कौपीनपञ्चकम् PDF
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वेदान्तवाक्येषु सदा रमन्तो भिक्षान्नमात्रेण च तुष्टिमन्तः। विशोकमन्तःकरणे चरन्तः कौपीनवन्तः खलु भाग्यवन्तः॥१॥
vedānta-vākyeṣu sadā ramanto bhikṣānna-mātreṇa ca tuṣṭimantaḥ | viśokam antaḥkaraṇe carantaḥ kaupīnavantaḥ khalu bhāgyavantaḥ ||1||
वेदान्त के महावाक्यों में सदा रमने वाला, भिक्षा में मिले अन्न मात्र से ही संतुष्ट, शोकरहित अन्तःकरण से विचरण करने वाला — कौपीनधारी (केवल लंगोटी वाला) संन्यासी वास्तव में भाग्यशाली है।
मूलं तरोः केवलमाश्रयन्तः पाणिद्वयं भोक्तुममन्त्रयन्तः। कन्थामिव श्रीमपि कुत्सयन्तः कौपीनवन्तः खलु भाग्यवन्तः॥२॥
mūlaṃ taroḥ kevalam āśrayantaḥ pāṇidvayaṃ bhoktum amantrayantaḥ | kanthām iva śrīm api kutsayantaḥ kaupīnavantaḥ khalu bhāgyavantaḥ ||2||
केवल वृक्ष के मूल का आश्रय लेने वाला, अपने दोनों हाथों को ही भोजन-पात्र बनाने वाला, लक्ष्मी (धन) को भी फटे चीथड़े के समान तुच्छ समझने वाला — कौपीनधारी संन्यासी वास्तव में भाग्यशाली है।
स्वानन्दभावे परितुष्टिमन्तः सुशान्तसर्वेन्द्रियवृत्तिमन्तः। अहर्निशं ब्रह्मसुखे रमन्तः कौपीनवन्तः खलु भाग्यवन्तः॥३॥
svānanda-bhāve parituṣṭimantaḥ suśānta-sarvendriya-vṛttimantaḥ | aharniśaṃ brahmasukhe ramantaḥ kaupīnavantaḥ khalu bhāgyavantaḥ ||3||
अपने आत्मानन्द में पूर्ण संतुष्ट, जिसकी समस्त इन्द्रिय-वृत्तियाँ भली-भाँति शान्त हैं, दिन-रात ब्रह्मसुख में रमने वाला — कौपीनधारी संन्यासी वास्तव में भाग्यशाली है।
देहादिभावं परिवर्तयन्तः स्वात्मानमात्मन्यवलोकयन्तः। नान्तं न मध्यं न बहिः स्मरन्तः कौपीनवन्तः खलु भाग्यवन्तः॥४॥
dehādi-bhāvaṃ parivartayantaḥ svātmānam ātmany avalokayantaḥ | nāntaṃ na madhyaṃ na bahiḥ smarantaḥ kaupīnavantaḥ khalu bhāgyavantaḥ ||4||
देहादि के भाव (तादात्म्य) से ऊपर उठा हुआ, अपने आत्मा को आत्मा में ही देखने वाला, आदि-मध्य-बाह्य का स्मरण न करने वाला — कौपीनधारी संन्यासी वास्तव में भाग्यशाली है।
ब्रह्माक्षरं पावनमुच्चरन्तो ब्रह्माहमस्मीति विभावयन्तः। भिक्षाशिनो दिक्षु परिभ्रमन्तः कौपीनवन्तः खलु भाग्यवन्तः॥५॥
brahmākṣaraṃ pāvanam uccaranto brahmāham asmīti vibhāvayantaḥ | bhikṣāśino dikṣu paribhramantaḥ kaupīnavantaḥ khalu bhāgyavantaḥ ||5||
पावन अक्षरब्रह्म (ॐ) का उच्चारण करते हुए, 'मैं ब्रह्म हूँ' इस भावना में स्थित, भिक्षा पर जीवन यापन करते हुए सभी दिशाओं में स्वच्छन्द विचरण करने वाला — कौपीनधारी संन्यासी वास्तव में भाग्यशाली है।