हनुमान स्तुति (अतुलितबलधामं)
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✦ अर्थ
'अतुलितबलधामं' से आरम्भ होने वाली हनुमान स्तुति, हनुमान जी की प्रसिद्ध तीन ध्यान-श्लोकों की माला है, जिसका पाठ परम्परागत रूप से सुन्दरकाण्ड एवं हनुमान पूजा के आरम्भ में किया जाता है। पहला श्लोक उनके अतुल बल, स्वर्णिम रूप, ज्ञान एवं रामभक्ति की स्तुति करता है; दूसरा बताता है कि कैसे उन्होंने समुद्र को गड्ढे के जल और राक्षसों को मच्छर के समान कर दिया; तीसरा वर्णन करता है कि जहाँ राम का नाम गाया जाता है वहाँ वे प्रेमाश्रुओं सहित खड़े रहते हैं। प्रथम श्लोक रामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड के संस्कृत मंगलाचरण के रूप में आता है।
उत्पत्ति और कथा
Dhyana-shlokas of Hanuman; the first verse is the Sanskrit invocation (mangalacharana) of Sundara Kanda in Goswami Tulsidas's Ramcharitmanas · Traditional; the opening verse is part of Tulsidas's Ramcharitmanas (Sundara Kanda) · 16th century CE and earlier (traditional)
ये श्लोक वह परम्परागत ध्यान बनाते हैं जिनसे भक्त सुन्दरकाण्ड का पाठ आरम्भ करते हैं — रामायण का वह काण्ड जो हनुमान की लंका-यात्रा का वर्णन करता है। गोस्वामी तुलसीदास अपने सुन्दरकाण्ड का आरम्भ संस्कृत श्लोक 'अतुलितबलधामं' से करते हैं, हनुमान के पराक्रमों का वर्णन करने से पूर्व उनका आवाहन करते हुए। साथी श्लोक 'गोष्पदीकृतवारीशं' एवं 'यत्र यत्र रघुनाथकीर्तनं' भी समान रूप से प्रिय हैं, जिनमें अन्तिम हनुमान को प्रत्येक राम-कीर्तन में सदा उपस्थित, अश्रुपूरित भक्त के रूप में चित्रित करता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
'यत्र यत्र रघुनाथकीर्तनं' श्लोक इस प्रिय विश्वास को प्रतिष्ठित करता है कि हनुमान प्रत्येक स्थान पर अदृश्य रूप से उपस्थित रहते हैं जहाँ राम का नाम गाया जाता है; इसीलिए भक्त रामायण पाठ में उनके लिए एक आसन रखते हैं, और अनेक बताते हैं कि सुन्दरकाण्ड से पूर्व इन पंक्तियों के जप पर वे उनकी जीवन्त उपस्थिति का अनुभव करते हैं।
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अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम् । सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि ॥
Atulita-Bala-Dhamam Hema-Shailabha-Deham Danuja-Vana-Krishanum Jnaninam-Agraganyam | Sakala-Guna-Nidhanam Vananam-Adhisham Raghupati-Priya-Bhaktam Vatajatam Namami ||
अर्थ:मैं पवनपुत्र को प्रणाम करता हूँ — जो अतुलनीय बल के धाम हैं, जिनका शरीर स्वर्णगिरि (सुमेरु) के समान दीप्तिमान है, जो दानवरूपी वन के लिए प्रचण्ड अग्नि हैं, ज्ञानियों में अग्रगण्य, समस्त गुणों के निधान, वानरों के अधीश एवं रघुपति (श्रीराम) के परमप्रिय भक्त हैं।
गोष्पदीकृतवारीशं मशकीकृतराक्षसम् । रामायणमहामालारत्नं वन्देऽनिलात्मजम् ॥
Goshpadi-Krita-Varisham Mashaki-Krita-Rakshasam | Ramayana-Maha-Mala-Ratnam Vande-'nilatmajam ||
अर्थ:मैं अनिलपुत्र की वन्दना करता हूँ, जिन्होंने विशाल समुद्र को गाय के खुर के गड्ढे के जल के समान बना दिया, राक्षसों को मच्छर के समान तुच्छ कर दिया, और जो रामायणरूपी महामाला के रत्न हैं।
यत्र यत्र रघुनाथकीर्तनं तत्र तत्र कृतमस्तकाञ्जलिम् । भाष्पवारिपरिपूर्णलोचनं मारुतिं नमत राक्षसान्तकम् ॥
Yatra Yatra Raghunatha-Kirtanam Tatra Tatra Krita-Mastaka-Anjalim | Bhashpa-Vari-Paripurna-Lochanam Marutim Namata Rakshasantakam ||
अर्थ:जहाँ-जहाँ रघुनाथ (श्रीराम) का कीर्तन होता है, वहाँ-वहाँ हनुमान सिर झुकाकर मस्तक पर हाथ जोड़े, प्रेमाश्रुओं से पूर्ण नेत्रों के साथ उपस्थित रहते हैं — उन राक्षसान्तक मारुति को प्रणाम करो।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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हनुमान स्तुति (अतुलितबलधामं) पाठ के लाभ
किसी भी पूजा या सुन्दरकाण्ड पाठ के आरम्भ में हनुमान के अमाप बल, साहस एवं रक्षा का आवाहन करता है
राम के नाम पर प्रेम से अश्रुपूरित हनुमान का स्मरण कराकर भक्ति (भक्ति) के आदर्श को विकसित करता है
ज्ञान प्रदान करता है, क्योंकि यह हनुमान को ज्ञानियों में अग्रगण्य कहकर स्तुति करता है
संक्षिप्त, सरलता से कण्ठस्थ, और परम्परागत रूप से सुन्दरकाण्ड पाठ से पूर्व इसके पूर्ण फल हेतु जपा जाता है
मच्छर के समान राक्षसों को तुच्छ करने का स्मरण कराकर भय एवं नकारात्मकता दूर करता है
अपने प्रिय सेवक हनुमान के प्रति भक्ति द्वारा श्रीराम की कृपा खींचता है
हनुमान स्तुति (अतुलितबलधामं) जप विधि
श्री हनुमान की छवि के सम्मुख बैठें। तीनों ध्यान-श्लोकों को एकाग्रता से जपें, हनुमान के स्वर्णिम, बलशाली रूप एवं राम के प्रति उनकी अश्रुपूर्ण भक्ति की कल्पना करते हुए। ये श्लोक सुन्दरकाण्ड पारायण एवं हनुमान चालीसा से पूर्व का परम्परागत आवाहन (ध्यान) हैं, अतः पाठ को पवित्र करने हेतु इन्हें पहले जपें। इन्हें तीन या अधिक बार दोहराया जा सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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