हनुमान स्तुति (अतुलितबलधामं) PDF
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अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम् । सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि ॥
Atulita-Bala-Dhamam Hema-Shailabha-Deham Danuja-Vana-Krishanum Jnaninam-Agraganyam | Sakala-Guna-Nidhanam Vananam-Adhisham Raghupati-Priya-Bhaktam Vatajatam Namami ||
मैं पवनपुत्र को प्रणाम करता हूँ — जो अतुलनीय बल के धाम हैं, जिनका शरीर स्वर्णगिरि (सुमेरु) के समान दीप्तिमान है, जो दानवरूपी वन के लिए प्रचण्ड अग्नि हैं, ज्ञानियों में अग्रगण्य, समस्त गुणों के निधान, वानरों के अधीश एवं रघुपति (श्रीराम) के परमप्रिय भक्त हैं।
गोष्पदीकृतवारीशं मशकीकृतराक्षसम् । रामायणमहामालारत्नं वन्देऽनिलात्मजम् ॥
Goshpadi-Krita-Varisham Mashaki-Krita-Rakshasam | Ramayana-Maha-Mala-Ratnam Vande-'nilatmajam ||
मैं अनिलपुत्र की वन्दना करता हूँ, जिन्होंने विशाल समुद्र को गाय के खुर के गड्ढे के जल के समान बना दिया, राक्षसों को मच्छर के समान तुच्छ कर दिया, और जो रामायणरूपी महामाला के रत्न हैं।
यत्र यत्र रघुनाथकीर्तनं तत्र तत्र कृतमस्तकाञ्जलिम् । भाष्पवारिपरिपूर्णलोचनं मारुतिं नमत राक्षसान्तकम् ॥
Yatra Yatra Raghunatha-Kirtanam Tatra Tatra Krita-Mastaka-Anjalim | Bhashpa-Vari-Paripurna-Lochanam Marutim Namata Rakshasantakam ||
जहाँ-जहाँ रघुनाथ (श्रीराम) का कीर्तन होता है, वहाँ-वहाँ हनुमान सिर झुकाकर मस्तक पर हाथ जोड़े, प्रेमाश्रुओं से पूर्ण नेत्रों के साथ उपस्थित रहते हैं — उन राक्षसान्तक मारुति को प्रणाम करो।