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गणेश कवचम् — Word-by-Word Meaning

गणेश कवचम्

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

कवचम्
Kavacham
कवच, रक्षाकवच
गणेशः
Ganeshah
भगवान गणेश, गणों के स्वामी
शिरः पातु
Shirah Patu
वे सिर की रक्षा करें
फालम्
Phalam
ललाट
गजाननः
Gajananah
गजमुख वाले
शूर्पकर्णः
Shurpakarnah
जिनके कान सूप के समान हैं
विनायकः
Vinayakah
परम नायक, विघ्नहर्ता
विघ्नराजः
Vighnarajah
समस्त विघ्नों के अधिपति राजा
वक्रतुण्डः
Vakratundah
वक्र सूँड वाले
विघ्नहा
Vighnaha
विघ्नों के नाशक
गणनाथः
Gananathah
देवगणों के स्वामी
धरणीधरः
Dharanidharah
पृथ्वी को धारण करने वाले
गजवक्त्रः
Gajavaktrah
गजमुख वाले
गणाधिपः
Ganadhipah
गणों के अधिपति
महाकायः
Mahakayah
विशाल एवं महान शरीर वाले
हेरम्बः
Herambah
दुर्बलों के रक्षक, गणेश का एक नाम
लम्बकर्णकः
Lambakarnakah
लम्बे झूलते कानों वाले
सर्वाङ्गानि
Sarvangani
समस्त अंग / सम्पूर्ण शरीर
डाकिनी शाकिनी
Dakini Shakini
अनिष्टकारी स्त्री-शक्तियाँ
कश्यपेन समीरितम्
Kashyapena Samiritam
ऋषि कश्यप द्वारा कहा गया
गाणपत्यम्
Ganapatyam
गणपति के सायुज्य की स्थिति/धाम
त्रिसन्ध्यम्
Trisandhyam
दिन की तीन सन्धियों में (प्रातः, मध्याह्न, सायं)

Complete Translation

(कश्यप देवी से बोले—) यह अत्यन्त चपल बालक (गणेश) बाल्यावस्था में ही दैत्यों का नाश कर देता है; हे मुनिश्रेष्ठ, आगे यह कौन-कौन से कार्य करेगा, यह मैं नहीं जानता। अनेक प्रकार के दुष्ट दैत्य साधुजनों के कुल-कण्टक हैं; यद्यपि वह उन्हें वश में करने में समर्थ है, फिर भी वह सुरक्षित रहेगा या नहीं—यह मैं नहीं जानता। इसलिए हे देवी, मैं श्रीगणेश-कवच कहता हूँ जो समस्त अर्थों की सिद्धि देने वाला है। जो इसे भक्ति से पढ़ता या धारण करता है, वह निश्चय ही सर्व-मनोरथ-सम्पन्न हो जाता है। गणेश मेरे सिर की रक्षा करें, गजानन ललाट की; शूर्पकर्ण मेरे नेत्रों की और विनायक नासिका की रक्षा करें। विघ्नराज मेरे कानों की और गिरां-वर (वाणीपति) जिह्वा की रक्षा करें; वक्रतुण्ड मुख की और विघ्नहा दाँतों की रक्षा करें। गणनाथ मेरे कपोलों की और शूर्पधर कानों की रक्षा करें; गणेशान वक्षःस्थल की और धरणीधर हृदय की रक्षा करें। गजवक्त्र मेरे उदर की और गणाधिप नाभि की रक्षा करें; महाकाय पीठ की और विघ्ननाशन कटि की रक्षा करें। हेरम्ब मेरे हाथों की और लम्बकर्ण मेरे चरणों की रक्षा करें; गजमुख स्वामी मेरे समस्त अंगों की सर्वत्र और सर्वदा रक्षा करें। इस प्रकार यह दिव्य कवच समस्त बाधाओं का नाशक है। जो महाभाग इसे धारण करता है, वह धन्य और मुनियों में श्रेष्ठ हो जाता है। जो पूजा के समय नित्य एकाग्रचित्त होकर भक्ति से इसका पाठ करता है, उसके विघ्न नष्ट हो जाते हैं और समस्त विद्याएँ सिद्ध हो जाती हैं। भूत, प्रेत, पिशाच तथा डाकिनी-शाकिनी—इस कवच के प्रभाव से उस (साधक) के दर्शनमात्र से नष्ट हो जाते हैं। यह गणेश-कवच कश्यप द्वारा कहा गया, और मुद्गल को तथा महर्षि माण्डव्य को (परम्परा से प्राप्त हुआ)। जो प्रतिदिन त्रिसन्ध्या में इसका पाठ करता है, वह सिद्धि प्राप्त करता है, समस्त कामनाओं को पाता है और गाणपत्य (गणपति के सायुज्य) को प्राप्त करता है।

Origin & History

Source: Ganesha Purana

Author: Traditional (taught by Sage Kashyapa)

Period: Ancient (Puranic)

गणेश कवचम् गणेश पुराण में आता है। ऋषि कश्यप ने बालक गणेश को बाल्यावस्था में ही शक्तिशाली दैत्यों का निर्भयता से नाश करते देखकर उस दिव्य शिशु की सुरक्षा को लेकर स्नेहपूर्ण चिन्ता से भर गए। उसकी—और तत्पश्चात् समस्त भक्तों की—रक्षा हेतु उन्होंने यह रक्षाकवच रचा, गणेश को उनके अनेक नामों से पुकारकर शरीर के प्रत्येक अंग की रक्षा का अनुरोध किया। यह कवच फिर मुद्गल एवं माण्डव्य सहित ऋषियों की परम्परा से प्रसारित हुआ और गाणपत्य परम्परा की सबसे प्रिय रक्षात्मक प्रार्थनाओं में से एक बन गया।

Frequently Asked Questions

गणेश कवचम् क्या है?
गणेश कवचम् का अर्थ है 'गणेश का कवच'। यह गणेश पुराण का एक रक्षात्मक स्तोत्र है जिसमें शरीर के प्रत्येक अंग को भगवान गणेश के किसी विशेष नाम या रूप की रक्षा में रखा जाता है, जिससे समस्त अनिष्ट के विरुद्ध एक आध्यात्मिक कवच बनता है।
गणेश कवचम् कहाँ से आया है?
यह परम्परागत रूप से गणेश पुराण से लिया गया है, जहाँ इसे ऋषि कश्यप ने सिखाया, जो दैत्यों से युद्ध करते बालक गणेश की सुरक्षा को लेकर चिन्तित थे। यह मुद्गल एवं माण्डव्य जैसे ऋषियों के माध्यम से परम्परा में आया।
गणेश कवचम् का पाठ कब करना चाहिए?
इसका पाठ दिन की तीन सन्धियों (प्रातः, मध्याह्न एवं सायं), मंगलवार एवं चतुर्थी को, तथा गणेश पूजा के समय करना सर्वोत्तम है। किसी नए कार्य, यात्रा या महत्त्वपूर्ण कार्य के आरम्भ से पूर्व भी रक्षा एवं सफलता हेतु इसका पाठ किया जाता है।
गणेश कवचम् के पाठ के क्या लाभ हैं?
परम्परा के अनुसार यह विघ्नों का नाश करता है, भूत-प्रेत एवं काले जादू को भगाता है, विद्या को सिद्ध करता है, शरीर के प्रत्येक अंग की रक्षा करता है और समस्त धर्ममय कामनाएँ प्रदान करता है। नित्य पाठ भगवान गणपति के सायुज्य तक ले जाने वाला कहा गया है।

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