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गणेश कवचम्

🕉️ hindu·📿 3× जप·🕐 दिन की तीन सन्धियों में (सूर्योदय, मध्याह्न, सूर्यास्त); विशेषतः मंगलवार, चतुर्थी तिथि एवं गणेश पूजा के समय·📜 Ganesha Purana

अन्य नाम / खोज: ganesha kavacham · ganesh kavach · ganapati kavacham · shri ganesha kavacham · vinayaka kavacham

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अर्थ

गणेश कवचम् गणेश पुराण का एक रक्षात्मक 'कवच' स्तोत्र है जिसमें ऋषि कश्यप भगवान गणेश के विभिन्न नामों और रूपों का आवाहन कर शरीर के प्रत्येक अंग—सिर, नेत्र, कान, वक्ष, अंग आदि—की रक्षा का अनुरोध करते हैं। भक्ति से इसका पाठ या धारण विघ्नों, भूत-प्रेतों और दुष्ट शक्तियों का नाश करता है, समस्त विद्या सिद्ध करता है और सब कामनाएँ पूर्ण करता है। अंत में यह वचन है कि जो त्रिसन्ध्या में इसका पाठ करता है वह गणपति के सायुज्य को प्राप्त करता है।

उत्पत्ति और कथा

Ganesha Purana · Traditional (taught by Sage Kashyapa) · Ancient (Puranic)

गणेश कवचम् गणेश पुराण में आता है। ऋषि कश्यप ने बालक गणेश को बाल्यावस्था में ही शक्तिशाली दैत्यों का निर्भयता से नाश करते देखकर उस दिव्य शिशु की सुरक्षा को लेकर स्नेहपूर्ण चिन्ता से भर गए। उसकी—और तत्पश्चात् समस्त भक्तों की—रक्षा हेतु उन्होंने यह रक्षाकवच रचा, गणेश को उनके अनेक नामों से पुकारकर शरीर के प्रत्येक अंग की रक्षा का अनुरोध किया। यह कवच फिर मुद्गल एवं माण्डव्य सहित ऋषियों की परम्परा से प्रसारित हुआ और गाणपत्य परम्परा की सबसे प्रिय रक्षात्मक प्रार्थनाओं में से एक बन गया।

शास्त्रों में वर्णित

परम्परागत रूप से माना जाता है कि जो इस कवच को धारण करता या नित्य पाठ करता है वह भूत-प्रेत, काले जादू एवं अकाल विपत्ति से अभेद्य हो जाता है—क्योंकि ऐसे रक्षित भक्त के दर्शनमात्र से दुष्ट आत्माएँ एवं डाकिनी-शाकिनी शक्तियाँ भाग खड़ी होती और विलीन हो जाती हैं, और उसके मार्ग का प्रत्येक विघ्न विघ्नहर्ता की कृपा से सहज ही पिघल जाता है।

सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित

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श्लोक 1

एषोऽतिचपलो दैत्यान्बाल्येऽपि नाशयत्यहो। अग्रे किं कर्म कर्तेति जाने मुनिसत्तम॥

Eshoti Chapalo Daityan Balyepi Nashayatyaho Agre Kim Karma Karteti Na Jane Munisattama

अर्थ:(कश्यप देवी से बोले—) यह अत्यन्त चपल बालक (गणेश) बाल्यावस्था में ही दैत्यों का नाश कर देता है; हे मुनिश्रेष्ठ, आगे यह कौन-कौन से कार्य करेगा, यह मैं नहीं जानता। अनेक प्रकार के दुष्ट दैत्य साधुजनों के कुल-कण्टक हैं; यद्यपि वह उन्हें वश में करने में समर्थ है, फिर भी वह सुरक्षित रहेगा या नहीं—यह मैं नहीं जानता।

श्लोक 2

दैत्या नानाविधा दुष्टाः साध्वानां कुलकण्टकाः। निग्रहीतुं समर्थोऽपि जाने रक्षिता वा॥

Daitya Nanavidha Dushtah Sadhvanam Kulakantakah Nigrahitum Samarthopi Na Jane Rakshita Na Va

अर्थ:इसलिए हे देवी, मैं श्रीगणेश-कवच कहता हूँ जो समस्त अर्थों की सिद्धि देने वाला है। जो इसे भक्ति से पढ़ता या धारण करता है, वह निश्चय ही सर्व-मनोरथ-सम्पन्न हो जाता है।

श्लोक 3

श्रीगणेशकवचं वक्ष्ये देवि सर्वार्थसिद्धिदम्। पठेद्यो धारयेद्भक्त्या वै सर्वार्थवान्भवेत्॥

Shri Ganesha Kavacham Vakshye Devi Sarvartha Siddhidam Pathedyo Dharayed Bhaktya Sa Vai Sarvarthavan Bhavet

अर्थ:गणेश मेरे सिर की रक्षा करें, गजानन ललाट की; शूर्पकर्ण मेरे नेत्रों की और विनायक नासिका की रक्षा करें।

श्लोक 4

गणेशो मे शिरः पातु फालं पातु गजाननः। नेत्रे रक्षतु मे शूर्पकर्णो नासां विनायकः॥

Ganesho Me Shirah Patu Phalam Patu Gajananah Netre Rakshatu Me Shurpakarno Nasam Vinayakah

अर्थ:विघ्नराज मेरे कानों की और गिरां-वर (वाणीपति) जिह्वा की रक्षा करें; वक्रतुण्ड मुख की और विघ्नहा दाँतों की रक्षा करें।

श्लोक 5

श्रवणौ पातु मे विघ्नराजो जिह्वां गिर्वरः। मुखं रक्षतु वक्रतुण्डो दन्तौ रक्षतु विघ्नहा॥

Shravanau Patu Me Vighnarajo Jihvam Cha Girvarah Mukham Rakshatu Vakratundo Dantau Rakshatu Vighnaha

अर्थ:गणनाथ मेरे कपोलों की और शूर्पधर कानों की रक्षा करें; गणेशान वक्षःस्थल की और धरणीधर हृदय की रक्षा करें।

श्लोक 6

कपोलौ गणनाथश्च कर्णौ शूर्पधरस्तथा। वक्षः पातु गणेशानो हृदयं धरणीधरः॥

Kapolau Gananathashcha Karnau Shurpadharas Tatha Vakshah Patu Ganeshano Hridayam Dharanidharah

अर्थ:गजवक्त्र मेरे उदर की और गणाधिप नाभि की रक्षा करें; महाकाय पीठ की और विघ्ननाशन कटि की रक्षा करें।

श्लोक 7

जठरं पातु गजवक्त्रो नाभिं पातु गणाधिपः। पृष्ठं पातु महाकायः कटिं मे विघ्ननाशनः॥

Jatharam Patu Gajavaktro Nabhim Patu Ganadhipah Prishtham Patu Mahakayah Katim Me Vighna Nashanah

अर्थ:हेरम्ब मेरे हाथों की और लम्बकर्ण मेरे चरणों की रक्षा करें; गजमुख स्वामी मेरे समस्त अंगों की सर्वत्र और सर्वदा रक्षा करें।

श्लोक 8

हस्तौ रक्षतु हेरम्बः पादौ मे लम्बकर्णकः। सर्वाङ्गानि गजास्यो मे रक्षेत्सर्वत्र सर्वदा॥

Hastau Rakshatu Herambah Padau Me Lambakarnakah Sarvangani Gajasyo Me Rakshet Sarvatra Sarvada

अर्थ:इस प्रकार यह दिव्य कवच समस्त बाधाओं का नाशक है। जो महाभाग इसे धारण करता है, वह धन्य और मुनियों में श्रेष्ठ हो जाता है।

श्लोक 9

इत्येतत्कवचं दिव्यं सर्वबाधाविनाशनम्। यो धारयेन्महाभागः धन्यो मुनिपुङ्गवः॥

Ityetat Kavacham Divyam Sarva Badha Vinashanam Yo Dharayen Mahabhagah Sa Dhanyo Munipungavah

अर्थ:जो पूजा के समय नित्य एकाग्रचित्त होकर भक्ति से इसका पाठ करता है, उसके विघ्न नष्ट हो जाते हैं और समस्त विद्याएँ सिद्ध हो जाती हैं।

श्लोक 10

पूजाकाले पठेद्यस्तु भक्त्या नित्यं समाहितः। तस्य विघ्नाः प्रणश्यन्ति विद्या सर्वा प्रसिध्यति॥

Puja Kale Pathedyastu Bhaktya Nityam Samahitah Tasya Vighnah Pranashyanti Vidya Sarva Prasidhyati

अर्थ:भूत, प्रेत, पिशाच तथा डाकिनी-शाकिनी—इस कवच के प्रभाव से उस (साधक) के दर्शनमात्र से नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 11

भूतप्रेतपिशाचाश्च डाकिनी शाकिनी तथा। नश्यन्ति दर्शनादस्य कवचस्य प्रभावतः॥

Bhuta Preta Pishachashcha Dakini Shakini Tatha Nashyanti Darshanad Asya Kavachasya Prabhavatah

अर्थ:यह गणेश-कवच कश्यप द्वारा कहा गया, और मुद्गल को तथा महर्षि माण्डव्य को (परम्परा से प्राप्त हुआ)।

श्लोक 12

इदं गणेशकवचं कश्यपेन समीरितम्। मुद्गलाय ते नाथ माण्डव्याय महर्षये॥

Idam Ganesha Kavacham Kashyapena Samiritam Mudgalaya Cha Te Natha Mandavyaya Maharshaye

अर्थ:जो प्रतिदिन त्रिसन्ध्या में इसका पाठ करता है, वह सिद्धि प्राप्त करता है, समस्त कामनाओं को पाता है और गाणपत्य (गणपति के सायुज्य) को प्राप्त करता है।

श्लोक 13

त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नित्यं वै सिद्धिं समाप्नुयात्। सर्वान्कामानवाप्नोति गाणपत्यं विन्दति॥

Trisandhyam Yah Pathen Nityam Sa Vai Siddhim Samapnuyat Sarvan Kamanavapnoti Ganapatyam Cha Vindati

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

कवचम्🔊Kavachamकवच, रक्षाकवच
गणेशः🔊Ganeshahभगवान गणेश, गणों के स्वामी
शिरः पातु🔊Shirah Patuवे सिर की रक्षा करें
फालम्🔊Phalamललाट
गजाननः🔊Gajananahगजमुख वाले
शूर्पकर्णः🔊Shurpakarnahजिनके कान सूप के समान हैं
विनायकः🔊Vinayakahपरम नायक, विघ्नहर्ता
विघ्नराजः🔊Vighnarajahसमस्त विघ्नों के अधिपति राजा
वक्रतुण्डः🔊Vakratundahवक्र सूँड वाले
विघ्नहा🔊Vighnahaविघ्नों के नाशक
गणनाथः🔊Gananathahदेवगणों के स्वामी
धरणीधरः🔊Dharanidharahपृथ्वी को धारण करने वाले
गजवक्त्रः🔊Gajavaktrahगजमुख वाले
गणाधिपः🔊Ganadhipahगणों के अधिपति
महाकायः🔊Mahakayahविशाल एवं महान शरीर वाले
हेरम्बः🔊Herambahदुर्बलों के रक्षक, गणेश का एक नाम
लम्बकर्णकः🔊Lambakarnakahलम्बे झूलते कानों वाले
सर्वाङ्गानि🔊Sarvanganiसमस्त अंग / सम्पूर्ण शरीर
डाकिनी शाकिनी🔊Dakini Shakiniअनिष्टकारी स्त्री-शक्तियाँ
कश्यपेन समीरितम्🔊Kashyapena Samiritamऋषि कश्यप द्वारा कहा गया
गाणपत्यम्🔊Ganapatyamगणपति के सायुज्य की स्थिति/धाम
त्रिसन्ध्यम्🔊Trisandhyamदिन की तीन सन्धियों में (प्रातः, मध्याह्न, सायं)

गणेश कवचम् पाठ के लाभ

भक्त के चारों ओर दिव्य रक्षाकवच रचता है, शरीर के प्रत्येक अंग की रक्षा करता है

सफलता एवं आध्यात्मिक प्रगति के मार्ग के समस्त विघ्नों का नाश करता है

भूत, प्रेत, काले जादू तथा डाकिनी-शाकिनी जैसी नकारात्मक शक्तियों को दूर भगाता है

सच्चे पाठक के लिए विद्या एवं ज्ञान की समस्त शाखाओं को सिद्ध करता है

समस्त धर्ममय कामनाओं की सिद्धि (सर्वार्थ-सिद्धि) प्रदान करता है

त्रिसन्ध्या में पाठ करने पर सिद्धि एवं भगवान गणपति के सायुज्य तक ले जाता है

किसी नए कार्य, यात्रा या पूजा के आरम्भ हेतु आदर्श रक्षात्मक प्रार्थना

गणेश कवचम् जप विधि

जप संख्या3बार
उत्तम समयदिन की तीन सन्धियों में (सूर्योदय, मध्याह्न, सूर्यास्त); विशेषतः मंगलवार, चतुर्थी तिथि एवं गणेश पूजा के समय

स्नान कर स्वच्छ स्थान में गणेश की प्रतिमा के सम्मुख पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें। दीप जलाएँ और विघ्नों के नाश हेतु गणेश का आवाहन कर आरम्भ करें। पूर्ण एकाग्रता से कवच का पाठ करें, गणेश के प्रत्येक नाम को अपने शरीर के तदनुरूप अंग की रक्षा हेतु स्थित होते हुए—सिर से चरण तक—भावित करें। सर्वाधिक फल हेतु परम्परा तीन सन्ध्याओं (त्रिसन्ध्या) में पाठ की संस्तुति करती है। गणपति को प्रणाम कर तथा सम्भव हो तो मोदक या दूर्वा अर्पित कर समापन करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गणेश कवचम् का अर्थ है 'गणेश का कवच'। यह गणेश पुराण का एक रक्षात्मक स्तोत्र है जिसमें शरीर के प्रत्येक अंग को भगवान गणेश के किसी विशेष नाम या रूप की रक्षा में रखा जाता है, जिससे समस्त अनिष्ट के विरुद्ध एक आध्यात्मिक कवच बनता है।
यह परम्परागत रूप से गणेश पुराण से लिया गया है, जहाँ इसे ऋषि कश्यप ने सिखाया, जो दैत्यों से युद्ध करते बालक गणेश की सुरक्षा को लेकर चिन्तित थे। यह मुद्गल एवं माण्डव्य जैसे ऋषियों के माध्यम से परम्परा में आया।
इसका पाठ दिन की तीन सन्धियों (प्रातः, मध्याह्न एवं सायं), मंगलवार एवं चतुर्थी को, तथा गणेश पूजा के समय करना सर्वोत्तम है। किसी नए कार्य, यात्रा या महत्त्वपूर्ण कार्य के आरम्भ से पूर्व भी रक्षा एवं सफलता हेतु इसका पाठ किया जाता है।
परम्परा के अनुसार यह विघ्नों का नाश करता है, भूत-प्रेत एवं काले जादू को भगाता है, विद्या को सिद्ध करता है, शरीर के प्रत्येक अंग की रक्षा करता है और समस्त धर्ममय कामनाएँ प्रदान करता है। नित्य पाठ भगवान गणपति के सायुज्य तक ले जाने वाला कहा गया है।

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