक नामों, देवताओं और मार्गों से प्राप्त किया जाता है। यह सनातन धर्म में उपासना के अनेक रूपों के बीच के सामंजस्य और अन्य परम्पराओं के प्रति सम्मान का आधार है।
क्या यह श्लोक अनेक देवताओं की उपासना का समर्थन करता है या एक ईश्वर की?▼
यह दोनों का समन्वय करता है: अनेक देवता वास्तविक शक्तियाँ और रूप हैं, फिर भी वे एक ही अन्तर्निहित सत्ता (सत्) की अभिव्यक्तियाँ हैं। किसी भी रूप की उपासना, यदि निष्ठा से की जाए, उसी एक सत्य तक पहुँचती है।
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