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मुकुन्दमाला स्तोत्रम् PDF

मुकुन्दमाला स्तोत्रम् की पूरी लिरिक्स — संस्कृत, रोमन व अर्थ सहित। एक क्लिक में PDF सेव करें या प्रिंट करें।

वन्दे मुकुन्दमरविन्ददलायताक्षं कुन्देन्दुशङ्खदशनं शिशुगोपवेषम्। इन्द्रादिदेववनिताकृतवन्दनाङ्घ्रिं द्वन्द्वारविन्दममलं मनसा स्मरामि॥

vande mukundam aravinda-dalāyatākṣaṃ kundendu-śaṅkha-daśanaṃ śiśu-gopa-veṣam | indrādi-deva-vanitā-kṛta-vandanāṅghriṃ dvandvāravindam amalaṃ manasā smarāmi ||

मैं मुकुन्द की वन्दना करता हूँ, जिनके नेत्र कमल-दल के समान विशाल हैं, जिनके दाँत कुन्द-पुष्प, चन्द्रमा और शंख के समान उज्ज्वल हैं, जो बाल-गोप के वेष में हैं, जिनके चरणों की इन्द्रादि देवों की पत्नियाँ वन्दना करती हैं; उन निर्मल चरण-कमलों का मैं मन से स्मरण करता हूँ।

श्रीवल्लभेति वरदेति दयापरेति भक्तप्रियेति भवलुण्ठनकोविदेति। नाथेति नागशयनेति जगन्निवासे- त्यालापनं प्रतिपदं कुरु मे मुकुन्द॥

śrī-vallabheti varadeti dayā-pareti bhakta-priyeti bhava-luṇṭhana-kovideti | nātheti nāga-śayaneti jagan-nivāse- ty ālāpanaṃ prati-padaṃ kuru me mukunda ||

हे मुकुन्द! मुझसे प्रत्येक पद पर यह पुकार कराइए — 'हे श्रीवल्लभ! हे वरद! हे दयालु! हे भक्तप्रिय! हे संसार-बन्धन को हरने में निपुण! हे नाथ! हे शेषशायी! हे जगन्निवास!'

जयतु जयतु देवो देवकीनन्दनोऽयं जयतु जयतु कृष्णो वृष्णिवंशप्रदीपः। जयतु जयतु मेघश्यामलः कोमलाङ्गो जयतु जयतु पृथ्वीभारनाशो मुकुन्दः॥

jayatu jayatu devo devakī-nandano 'yaṃ jayatu jayatu kṛṣṇo vṛṣṇi-vaṃśa-pradīpaḥ | jayatu jayatu megha-śyāmalaḥ komalāṅgo jayatu jayatu pṛthvī-bhāra-nāśo mukundaḥ ||

इन देवकीनन्दन की जय हो, जय हो! वृष्णिवंश के दीपक कृष्ण की जय हो, जय हो! मेघ के समान श्याम, कोमल अंगों वाले की जय हो, जय हो! पृथ्वी का भार हरने वाले मुकुन्द की जय हो, जय हो!

मुकुन्द मूर्ध्ना प्रणिपत्य याचे भवन्तमेकान्तमियन्तमर्थम्। अविस्मृतिस्त्वच्चरणारविन्दे भवे भवे मेऽस्तु भवत्प्रसादात्॥

mukunda mūrdhnā praṇipatya yāce bhavantam ekāntam iyantam artham | avismṛtis tvac-caraṇāravinde bhave bhave me 'stu bhavat-prasādāt ||

हे मुकुन्द! सिर झुकाकर मैं आपसे केवल इतना ही माँगता हूँ — आपकी कृपा से जन्म-जन्म में आपके चरण-कमलों की स्मृति मुझे कभी न भूले।

नाहं वन्दे तव चरणयोर्द्वन्द्वमद्वन्द्वहेतोः कुम्भीपाकं गुरुमपि हरे नारकं नापनेतुम्। रम्यारामामृदुतनुलता नन्दने नापि रन्तुं भावे भावे हृदयभवने भावयेयं भवन्तम्॥

nāhaṃ vande tava caraṇayor dvandvam advandva-hetoḥ kumbhī-pākaṃ gurum api hare nārakaṃ nāpanetum | ramyā-rāmā-mṛdu-tanu-latā nandane nāpi rantuṃ bhāve bhāve hṛdaya-bhavane bhāvayeyaṃ bhavantam ||

हे हरि! मैं आपके चरणों में न तो मोक्ष के लिए वन्दना करता हूँ, न भयंकर कुम्भीपाक नरक से बचने के लिए, न नन्दन वन में सुन्दर कोमलांगी स्त्रियों के साथ रमण के लिए; अपितु प्रत्येक अवस्था में अपने हृदय-भवन में मैं आपका ही ध्यान करूँ।

नास्था धर्मे न वसुनिचये नैव कामोपभोगे यद्यद्भव्यं भवतु भगवन् पूर्वकर्मानुरूपम्। एतत्प्रार्थ्यं मम बहुमतं जन्मजन्मान्तरेऽपि त्वत्पादाम्भोरुहयुगगता निश्चला भक्तिरस्तु॥

nāsthā dharme na vasu-nicaye naiva kāmopabhoge yad yad bhavyaṃ bhavatu bhagavan pūrva-karmānurūpam | etat prārthyaṃ mama bahu-mataṃ janma-janmāntare 'pi tvat-pādāmbhoruha-yuga-gatā niścalā bhaktir astu ||

न धर्म में, न धन-संचय में, न काम-भोग में मेरी आस्था है। हे भगवन्! पूर्वकर्म के अनुरूप जो होना हो, वह हो। जन्म-जन्मान्तर में भी मेरी यही प्रिय प्रार्थना है — आपके चरण-कमल-युगल में मेरी अचल भक्ति बनी रहे।

दिवि वा भुवि वा ममास्तु वासो नरके वा नरकान्तक प्रकामम्। अवधीरितशारदारविन्दौ चरणौ ते मरणेऽपि चिन्तयामि॥

divi vā bhuvi vā mamāstu vāso narake vā narakāntaka prakāmam | avadhīrita-śāradāravindau caraṇau te maraṇe 'pi cintayāmi ||

हे नरकान्तक! स्वर्ग में हो, पृथ्वी पर हो, अथवा नरक में ही — मेरा निवास कहीं भी हो। मरण के समय भी मैं शरद् के कमल को भी तिरस्कृत करने वाले आपके चरणों का ही चिन्तन करूँ।

कृष्ण त्वदीयपदपङ्कजपञ्जरान्ते अद्यैव मे विशतु मानसराजहंसः। प्राणप्रयाणसमये कफवातपित्तैः कण्ठावरोधनविधौ स्मरणं कुतस्ते॥

kṛṣṇa tvadīya-pada-paṅkaja-pañjarānte adyaiva me viśatu mānasa-rāja-haṃsaḥ | prāṇa-prayāṇa-samaye kapha-vāta-pittaiḥ kaṇṭhāvarodhana-vidhau smaraṇaṃ kutas te ||

हे कृष्ण! मेरे मन रूपी राजहंस आज ही आपके चरण-कमल रूपी पिंजरे में प्रवेश कर जाए; क्योंकि प्राण-प्रयाण के समय कफ-वात-पित्त से कण्ठ अवरुद्ध हो जाने पर आपका स्मरण कहाँ सम्भव होगा?