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मत्तः परतरं नान्यत् PDF

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मत्तः परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति धनञ्जय। मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥

Mattaḥ parataraṃ nānyat kiñchid-asti dhanañjaya। mayi sarvam-idaṃ protaṃ sūtre maṇi-gaṇā iva॥

हे धनञ्जय (अर्जुन)! मुझसे परे (श्रेष्ठ) और कुछ भी नहीं है। यह समस्त जगत् मुझमें उसी प्रकार पिरोया हुआ है जैसे सूत्र (धागे) में मणियों के समूह।