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हिरण्यगर्भ सूक्तम् PDF

हिरण्यगर्भ सूक्तम् की पूरी लिरिक्स — संस्कृत, रोमन व अर्थ सहित। एक क्लिक में PDF सेव करें या प्रिंट करें।

हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् । स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥१॥

Hiraṇyagarbhaḥ samavartatāgre bhūtasya jātaḥ patireka āsīt | sa dādhāra pṛthivīṃ dyāmutemāṃ kasmai devāya haviṣā vidhema ||1||

सृष्टि के आरम्भ में हिरण्यगर्भ (स्वर्णमय गर्भ) प्रकट हुआ; उत्पन्न होकर वह समस्त भूतों का एकमात्र स्वामी था। उसने इस पृथ्वी और द्युलोक को धारण किया — हम किस देव की हवि से उपासना करें?

य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देवाः । यस्य छायामृतं यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥२॥

Ya ātmadā baladā yasya viśva upāsate praśiṣaṃ yasya devāḥ | yasya chāyāmṛtaṃ yasya mṛtyuḥ kasmai devāya haviṣā vidhema ||2||

जो आत्मा और बल देता है, जिसकी आज्ञा का समस्त विश्व और देवगण भी पालन करते हैं, जिसकी छाया अमृत है और जिसकी छाया मृत्यु है — हम किस देव की उपासना करें?

यः प्राणतो निमिषतो महित्वैक इद्राजा जगतो बभूव । य ईशे अस्य द्विपदश्चतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥३॥

Yaḥ prāṇato nimiṣato mahitvaika idrājā jagato babhūva | ya īśe asya dvipadaścatuṣpadaḥ kasmai devāya haviṣā vidhema ||3||

जो अपनी महिमा से प्राणधारी एवं पलक झपकाने वाले (समस्त जीवित) जगत् का एकमात्र राजा हुआ, जो इसके द्विपद और चतुष्पद प्राणियों का स्वामी है — हम किस देव की उपासना करें?

यस्येमे हिमवन्तो महित्वा यस्य समुद्रं रसया सहाहुः । यस्येमाः प्रदिशो यस्य बाहू कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥४॥

Yasyeme himavanto mahitvā yasya samudraṃ rasayā sahāhuḥ | yasyemāḥ pradiśo yasya bāhū kasmai devāya haviṣā vidhema ||4||

जिसकी महिमा को ये हिमालय पर्वत प्रकट करते हैं, जिसका समुद्र रसा (नदियों) सहित कहा जाता है, जिसकी ये दिशाएँ उसकी भुजाओं के समान हैं — हम किस देव की उपासना करें?

येन द्यौरुग्रा पृथिवी च दृळ्हा येन स्वः स्तभितं येन नाकः । यो अन्तरिक्षे रजसो विमानः कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥५॥

Yena dyaurugrā pṛthivī ca dṛḷhā yena svaḥ stabhitaṃ yena nākaḥ | yo antarikṣe rajaso vimānaḥ kasmai devāya haviṣā vidhema ||5||

जिसके द्वारा उग्र द्युलोक और पृथ्वी दृढ़ हुए, जिसके द्वारा स्वर्लोक और नाक (आकाश) स्थिर हुए, जो अन्तरिक्ष में रज का विधाता है — हम किस देव की उपासना करें?

यं क्रन्दसी अवसा तस्तभाने अभ्यैक्षेतां मनसा रेजमाने । यत्राधि सूर उदितो विभाति कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥६॥

Yaṃ krandasī avasā tastabhāne abhyaikṣetāṃ manasā rejamāne | yatrādhi sūra udito vibhāti kasmai devāya haviṣā vidhema ||6||

जिसकी सहायता से धारण किए हुए द्यावा-पृथिवी, मन में काँपते हुए जिसकी ओर देखते रहे, जहाँ उदित सूर्य प्रकाशित होता है — हम किस देव की उपासना करें?

आपो ह यद्बृहतीर्विश्वमायन्गर्भं दधाना जनयन्तीरग्निम् । ततो देवानां समवर्ततासुरेकः कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥७॥

Āpo ha yadbṛhatīrviśvamāyangarbhaṃ dadhānā janayantīragnim | tato devānāṃ samavartatāsureka kasmai devāya haviṣā vidhema ||7||

जब महान जल आए, विश्व के गर्भ को धारण करते हुए और अग्नि को जन्म देते हुए, तब देवों का एक प्राण (असु) प्रकट हुआ — हम किस देव की उपासना करें?

यश्चिदापो महिना पर्यपश्यद्दक्षं दधाना जनयन्तीर्यज्ञम् । यो देवेष्वधि देव एक आसीत्कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥८॥

Yaścidāpo mahinā paryapaśyaddakṣaṃ dadhānā janayantīryajñam | yo deveṣvadhi deva eka āsītkasmai devāya haviṣā vidhema ||8||

जिसने अपनी महिमा से उन जलों को देखा जो सामर्थ्य धारण किए हुए थे और यज्ञ को जन्म दे रहे थे, जो देवों में भी एकमात्र अधिदेव था — हम किस देव की उपासना करें?

मा नो हिंसीज्जनिता यः पृथिव्या यो वा दिवं सत्यधर्मा जजान । यश्चापश्चन्द्रा बृहतीर्जजान कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥९॥

Mā no hiṃsījjanitā yaḥ pṛthivyā yo vā divaṃ satyadharmā jajāna | yaścāpaścandrā bṛhatīrjajāna kasmai devāya haviṣā vidhema ||9||

वह हमें हानि न पहुँचाए — जो पृथ्वी का जनक है, जिसने सत्य धर्म वाला होकर द्युलोक की रचना की, और जिसने महान चमकते जल उत्पन्न किए — हम किस देव की उपासना करें?

प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परि ता बभूव । यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम् ॥१०॥

Prajāpate na tvadetānyanyo viśvā jātāni pari tā babhūva | yatkāmāste juhumastanno astu vayaṃ syāma patayo rayīṇām ||10||

हे प्रजापते! तुम्हारे अतिरिक्त अन्य कोई इन समस्त उत्पन्न पदार्थों को नहीं व्याप्त कर सका। जिस कामना से हम तुम्हें आहुति देते हैं, वह हमें प्राप्त हो; हम धन-सम्पदा के स्वामी बनें।