गर्भ स्तुति — Complete Lyrics
गर्भ स्तुति
Sanskrit text with English transliteration and translation
Verse 1
सत्यव्रतं सत्यपरं त्रिसत्यं
सत्यस्य योनिं निहितं च सत्ये ।
सत्यस्य सत्यमृतसत्यनेत्रं
सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपन्नाः ॥ २६ ॥
satya-vrataṃ satya-paraṃ tri-satyaṃ
satyasya yoniṃ nihitaṃ ca satye |
satyasya satyam ṛta-satya-netraṃ
satyātmakaṃ tvāṃ śaraṇaṃ prapannāḥ || 26 ||
हम आपकी शरण में हैं, जिनका स्वरूप ही सत्य है — सत्यव्रत, परम सत्य, तीनों कालों में सत्य, सत्य के उद्गम, सत्य में निहित, सत्यों के भी सत्य, जिनके नेत्र (दृष्टि) अमोघ सत्य हैं, सत्यात्मक आप को हम शरण में प्राप्त हैं।
Verse 2
एकायनोऽसौ द्विफलस्त्रिमूल-
श्चतूरसः पञ्चविधः षडात्मा ।
सप्तत्वगष्टविटपो नवाक्षो
दशच्छदी द्विखगो ह्यादिवृक्षः ॥ २७ ॥
ekāyano 'sau dvi-phalas tri-mūlaś
catū-rasaḥ pañca-vidhaḥ ṣaḍ-ātmā |
sapta-tvag aṣṭa-viṭapo navākṣo
daśa-cchadī dvi-khago hy ādi-vṛkṣaḥ || 27 ||
यह आदिवृक्ष (यह जगत्/यह शरीर) एक आश्रय वाला, दो फलों वाला, तीन मूलों वाला, चार रसों वाला, पाँच प्रकार के ज्ञान वाला, छह स्वभावों वाला, सात छालों वाला, आठ शाखाओं वाला, नौ कोटरों वाला, दस पत्तों वाला और दो पक्षियों वाला है।
Verse 3
त्वमेक एवास्य सतः प्रसूति-
स्त्वं सन्निधानं त्वमनुग्रहश्च ।
त्वन्मायया संवृतचेतसस्त्वां
पश्यन्ति नाना न विपश्चितो ये ॥ २८ ॥
tvam eka evāsya sataḥ prasūtis
tvaṃ sannidhānaṃ tvam anugrahaś ca |
tvan-māyayā saṃvṛta-cetasas tvāṃ
paśyanti nānā na vipaścito ye || 28 ||
केवल आप ही इस सत् जगत् के उद्गम हैं, आप ही इसका आश्रय (स्थिति) और आप ही इसका संहार (अनुग्रह) हैं। जिनका चित्त आपकी माया से ढका है वे ही नाना भेद देखते हैं, विवेकी जन नहीं।
Verse 4
बिभर्षि रूपाण्यवबोध आत्मा
क्षेमाय लोकस्य चराचरस्य ।
सत्त्वोपपन्नानि सुखावहानि
सतामभद्राणि मुहुः खलानाम् ॥ २९ ॥
bibharṣi rūpāṇy avabodha ātmā
kṣemāya lokasya carācarasya |
sattvopapannāni sukhāvahāni
satām abhadrāṇi muhuḥ khalānām || 29 ||
हे ज्ञानस्वरूप! आप चराचर जगत् के कल्याण के लिए विविध रूप धारण करते हैं — सत्त्वमय, सुखकारक रूप, जो सन्तों के लिए मंगलकारी और दुष्टों के लिए बारम्बार अमंगलकारी होते हैं।
Verse 5
त्वय्यम्बुजाक्षाखिलसत्त्वधाम्नि
समाधिनावेशितचेतसैके ।
त्वत्पादपोतेन महत्कृतेन
कुर्वन्ति गोवत्सपदं भवाब्धिम् ॥ ३० ॥
tvayy ambujākṣākhila-sattva-dhāmni
samādhināveśita-cetasaike |
tvat-pāda-potena mahat-kṛtena
kurvanti go-vatsa-padaṃ bhavābdhim || 30 ||
हे कमलनयन! समस्त सत्त्व के धाम आप में जिन्होंने समाधि द्वारा चित्त लगाया है, वे महापुरुषों द्वारा सम्मानित आपके चरणकमलरूपी नौका के सहारे इस भवसागर को बछड़े के खुर के गड्ढे के समान (सुगम) बना लेते हैं।
Verse 6
स्वयं समुत्तीर्य सुदुस्तरं द्युमन्
भवार्णवं भीममदभ्रसौहृदाः ।
भवत्पदाम्भोरुहनावमत्र ते
निधाय याताः सदनुग्रहो भवान् ॥ ३१ ॥
svayaṃ samuttīrya sudustaraṃ dyuman
bhavārṇavaṃ bhīmam adabhra-sauhṛdāḥ |
bhavat-padāmbhoruha-nāvam atra te
nidhāya yātāḥ sad-anugraho bhavān || 31 ||
हे स्वयंप्रकाश! वे अपार करुणावान् भक्त इस दुस्तर एवं भयानक भवसागर को स्वयं पार करके, यहाँ दूसरों के लिए आपके चरणकमलरूपी नौका को छोड़ जाते हैं — क्योंकि आप भक्तों पर परम अनुग्रहशील हैं।
Verse 7
येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिन-
स्त्वय्यस्तभावादविशुद्धबुद्धयः ।
आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं ततः
पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रयः ॥ ३२ ॥
ye 'nye 'ravindākṣa vimukta-māninas
tvayy asta-bhāvād aviśuddha-buddhayaḥ |
āruhya kṛcchreṇa paraṃ padaṃ tataḥ
patanty adho 'nādṛta-yuṣmad-aṅghrayaḥ || 32 ||
हे कमलनयन! जो अन्य लोग अपने को मुक्त मान बैठते हैं, किन्तु आप में भक्ति न होने से जिनकी बुद्धि अशुद्ध है, वे बड़े कष्ट से परमपद तक चढ़कर भी आपके चरणों की उपेक्षा के कारण पुनः नीचे गिर जाते हैं।
Verse 8
तथा न ते माधव तावकाः क्वचिद्
भ्रश्यन्ति मार्गात्त्वयि बद्धसौहृदाः ।
त्वयाभिगुप्ता विचरन्ति निर्भया
विनायकानीकपमूर्धसु प्रभो ॥ ३३ ॥
tathā na te mādhava tāvakāḥ kvacid
bhraśyanti mārgāt tvayi baddha-sauhṛdāḥ |
tvayābhiguptā vicaranti nirbhayā
vināyakānīkapa-mūrdhasu prabho || 33 ||
परन्तु, हे माधव! आप में दृढ़ प्रेम से बँधे आपके भक्त मार्ग से कभी नहीं गिरते; आपसे सुरक्षित होकर वे विघ्नों के सेनापतियों के सिरों पर पैर रखते हुए निर्भय विचरते हैं।
Verse 9
सत्त्वं विशुद्धं श्रयते भवान् स्थितौ
शरीरिणां श्रेयउपायनं वपुः ।
वेदक्रियायोगतपःसमाधिभि-
स्तवार्हणं येन जनः समीहते ॥ ३४ ॥
sattvaṃ viśuddhaṃ śrayate bhavān sthitau
śarīriṇāṃ śreya-upāyanaṃ vapuḥ |
veda-kriyā-yoga-tapaḥ-samādhibhis
tavārhaṇaṃ yena janaḥ samīhate || 34 ||
स्थिति (पालन) के समय आप विशुद्ध सत्त्व का आश्रय लेते हैं, जो देहधारियों के लिए परम कल्याणकारी रूप है — जिसकी आराधना वेद, कर्म, योग, तप और समाधि द्वारा मनुष्य अपने श्रेय के लिए करते हैं।
Verse 10
सत्त्वं न चेद्धातरिदं निजं भवेद्
विज्ञानमज्ञानभिदापमार्जनम् ।
गुणप्रकाशैरनुमीयते भवान्
प्रकाशते यस्य च येन वा गुणः ॥ ३५ ॥
sattvaṃ na ced dhātar idaṃ nijaṃ bhaved
vijñānam ajñāna-bhidāpamārjanam |
guṇa-prakāśair anumīyate bhavān
prakāśate yasya ca yena vā guṇaḥ || 35 ||
हे विधाता! यदि आपका यह विशुद्ध सत्त्वमय रूप — जो अज्ञान का नाश करने वाला विज्ञान है — प्रकट न होता, तो आपका अस्तित्व केवल गुणों के कार्यों से अनुमित होता; क्योंकि जिस गुण से सब प्रकाशित होता है, उसी से आप जाने जाते हैं।
Verse 11
न नामरूपे गुणजन्मकर्मभि-
र्निरूपितव्ये तव तस्य साक्षिणः ।
मनोवचोभ्यामनुमेयवर्त्मनो
देव क्रियायां प्रतियन्त्यथापि हि ॥ ३६ ॥
na nāma-rūpe guṇa-janma-karmabhir
nirūpitavye tava tasya sākṣiṇaḥ |
mano-vacobhyām anumeya-vartmano
deva kriyāyāṃ pratiyanty athāpi hi || 36 ||
गुण, जन्म और कर्म से जिनके नाम-रूप निरूपित नहीं किए जा सकते — आप उन सबके साक्षी हैं, आपका मार्ग मन और वाणी से ही (भक्तिपूर्वक) अनुमेय है; फिर भी आपकी लीला-क्रियाओं द्वारा लोग आपको पहचान लेते हैं।
Verse 12
शृण्वन्गृणन्संस्मरयंश्च चिन्तयन्
नामानि रूपाणि च मङ्गलानि ते ।
क्रियासु यस्त्वच्चरणारविन्दयो-
राविष्टचेता न भवाय कल्पते ॥ ३७ ॥
śṛṇvan gṛṇan saṃsmarayaṃś ca cintayan
nāmāni rūpāṇi ca maṅgalāni te |
kriyāsu yas tvac-caraṇāravindayor
āviṣṭa-cetā na bhavāya kalpate || 37 ||
जो मनुष्य किसी भी कार्य को करते हुए आपके मंगलमय नामों और रूपों का श्रवण, कीर्तन, स्मरण और चिन्तन करते हुए आपके चरणकमलों में चित्त लगा देता है, वह पुनः जन्म के योग्य नहीं रहता।
Verse 13
दिष्ट्या हरेऽस्या भवतः पदो भुवो
भारोऽपनीतस्तव जन्मनेशितुः ।
दिष्ट्याङ्कितां त्वत्पदकैः सुशोभनै-
र्द्रक्ष्याम गां द्यां च तवानुकम्पिताम् ॥ ३८ ॥
diṣṭyā hare 'syā bhavataḥ pado bhuvo
bhāro 'panītas tava janmaneśituḥ |
diṣṭyāṅkitāṃ tvat-padakaiḥ suśobhanair
drakṣyāma gāṃ dyāṃ ca tavānukampitām || 38 ||
हे हरि! सौभाग्य से, ईश्वर रूप आपके जन्म से इस पृथ्वी का भार उतर गया; और सौभाग्य से हम आपके चरणों के सुन्दर चिह्नों से अंकित, आपकी अनुकम्पा से सुशोभित इस पृथ्वी तथा स्वर्ग को भी देखेंगे।
Verse 14
न तेऽभवस्येश भवस्य कारणं
विना विनोदं बत तर्कयामहे ।
भवो निरोधः स्थितिरप्यविद्यया
कृता यतस्त्वय्यभयाश्रयात्मनि ॥ ३९ ॥
na te 'bhavasyeśa bhavasya kāraṇaṃ
vinā vinodaṃ bata tarkayāmahe |
bhavo nirodhaḥ sthitir apy avidyayā
kṛtā yatas tvayy abhayāśrayātmani || 39 ||
हे ईश! आप जन्मरहित हैं — आपके अवतार का आपकी लीला के अतिरिक्त हम कोई कारण नहीं सोच पाते; क्योंकि यद्यपि सृष्टि, संहार और स्थिति अविद्या से होती हैं, फिर भी वे अभय आश्रय रूप आप में ही टिकी हैं।
Verse 15
मत्स्याश्वकच्छपनृसिंहवराहहंस-
राजन्यविप्रविबुधेषु कृतावतारः ।
त्वं पासि नस्त्रिभुवनं च यथाधुनेश
भारं भुवो हर यदूत्तम वन्दनं ते ॥ ४० ॥
matsyāśva-kacchapa-nṛsiṃha-varāha-haṃsa-
rājanya-vipra-vibudheṣu kṛtāvatāraḥ |
tvaṃ pāsi nas tri-bhuvanaṃ ca yathādhuneśa
bhāraṃ bhuvo hara yadūttama vandanaṃ te || 40 ||
मत्स्य, अश्व, कच्छप, नृसिंह, वराह, हंस तथा क्षत्रियों, ब्राह्मणों और देवताओं में अवतार लेने वाले हे प्रभो! जैसे आप इस समय हमारी और त्रिभुवन की रक्षा कर रहे हैं, वैसे ही, हे यदुश्रेष्ठ! पृथ्वी का भार हरिए। आपको हमारा नमस्कार है।
Verse 16
दिष्ट्याम्ब ते कुक्षिगतः परः पुमा-
नंशेन साक्षाद्भगवान् भवाय नः ।
माभूद्भयं भोजपतेर्मुमूर्षो-
र्गोप्ता यदूनां भविता तवात्मजः ॥ ४१ ॥
diṣṭyāmba te kukṣi-gataḥ paraḥ pumān
aṃśena sākṣād bhagavān bhavāya naḥ |
mābhūd bhayaṃ bhoja-pater mumūrṣor
goptā yadūnāṃ bhavitā tavātmajaḥ || 41 ||
हे माता देवकी! सौभाग्य से साक्षात् परमपुरुष भगवान् अपने अंश सहित हमारे कल्याण के लिए आपके गर्भ में आए हैं। मरणासन्न भोजराज (कंस) से तनिक भी भयभीत न हों — आपका पुत्र यदुवंश का रक्षक होगा।
Want to understand every word?
Read Word-by-Word Meaning →