हनुमत् पञ्चरत्नम्
अन्य नाम / खोज: shamshamshamsiddhanatham pranamati caranam vayuputram ca raudram · hanumat pancharatnam lyrics
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✦ अर्थ
हनुमत् पञ्चरत्नम् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित हनुमान की स्तुति में 'पाँच रत्न' हैं — पवनपुत्र, सीता-राम के भक्त सेवक की वंदना करते पाँच रत्न-श्लोक। यह बल के सागर और भक्ति के मूर्तरूप हनुमान को समर्पित एक संस्कृत स्तोत्र है। मंगलवार और शनिवार को इसका पाठ विशेष शुभ माना जाता है।
उत्पत्ति और कथा
Ascribed to Adi Shankaracharya · Adi Shankaracharya · Classical
हनुमत् पञ्चरत्नम् परम्परा से आदि शंकराचार्य को आरोपित है। आदि शंकराचार्य द्वारा रचित हनुमान की स्तुति में 'पाँच रत्न' — पवनपुत्र, सीता-राम के भक्त सेवक, बल के सागर और भक्ति के मूर्तरूप को वंदन करते पाँच रत्न-श्लोक।
✦ शास्त्रों में वर्णित
कहा जाता है कि सच्चे और भक्तिपूर्ण हृदय से हनुमत् पञ्चरत्नम् का पाठ करना दिव्य की कृपा के निकट पहुँचना है, जो प्रेमपूर्वक पुकारने वालों को कभी नहीं त्यागती।
मंत्र
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(भगवत्पादानां रामभुजङ्गतः) शंशंशंसिद्धनाथं प्रणमति चरणं वायुपुत्रं च रौद्रं वंवंवंविश्वरूपं हहहहहसितं गर्जितं मेघक्षत्रम् । (मेघछत्रम्) तंतंत्रैलोक्यनाथं तपति दिनकरं तं त्रिनेत्रस्वरूपं कंकंकन्दर्पवश्यं कमलमनहरं शाकिनीकालरूपम् ॥ १॥ रंरंरंरामदूतं रणगजदमितं रावणच्छेददक्षं बंबंबंबालरूपं नतगिरिचरणं कम्पितं सूर्यबिम्बम् । मंमंमंमन्त्रसिद्धिं कपिकुलतिलकं मर्दनं शाकिनीनां हुंहूंहुङ्कारबीजं हनति हनुमतं हन्यते शत्रुसैन्यम् ॥ २॥ दंदंदंदीर्घरूपं धरकरशिखरं पातितं मेघनादं ऊँऊँउच्चाटितं वै सकलभुवतलं योगिनीवृन्दरूपम् । क्षंक्षंक्षंक्षिप्रवेगं क्रमति च जलधिं ज्वालितं रक्षदुर्गं क्षेंक्षेंक्षें क्षेमतत्त्वं दनुरुहकुलं मुच्यते बिम्बकारम् ॥ ३॥ कंकंकंकालदुष्टं जलनिधितरणं राक्षसानां विनाशे दक्षं श्रेष्ठं कवीनां त्रिभुवनचरतां प्राणिनां प्राणरूपम् । ह्रांह्रांह्रांह्रासतत्त्वं त्रिभुवनरचितं दैवतं सर्वभूते देवानां च त्रयाणां फणिभुवनधरं व्यापकं वायुरूपम् ॥ ४॥ त्वंत्वंत्वंवेदतत्त्वं बहुऋचयजुषं साम चाऽथर्वरूपं कंकंकंकन्दने त्वं ननु कमलतले राक्षसान् रौद्ररूपान् । खंखंखंखड्गहस्तं झटिति भुवितले त्रोटितं नागपाशं ॐॐॐकाररूपं त्रिभुवनपठितं वेदमन्त्राधिमन्त्रम् ॥ ५॥ सङ्ग्रामे शत्रुमध्ये जलनिधितरणे व्याघ्रसिंहे च सर्पे राजद्वारे च मार्गे गिरिगुहविवरे चोषरे कन्दरे वा । भूतप्रेतादियुक्ते ग्रहगणविषये शाकिनीडाकिनीनां देशे विस्फोटकानां ज्वरवमनशिरःपीडने नाशकस्त्वम् ॥ ६॥ इति श्रीहरिकृष्णविनिर्मिते बृहज्ज्योतिषार्णवधर्मस्कन्धान्तर्गतं हनुमत्पञ्चरत्नस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।
(bhagavatpādānāṃ rāmabhujaṅgataḥ) śaṃśaṃśaṃsiddhanāthaṃ praṇamati caraṇaṃ vāyuputraṃ ca raudraṃ vaṃvaṃvaṃviśvarūpaṃ hahahahahasitaṃ garjitaṃ meghakṣatram | (meghachatram) taṃtaṃtrailokyanāthaṃ tapati dinakaraṃ taṃ trinetrasvarūpaṃ kaṃkaṃkandarpavaśyaṃ kamalamanaharaṃ śākinīkālarūpam || 1|| raṃraṃraṃrāmadūtaṃ raṇagajadamitaṃ rāvaṇacchedadakṣaṃ baṃbaṃbaṃbālarūpaṃ natagiricaraṇaṃ kampitaṃ sūryabimbam | maṃmaṃmaṃmantrasiddhiṃ kapikulatilakaṃ mardanaṃ śākinīnāṃ huṃhūṃhuṅkārabījaṃ hanati hanumataṃ hanyate śatrusainyam || 2|| daṃdaṃdaṃdīrgharūpaṃ dharakaraśikharaṃ pātitaṃ meghanādaṃ ū~ū~uccāṭitaṃ vai sakalabhuvatalaṃ yoginīvṛndarūpam | kṣaṃkṣaṃkṣaṃkṣipravegaṃ kramati ca jaladhiṃ jvālitaṃ rakṣadurgaṃ kṣeṃkṣeṃkṣeṃ kṣematattvaṃ danuruhakulaṃ mucyate bimbakāram || 3|| kaṃkaṃkaṃkāladuṣṭaṃ jalanidhitaraṇaṃ rākṣasānāṃ vināśe dakṣaṃ śreṣṭhaṃ kavīnāṃ tribhuvanacaratāṃ prāṇināṃ prāṇarūpam | hrāṃhrāṃhrāṃhrāsatattvaṃ tribhuvanaracitaṃ daivataṃ sarvabhūte devānāṃ ca trayāṇāṃ phaṇibhuvanadharaṃ vyāpakaṃ vāyurūpam || 4|| tvaṃtvaṃtvaṃvedatattvaṃ bahuṛcayajuṣaṃ sāma cā'tharvarūpaṃ kaṃkaṃkaṃkandane tvaṃ nanu kamalatale rākṣasān raudrarūpān | khaṃkhaṃkhaṃkhaḍgahastaṃ jhaṭiti bhuvitale troṭitaṃ nāgapāśaṃ oṃoṃoṃkārarūpaṃ tribhuvanapaṭhitaṃ vedamantrādhimantram || 5|| saṅgrāme śatrumadhye jalanidhitaraṇe vyāghrasiṃhe ca sarpe rājadvāre ca mārge giriguhavivare coṣare kandare vā | bhūtapretādiyukte grahagaṇaviṣaye śākinīḍākinīnāṃ deśe visphoṭakānāṃ jvaravamanaśiraḥpīḍane nāśakastvam || 6|| iti śrīharikṛṣṇavinirmite bṛhajjyotiṣārṇavadharmaskandhāntargataṃ hanumatpañcaratnastotraṃ sampūrṇam |
अर्थ:आदि शंकराचार्य के हनुमान की स्तुति में "पाँच रत्न" — पवन-पुत्र, सीता-राम के भक्त सेवक, बल के सागर व भक्ति के मूर्तरूप को वंदन करते पाँच रत्न-श्लोक।
हनुमत् पञ्चरत्नम् पाठ के लाभ
हनुमत् पञ्चरत्नम् का पाठ देवता की कृपा, आशीर्वाद और रक्षा लाने वाला माना जाता है।
भक्ति को बढ़ाता है, मन को शान्त करता है और भगवान के स्मरण में हृदय को स्थिर करता है।
मंगलवार और शनिवार को, तथा हनुमान जयन्ती के समय सर्वाधिक शुभ।
एक अनमोल संस्कृत स्तोत्र, श्रद्धा सहित नित्य पाठ के लिए उपयुक्त।
हनुमत् पञ्चरत्नम् जप विधि
स्नान करके देवता की प्रतिमा के सम्मुख पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें। एक दीप जलाएँ और हनुमत् पञ्चरत्नम् का धीरे-धीरे भक्ति सहित पाठ करें। इसका पाठ नित्य, अथवा विशेषकर मंगलवार और शनिवार को तथा हनुमान जयन्ती के समय किया जा सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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