हिरण्यगर्भ सूक्तम्
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✦ अर्थ
हिरण्यगर्भ सूक्तम् ऋग्वेद (मण्डल १०, सूक्त १२१) के सर्वाधिक गम्भीर सृष्टि-सूक्तों में से एक है, जो 'हिरण्यगर्भ' (स्वर्णमय गर्भ) का वर्णन करता है — वह ब्रह्माण्डीय बीज जो आरम्भ में प्रकट हुआ और समस्त सृष्टि का एकमात्र स्वामी, पृथ्वी एवं द्युलोक का धारक बना। इसके दस में से नौ मन्त्र इस जिज्ञासापूर्ण पल्लवी से समाप्त होते हैं — 'कस्मै देवाय हविषा विधेम' — 'हम किस देव की उपासना करें?' — और दसवाँ मन्त्र अन्ततः उस देव को प्रजापति के रूप में नामित करता है। यह सृष्टि के पीछे स्थित एक ही सृष्टिकर्ता पर एक श्रेष्ठ ध्यान-सूक्त के रूप में पूजनीय है।
उत्पत्ति और कथा
Rigveda (Mandala 10, Sukta 121) · Rishi Hiranyagarbha Prajapatya · Vedic period (c. 1500-1000 BCE)
हिरण्यगर्भ सूक्तम् ऋग्वेद के दसवें मण्डल में आता है और परम्परागत रूप से प्रजापति के पुत्र, ऋषि हिरण्यगर्भ को इसका द्रष्टा माना जाता है। यह वेद के श्रेष्ठ सृष्टि-सूक्तों में से एक है: यह उस स्वर्णमय गर्भ का गान करता है जो सबसे पहले प्रकट हुआ और सृष्टि का एकमात्र स्वामी, जीवन और बल का दाता, समस्त प्राणधारियों का राजा, द्यावा-पृथिवी, पर्वतों और समुद्रों का धारक बना। नौ मन्त्रों में द्रष्टा यह गूढ़ प्रश्न दोहराते हैं — 'हम किस देव की उपासना करें?' — क्योंकि सृष्टिकर्ता मन के पकड़ में आने वाले प्रत्येक नाम से परे है — और केवल दसवें मन्त्र में अन्ततः उस देव को प्रजापति के रूप में नामित किया जाता है। इस प्रकार यह सूक्त प्रकट ब्रह्माण्ड के विस्मय से उस एक देव की पहचान की ओर बढ़ता है जो सबमें व्याप्त है और सबसे परे है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
हिरण्यगर्भ सूक्तम् मानवता की सबसे प्राचीन और तेजस्वी अन्तर्दृष्टियों में से एक को संरक्षित करता है: कि सम्पूर्ण विश्व एक ही 'स्वर्णिम' ब्रह्माण्डीय बीज से प्रकट हुआ, जो पृथ्वी और आकाश, जीवन और मृत्यु का एकमात्र स्रोत है। इसका दसवाँ मन्त्र, प्रजापति से प्रार्थना, इतना सामर्थ्यवान माना जाता है कि जो इसे उत्कट कामना से अर्पित करता है, वह उस कामना को पूर्ण पाता है, क्योंकि यह सूक्त घोषित करता है कि सृष्टिकर्ता के अतिरिक्त कोई भी समस्त उत्पन्न पदार्थों को व्याप्त नहीं करता, और उसी को अन्ततः प्रत्येक आहुति अर्पित होती है।
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हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् । स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥१॥
Hiraṇyagarbhaḥ samavartatāgre bhūtasya jātaḥ patireka āsīt | sa dādhāra pṛthivīṃ dyāmutemāṃ kasmai devāya haviṣā vidhema ||1||
अर्थ:सृष्टि के आरम्भ में हिरण्यगर्भ (स्वर्णमय गर्भ) प्रकट हुआ; उत्पन्न होकर वह समस्त भूतों का एकमात्र स्वामी था। उसने इस पृथ्वी और द्युलोक को धारण किया — हम किस देव की हवि से उपासना करें?
य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देवाः । यस्य छायामृतं यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥२॥
Ya ātmadā baladā yasya viśva upāsate praśiṣaṃ yasya devāḥ | yasya chāyāmṛtaṃ yasya mṛtyuḥ kasmai devāya haviṣā vidhema ||2||
अर्थ:जो आत्मा और बल देता है, जिसकी आज्ञा का समस्त विश्व और देवगण भी पालन करते हैं, जिसकी छाया अमृत है और जिसकी छाया मृत्यु है — हम किस देव की उपासना करें?
यः प्राणतो निमिषतो महित्वैक इद्राजा जगतो बभूव । य ईशे अस्य द्विपदश्चतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥३॥
Yaḥ prāṇato nimiṣato mahitvaika idrājā jagato babhūva | ya īśe asya dvipadaścatuṣpadaḥ kasmai devāya haviṣā vidhema ||3||
अर्थ:जो अपनी महिमा से प्राणधारी एवं पलक झपकाने वाले (समस्त जीवित) जगत् का एकमात्र राजा हुआ, जो इसके द्विपद और चतुष्पद प्राणियों का स्वामी है — हम किस देव की उपासना करें?
यस्येमे हिमवन्तो महित्वा यस्य समुद्रं रसया सहाहुः । यस्येमाः प्रदिशो यस्य बाहू कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥४॥
Yasyeme himavanto mahitvā yasya samudraṃ rasayā sahāhuḥ | yasyemāḥ pradiśo yasya bāhū kasmai devāya haviṣā vidhema ||4||
अर्थ:जिसकी महिमा को ये हिमालय पर्वत प्रकट करते हैं, जिसका समुद्र रसा (नदियों) सहित कहा जाता है, जिसकी ये दिशाएँ उसकी भुजाओं के समान हैं — हम किस देव की उपासना करें?
येन द्यौरुग्रा पृथिवी च दृळ्हा येन स्वः स्तभितं येन नाकः । यो अन्तरिक्षे रजसो विमानः कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥५॥
Yena dyaurugrā pṛthivī ca dṛḷhā yena svaḥ stabhitaṃ yena nākaḥ | yo antarikṣe rajaso vimānaḥ kasmai devāya haviṣā vidhema ||5||
अर्थ:जिसके द्वारा उग्र द्युलोक और पृथ्वी दृढ़ हुए, जिसके द्वारा स्वर्लोक और नाक (आकाश) स्थिर हुए, जो अन्तरिक्ष में रज का विधाता है — हम किस देव की उपासना करें?
यं क्रन्दसी अवसा तस्तभाने अभ्यैक्षेतां मनसा रेजमाने । यत्राधि सूर उदितो विभाति कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥६॥
Yaṃ krandasī avasā tastabhāne abhyaikṣetāṃ manasā rejamāne | yatrādhi sūra udito vibhāti kasmai devāya haviṣā vidhema ||6||
अर्थ:जिसकी सहायता से धारण किए हुए द्यावा-पृथिवी, मन में काँपते हुए जिसकी ओर देखते रहे, जहाँ उदित सूर्य प्रकाशित होता है — हम किस देव की उपासना करें?
आपो ह यद्बृहतीर्विश्वमायन्गर्भं दधाना जनयन्तीरग्निम् । ततो देवानां समवर्ततासुरेकः कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥७॥
Āpo ha yadbṛhatīrviśvamāyangarbhaṃ dadhānā janayantīragnim | tato devānāṃ samavartatāsureka kasmai devāya haviṣā vidhema ||7||
अर्थ:जब महान जल आए, विश्व के गर्भ को धारण करते हुए और अग्नि को जन्म देते हुए, तब देवों का एक प्राण (असु) प्रकट हुआ — हम किस देव की उपासना करें?
यश्चिदापो महिना पर्यपश्यद्दक्षं दधाना जनयन्तीर्यज्ञम् । यो देवेष्वधि देव एक आसीत्कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥८॥
Yaścidāpo mahinā paryapaśyaddakṣaṃ dadhānā janayantīryajñam | yo deveṣvadhi deva eka āsītkasmai devāya haviṣā vidhema ||8||
अर्थ:जिसने अपनी महिमा से उन जलों को देखा जो सामर्थ्य धारण किए हुए थे और यज्ञ को जन्म दे रहे थे, जो देवों में भी एकमात्र अधिदेव था — हम किस देव की उपासना करें?
मा नो हिंसीज्जनिता यः पृथिव्या यो वा दिवं सत्यधर्मा जजान । यश्चापश्चन्द्रा बृहतीर्जजान कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥९॥
Mā no hiṃsījjanitā yaḥ pṛthivyā yo vā divaṃ satyadharmā jajāna | yaścāpaścandrā bṛhatīrjajāna kasmai devāya haviṣā vidhema ||9||
अर्थ:वह हमें हानि न पहुँचाए — जो पृथ्वी का जनक है, जिसने सत्य धर्म वाला होकर द्युलोक की रचना की, और जिसने महान चमकते जल उत्पन्न किए — हम किस देव की उपासना करें?
प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परि ता बभूव । यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम् ॥१०॥
Prajāpate na tvadetānyanyo viśvā jātāni pari tā babhūva | yatkāmāste juhumastanno astu vayaṃ syāma patayo rayīṇām ||10||
अर्थ:हे प्रजापते! तुम्हारे अतिरिक्त अन्य कोई इन समस्त उत्पन्न पदार्थों को नहीं व्याप्त कर सका। जिस कामना से हम तुम्हें आहुति देते हैं, वह हमें प्राप्त हो; हम धन-सम्पदा के स्वामी बनें।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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हिरण्यगर्भ सूक्तम् पाठ के लाभ
विश्व के पीछे स्थित एक ही सृष्टिकर्ता (हिरण्यगर्भ / प्रजापति) पर एक श्रेष्ठ वैदिक ध्यान
ब्रह्माण्डीय उद्गम — वह 'स्वर्णमय गर्भ' जिससे सब प्रकट हुआ — पर चिन्तन को गहरा करता है
इसका ध्रुवपद 'कस्मै देवाय हविषा विधेम' अज्ञेय परम के समक्ष विनम्रता जगाता है
प्रमुख वैदिक यज्ञों, होमों और मन्दिर प्रतिष्ठाओं में जपा जाता है
अन्तिम मन्त्र कामनाओं की पूर्ति और समृद्धि के लिए प्रजापति से एक प्रसिद्ध प्रार्थना है
शान्ति, विस्तृत ज्ञान और सृष्टि की दिव्य व्यवस्था के प्रति श्रद्धा प्रदान करता है
सृष्टिकर्ता की कृपा और रक्षा ('मा नो हिंसीः') के आवाहन हेतु अत्यन्त शुभ माना जाता है
हिरण्यगर्भ सूक्तम् जप विधि
स्पष्ट वैदिक उच्चारण के साथ धीरे-धीरे पाठ करें, प्रत्येक मन्त्र की ब्रह्माण्डीय कल्पना और जिज्ञासापूर्ण ध्रुवपद पर ठहरते हुए। यह परम्परागत रूप से प्रमुख होमों, मन्दिर प्रतिष्ठाओं और सृष्टिकर्ता की वैदिक उपासना में जपा जाता है। व्यक्तिगत साधना के लिए प्रातःकाल शान्त बैठें और हिरण्यगर्भ को समस्त अस्तित्व के एकमात्र स्रोत के रूप में चिन्तन करें; दसवाँ मन्त्र प्रजापति से प्रत्यक्ष प्रार्थना के रूप में पढ़ा जाता है। ग्यारह आवृत्तियाँ एक प्रचलित संख्या है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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