एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति
अन्य नाम / खोज: ekam sat vipra bahudha vadanti · indram mitram varunam agnim ahuh · ekam sad vipra bahudha vadanti · truth is one sages call it by many names · rigveda 1.164.46
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✦ अर्थ
ऋषि दीर्घतमा द्वारा रचित ऋग्वेद (१.१६४.४६) का यह प्रसिद्ध मन्त्र समस्त हिन्दू चिन्तन की सर्वाधिक उद्धृत पंक्तियों में से एक है। यह घोषित करता है कि यद्यपि परम सत्य को इन्द्र, मित्र, वरुण, अग्नि, यम आदि असंख्य नामों से पुकारा जाता है, तथापि वह सत् मूलतः एक ही है। 'एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति' सनातन धर्म की उस दृष्टि का ध्वजवाक्य बन गया है जो समस्त देवताओं और मार्गों के पीछे की एकता को देखती है।
उत्पत्ति और कथा
Rigveda 1.164.46 · Rishi Dirghatamas Auchathya · Vedic period (c. 1500 BCE or earlier)
यह पंक्ति ऋग्वेद के प्रसिद्ध पहेली-सूक्त, जिसे अस्य वामस्य सूक्त कहते हैं, के एक श्लोक का समापन करती है; यह सूक्त अन्धे ऋषि दीर्घतमा को आरोपित है। यह सूक्त ब्रह्मांड, सूर्य, काल और दिव्य तत्त्व के विषय में गूढ़ प्रश्न उठाता है। इस श्लोक में ऋषि वैदिक देवताओं की आभासी अनेकता का समाधान यह घोषित करके करते हैं कि वह एक सत् (एकं सत्) ही है जिसे ज्ञानी जन अनेक नामों से सम्बोधित करते हैं — इन्द्र, मित्र, वरुण, अग्नि, दिव्य गरुत्मान्, यम और मातरिश्वा।
✦ शास्त्रों में वर्णित
युगों से इस एक ही पंक्ति को सन्तों, दार्शनिकों और सुधारकों ने — उपनिषद् के ऋषियों से लेकर धर्म-संसद में स्वामी विवेकानन्द तक — इस प्रमाण के रूप में उद्धृत किया है कि वैदिक दृष्टि दिव्यता के समस्त रूपों को आत्मसात् करती है। अनेक भक्त कहते हैं कि इस पर ध्यान करने से मार्गों के बीच का आन्तरिक विवाद विलीन हो जाता है और सर्वत्र एक ही सत्य देखने से उत्पन्न शान्ति प्राप्त होती है।
मंत्र
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इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्। एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः॥
Indraṃ mitraṃ varuṇam agnim āhur atho divyaḥ sa suparṇo garutmān | Ekaṃ sad viprā bahudhā vadanty agniṃ yamaṃ mātariśvānam āhuḥ ||
अर्थ:वे उसी एक को इन्द्र, मित्र, वरुण और अग्नि कहते हैं, और वही दिव्य सुन्दर पंखों वाला गरुत्मान (सुपर्ण) भी है। सत्य एक ही है, किन्तु ज्ञानी जन उसे अनेक प्रकार से वर्णित करते हैं — उसी को अग्नि, यम और मातरिश्वा भी कहते हैं। वस्तुतः वह एक ही सत् तत्त्व अपने भिन्न-भिन्न रूपों के अनुसार ऋषियों द्वारा अनेक नामों से पुकारा जाता है, फिर भी वह सदा एक ही रहता है।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति पाठ के लाभ
इस मूल वैदिक सत्य को प्रकट करता है कि ईश्वर एक है, जिसे अनेक प्रकार से नामित किया जाता है
समस्त मार्गों और परम्पराओं के प्रति सौहार्द्र, सहिष्णुता और सम्मान की भावना जगाता है
अद्वैत ज्ञान की अपनी प्राचीनतम वैदिक जड़ से गहरी समझ देता है
मन को सांप्रदायिक संकीर्णता तथा नाम-रूप के विवाद से मुक्त करता है
ऋषियों के प्रति श्रद्धा और सनातन धर्म की समावेशी दृष्टि के लिए प्रेरित करता है
समस्त विविधता के मूल में स्थित उस एक सत्य (सत्) पर चिन्तन को स्थिर करता है
एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति जप विधि
श्लोक को उसके अर्थ पर ध्यान देते हुए धीरे-धीरे पढ़ें, यह चिन्तन धारण करते हुए कि सभी नामित देवता एक ही अविभाज्य सत्ता (एकं सत्) की ओर संकेत करते हैं। यह जप के लिए, आध्यात्मिक अध्ययन के आरम्भ के लिए, तथा अन्तर-धार्मिक अथवा एकता-सभाओं के लिए सर्वथा उपयुक्त है। शान्त, श्रद्धालु मन से, अधिमानतः कुछ क्षणों के मौन के पश्चात्, जप करें और एकता के इस सत्य को हृदय में बैठने दें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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