एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति PDF
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इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्। एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः॥
Indraṃ mitraṃ varuṇam agnim āhur atho divyaḥ sa suparṇo garutmān | Ekaṃ sad viprā bahudhā vadanty agniṃ yamaṃ mātariśvānam āhuḥ ||
वे उसी एक को इन्द्र, मित्र, वरुण और अग्नि कहते हैं, और वही दिव्य सुन्दर पंखों वाला गरुत्मान (सुपर्ण) भी है। सत्य एक ही है, किन्तु ज्ञानी जन उसे अनेक प्रकार से वर्णित करते हैं — उसी को अग्नि, यम और मातरिश्वा भी कहते हैं। वस्तुतः वह एक ही सत् तत्त्व अपने भिन्न-भिन्न रूपों के अनुसार ऋषियों द्वारा अनेक नामों से पुकारा जाता है, फिर भी वह सदा एक ही रहता है।