गोपिका गीत PDF
गोपिका गीत की पूरी लिरिक्स — संस्कृत, रोमन व अर्थ सहित। एक क्लिक में PDF सेव करें या प्रिंट करें।
गोप्य ऊचुः - जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि । दयित दृश्यतां दिक्षु तावका- स्त्वयि धृतासवस्त्वां विचिन्वते ॥
gopya ūcuḥ - jayati te'dhikaṃ janmanā vrajaḥ śrayata indirā śaśvad-atra hi | dayita dṛśyatāṃ dikṣu tāvakās- tvayi dhṛtāsavas-tvāṃ vicinvate ||
गोपियाँ बोलीं — आपके जन्म लेने से व्रज की भूमि सबसे अधिक महिमामण्डित हो गई है, इसीलिए यहाँ इन्दिरा (लक्ष्मी) सदा निवास करती हैं। हे प्रियतम! हम पर दृष्टि डालिए — हम आपकी हैं, जिन्होंने अपने प्राण आप में रख दिए हैं और हर दिशा में आपको खोज रही हैं।
शरदुदाशये साधुजातस- त्सरसिजोदरश्रीमुषा दृशा । सुरतनाथ तेऽशुल्कदासिका वरद निघ्नतो नेह किं वधः ॥
śarad-udāśaye sādhu-jāta-sat- sarasijodara-śrī-muṣā dṛśā | surata-nātha te'śulka-dāsikā varada nighnato neha kiṃ vadhaḥ ||
हे हमारे प्रेम के स्वामी! शरद् ऋतु के सरोवर में खिले उत्तम कमल के गर्भ की शोभा को चुरा लेने वाली अपनी चितवन से आप हमें घायल करते हैं। हम तो आपकी बिना मोल खरीदी दासियाँ हैं — हे वरदायक! इस प्रकार हमें मारना क्या वध नहीं है?
विषजलाप्ययाद्व्यालराक्षसा- द्वर्षमारुताद्वैद्युतानलात् । वृषमयात्मजाद्विश्वतोभया- दृषभ ते वयं रक्षिता मुहुः ॥
viṣa-jalāpyayād-vyāla-rākṣasād- varṣa-mārutād-vaidyutānalāt | vṛṣa-mayātmajād-viśvato-bhayād- ṛṣabha te vayaṃ rakṣitā muhuḥ ||
हे पुरुषश्रेष्ठ! आपने बारम्बार हमारी रक्षा की है — यमुना के विषैले जल से, कालिय सर्प तथा राक्षसों (अघ, बक आदि) से, इन्द्र की भयंकर वर्षा-आँधी और विद्युत्-अग्नि से, वृषभासुर तथा मय के पुत्र (व्योमासुर) से — संसार के समस्त भयों से।
न खलु गोपिकानन्दनो भवा- नखिलदेहिनामन्तरात्मदृक् । विखनसार्थितो विश्वगुप्तये सख उदेयिवान्सात्वतां कुले ॥
na khalu gopikā-nandano bhavān- akhila-dehinām-antarātma-dṛk | vikhanasārthito viśva-guptaye sakha udeyivān-sātvatāṃ kule ||
हे सखा! आप वास्तव में केवल गोपिका (यशोदा) के पुत्र नहीं हैं; आप समस्त देहधारियों के अन्तरात्मा साक्षी हैं। ब्रह्मा की प्रार्थना पर आप विश्व की रक्षा हेतु सात्वत कुल में अवतीर्ण हुए हैं।
विरचिताभयं वृष्णिधूर्य ते चरणमीयुषां संसृतेर्भयात् । करसरोरुहं कान्त कामदं शिरसि धेहि नः श्रीकरग्रहम् ॥
viracitābhayaṃ vṛṣṇi-dhūrya te caraṇam-īyuṣāṃ saṃsṛter-bhayāt | kara-saroruhaṃ kānta kāma-daṃ śirasi dhehi naḥ śrī-kara-graham ||
हे वृष्णिश्रेष्ठ! जो संसार के भय से आपके चरणों की शरण में आते हैं, उन्हें आपका करकमल अभय तथा समस्त कामनाएँ प्रदान करता है — वही कर जिसने श्री (लक्ष्मी) का पाणिग्रहण किया। हे प्रियतम! वह हाथ हमारे सिर पर रखिए।
व्रजजनार्तिहन्वीर योषितां निजजनस्मयध्वंसनस्मित । भज सखे भवत्किङ्करीः स्म नो जलरुहाननं चारु दर्शय ॥
vraja-janārti-han-vīra yoṣitāṃ nija-jana-smaya-dhvaṃsana-smita | bhaja sakhe bhavat-kiṅkarīḥ sma no jala-ruhānanaṃ cāru darśaya ||
हे व्रजवासियों की पीड़ा हरने वाले वीर! हे अपने भक्तों के गर्व को मिटाने वाली मुस्कान वाले! हे सखा! हम आपकी दासियों को स्वीकार कीजिए और अपना सुन्दर कमल-मुख दिखाइए।
प्रणतदेहिनां पापकर्शनं तृणचरानुगं श्रीनिकेतनम् । फणिफणार्पितं ते पदाम्बुजं कृणु कुचेषु नः कृन्धि हृच्छयम् ॥
praṇata-dehināṃ pāpa-karśanaṃ tṛṇa-carānugaṃ śrī-niketanam | phaṇi-phaṇārpitaṃ te padāmbujaṃ kṛṇu kuceṣu naḥ kṛndhi hṛc-chayam ||
आपके चरणकमल शरणागत प्राणियों के पापों का नाश करते हैं, गौओं के पीछे चरागाहों में चलते हैं, लक्ष्मी के निवास हैं, और कालिय की फणों पर रखे गए — वे चरण हमारे वक्षःस्थल पर रखिए और हमारे हृदय की कामज्वाला को मिटा दीजिए।
मधुरया गिरा वल्गुवाक्यया बुधमनोज्ञया पुष्करेक्षण । विधिकरीरिमा वीर मुह्यती- रधरसीधुनाप्याययस्व नः ॥
madhurayā girā valgu-vākyayā budha-manojñayā puṣkarekṣaṇa | vidhi-karīr-imā vīra muhyatīr- adhara-sīdhunāpyāyayasva naḥ ||
हे कमलनयन! आपकी मधुर वाणी और सुन्दर वचन, जो विद्वानों के मन को भी मोह लेते हैं, हमें मुग्ध कर देते हैं। हे वीर! अपने अधरों के अमृत से अपनी इन दासियों को जीवित कीजिए।
तव कथामृतं तप्तजीवनं कविभिरीडितं कल्मषापहम् । श्रवणमङ्गलं श्रीमदाततं भुवि गृणन्ति ते भूरिदा जनाः ॥
tava kathāmṛtaṃ tapta-jīvanaṃ kavibhir-īḍitaṃ kalmaṣāpaham | śravaṇa-maṅgalaṃ śrīmad-ātataṃ bhuvi gṛṇanti te bhūri-dā janāḥ ||
आपकी कथा का अमृत संसार-ताप से संतप्त जीवों के लिए जीवन है; इसे कविगण गाते हैं, यह समस्त पापों को हरता है, सुनने में मंगलमय तथा श्रीसम्पन्न है। जो इन कथाओं को भूमि पर फैलाते हैं, वे ही सबसे अधिक दान देने वाले हैं।
प्रहसितं प्रिय प्रेमवीक्षणं विहरणं च ते ध्यानमङ्गलम् । रहसि संविदो या हृदिस्पृशः कुहक नो मनः क्षोभयन्ति हि ॥
prahasitaṃ priya prema-vīkṣaṇaṃ viharaṇaṃ ca te dhyāna-maṅgalam | rahasi saṃvido yā hṛdi-spṛśaḥ kuhaka no manaḥ kṣobhayanti hi ||
हे प्रिय! आपकी मुस्कान, प्रेमभरी चितवन और आपकी लीलाएँ — इनका ध्यान मंगलमय है; और एकान्त में हृदय को छू लेने वाली वे गुप्त बातें हमारे मन को विचलित कर देती हैं, हे छलिया!