Mantra.Tips

गणेश कवचम् PDF

गणेश कवचम् की पूरी लिरिक्स — संस्कृत, रोमन व अर्थ सहित। एक क्लिक में PDF सेव करें या प्रिंट करें।

एषोऽतिचपलो दैत्यान्बाल्येऽपि नाशयत्यहो। अग्रे किं कर्म कर्तेति न जाने मुनिसत्तम॥

Eshoti Chapalo Daityan Balyepi Nashayatyaho Agre Kim Karma Karteti Na Jane Munisattama

(कश्यप देवी से बोले—) यह अत्यन्त चपल बालक (गणेश) बाल्यावस्था में ही दैत्यों का नाश कर देता है; हे मुनिश्रेष्ठ, आगे यह कौन-कौन से कार्य करेगा, यह मैं नहीं जानता। अनेक प्रकार के दुष्ट दैत्य साधुजनों के कुल-कण्टक हैं; यद्यपि वह उन्हें वश में करने में समर्थ है, फिर भी वह सुरक्षित रहेगा या नहीं—यह मैं नहीं जानता।

दैत्या नानाविधा दुष्टाः साध्वानां कुलकण्टकाः। निग्रहीतुं समर्थोऽपि न जाने रक्षिता न वा॥

Daitya Nanavidha Dushtah Sadhvanam Kulakantakah Nigrahitum Samarthopi Na Jane Rakshita Na Va

इसलिए हे देवी, मैं श्रीगणेश-कवच कहता हूँ जो समस्त अर्थों की सिद्धि देने वाला है। जो इसे भक्ति से पढ़ता या धारण करता है, वह निश्चय ही सर्व-मनोरथ-सम्पन्न हो जाता है।

श्रीगणेशकवचं वक्ष्ये देवि सर्वार्थसिद्धिदम्। पठेद्यो धारयेद्भक्त्या स वै सर्वार्थवान्भवेत्॥

Shri Ganesha Kavacham Vakshye Devi Sarvartha Siddhidam Pathedyo Dharayed Bhaktya Sa Vai Sarvarthavan Bhavet

गणेश मेरे सिर की रक्षा करें, गजानन ललाट की; शूर्पकर्ण मेरे नेत्रों की और विनायक नासिका की रक्षा करें।

गणेशो मे शिरः पातु फालं पातु गजाननः। नेत्रे रक्षतु मे शूर्पकर्णो नासां विनायकः॥

Ganesho Me Shirah Patu Phalam Patu Gajananah Netre Rakshatu Me Shurpakarno Nasam Vinayakah

विघ्नराज मेरे कानों की और गिरां-वर (वाणीपति) जिह्वा की रक्षा करें; वक्रतुण्ड मुख की और विघ्नहा दाँतों की रक्षा करें।

श्रवणौ पातु मे विघ्नराजो जिह्वां च गिर्वरः। मुखं रक्षतु वक्रतुण्डो दन्तौ रक्षतु विघ्नहा॥

Shravanau Patu Me Vighnarajo Jihvam Cha Girvarah Mukham Rakshatu Vakratundo Dantau Rakshatu Vighnaha

गणनाथ मेरे कपोलों की और शूर्पधर कानों की रक्षा करें; गणेशान वक्षःस्थल की और धरणीधर हृदय की रक्षा करें।

कपोलौ गणनाथश्च कर्णौ शूर्पधरस्तथा। वक्षः पातु गणेशानो हृदयं धरणीधरः॥

Kapolau Gananathashcha Karnau Shurpadharas Tatha Vakshah Patu Ganeshano Hridayam Dharanidharah

गजवक्त्र मेरे उदर की और गणाधिप नाभि की रक्षा करें; महाकाय पीठ की और विघ्ननाशन कटि की रक्षा करें।

जठरं पातु गजवक्त्रो नाभिं पातु गणाधिपः। पृष्ठं पातु महाकायः कटिं मे विघ्ननाशनः॥

Jatharam Patu Gajavaktro Nabhim Patu Ganadhipah Prishtham Patu Mahakayah Katim Me Vighna Nashanah

हेरम्ब मेरे हाथों की और लम्बकर्ण मेरे चरणों की रक्षा करें; गजमुख स्वामी मेरे समस्त अंगों की सर्वत्र और सर्वदा रक्षा करें।

हस्तौ रक्षतु हेरम्बः पादौ मे लम्बकर्णकः। सर्वाङ्गानि गजास्यो मे रक्षेत्सर्वत्र सर्वदा॥

Hastau Rakshatu Herambah Padau Me Lambakarnakah Sarvangani Gajasyo Me Rakshet Sarvatra Sarvada

इस प्रकार यह दिव्य कवच समस्त बाधाओं का नाशक है। जो महाभाग इसे धारण करता है, वह धन्य और मुनियों में श्रेष्ठ हो जाता है।

इत्येतत्कवचं दिव्यं सर्वबाधाविनाशनम्। यो धारयेन्महाभागः स धन्यो मुनिपुङ्गवः॥

Ityetat Kavacham Divyam Sarva Badha Vinashanam Yo Dharayen Mahabhagah Sa Dhanyo Munipungavah

जो पूजा के समय नित्य एकाग्रचित्त होकर भक्ति से इसका पाठ करता है, उसके विघ्न नष्ट हो जाते हैं और समस्त विद्याएँ सिद्ध हो जाती हैं।

पूजाकाले पठेद्यस्तु भक्त्या नित्यं समाहितः। तस्य विघ्नाः प्रणश्यन्ति विद्या सर्वा प्रसिध्यति॥

Puja Kale Pathedyastu Bhaktya Nityam Samahitah Tasya Vighnah Pranashyanti Vidya Sarva Prasidhyati

भूत, प्रेत, पिशाच तथा डाकिनी-शाकिनी—इस कवच के प्रभाव से उस (साधक) के दर्शनमात्र से नष्ट हो जाते हैं।

भूतप्रेतपिशाचाश्च डाकिनी शाकिनी तथा। नश्यन्ति दर्शनादस्य कवचस्य प्रभावतः॥

Bhuta Preta Pishachashcha Dakini Shakini Tatha Nashyanti Darshanad Asya Kavachasya Prabhavatah

यह गणेश-कवच कश्यप द्वारा कहा गया, और मुद्गल को तथा महर्षि माण्डव्य को (परम्परा से प्राप्त हुआ)।

इदं गणेशकवचं कश्यपेन समीरितम्। मुद्गलाय च ते नाथ माण्डव्याय महर्षये॥

Idam Ganesha Kavacham Kashyapena Samiritam Mudgalaya Cha Te Natha Mandavyaya Maharshaye

जो प्रतिदिन त्रिसन्ध्या में इसका पाठ करता है, वह सिद्धि प्राप्त करता है, समस्त कामनाओं को पाता है और गाणपत्य (गणपति के सायुज्य) को प्राप्त करता है।

त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नित्यं स वै सिद्धिं समाप्नुयात्। सर्वान्कामानवाप्नोति गाणपत्यं च विन्दति॥

Trisandhyam Yah Pathen Nityam Sa Vai Siddhim Samapnuyat Sarvan Kamanavapnoti Ganapatyam Cha Vindati