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न्यासदशकम् PDF

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अहं मद्रक्षणभरो मद्रक्षणफलं तथा । न मम श्रीपतेरेवेत्यात्मानं निक्षिपेद् बुधः ॥ १ ॥

ahaṃ madrakṣaṇabharo madrakṣaṇaphalaṃ tathā | na mama śrīpaterevetyātmānaṃ nikṣiped budhaḥ || 1 ||

बुद्धिमान् पुरुष इस निश्चय के साथ अपने को समर्पित करे — 'मेरी रक्षा का भार तथा उस रक्षा का फल, ये मेरे नहीं, केवल श्रीपति (लक्ष्मीपति भगवान्) के हैं।'

न्यस्याम्यकिञ्चनः श्रीमन्ननुकूलोऽन्यवर्जितः । विश्वासप्रार्थनापूर्वमात्मरक्षाभरं त्वयि ॥ २ ॥

nyasyāmyakiñcanaḥ śrīmannanukūlo'nyavarjitaḥ | viśvāsaprārthanāpūrvamātmarakṣābharaṃ tvayi || 2 ||

हे श्रीमन्! किसी अन्य उपाय से रहित, आपके अनुकूल और अन्य सब का त्याग किए हुए, मैं विश्वास और प्रार्थनापूर्वक अपनी रक्षा का सम्पूर्ण भार आप पर रखता हूँ।

स्वामी स्वशेषं स्ववशं स्वभरत्वेन निर्भरम् । स्वदत्तस्वधिया स्वार्थं स्वस्मिन् न्यस्यति मां स्वयम् ॥ ३ ॥

svāmī svaśeṣaṃ svavaśaṃ svabharatvena nirbharam | svadattasvadhiyā svārthaṃ svasmin nyasyati māṃ svayam || 3 ||

स्वामी स्वयं, अपनी दी हुई बुद्धि के द्वारा, मुझ अपने शेष, अपने वश एवं अपने भारस्वरूप को निर्भार करके अपने में ही न्यस्त कर लेते हैं।

श्रीमन्नभीष्टवरद त्वामस्मि शरणं गतः । एतद्देहावसाने मां त्वत्पादं प्रापय स्वयम् ॥ ४ ॥

śrīmannabhīṣṭavarada tvāmasmi śaraṇaṃ gataḥ | etaddehāvasāne māṃ tvatpādaṃ prāpaya svayam || 4 ||

हे श्रीमन्! हे अभीष्ट वरदायक! मैं आपकी शरण में आया हूँ। इस देह के अन्त में मुझे आप स्वयं अपने चरणों में पहुँचाइए।

त्वच्छेषत्वे स्थिरधियं त्वत्प्राप्त्येकप्रयोजनम् । निषिद्धकाम्यरहितं कुरु मां नित्यकिङ्करम् ॥ ५ ॥

tvaccheṣatve sthiradhiyaṃ tvatprāptyekaprayojanam | niṣiddhakāmyarahitaṃ kuru māṃ nityakiṅkaram || 5 ||

मुझे इस दृढ़ बुद्धि वाला बनाइए कि मैं केवल आपका हूँ, आपकी प्राप्ति ही जिसका एकमात्र प्रयोजन है; निषिद्ध एवं काम्य कर्मों से रहित मुझे अपना नित्य किंकर बनाइए।

देवीभूषणहेत्यादिजुष्टस्य भगवंस्तव । नित्यं निरपराधेषु कैङ्कर्येषु नियुङ्क्ष्व माम् ॥ ६ ॥

devībhūṣaṇahetyādijuṣṭasya bhagavaṃstava | nityaṃ niraparādheṣu kaiṅkaryeṣu niyuṅkṣva mām || 6 ||

हे भगवन्! देवी (लक्ष्मी), आभूषण, आयुध आदि से युक्त आप — मुझे सदा निरपराध (दोषरहित) कैंकर्यों में नियुक्त कीजिए।

मां मदीयं च निखिलं चेतनाचेतनात्मकम् । स्वकैङ्कर्योपकरणं वरद स्वीकुरु स्वयम् ॥ ७ ॥

māṃ madīyaṃ ca nikhilaṃ cetanācetanātmakam | svakaiṅkaryopakaraṇaṃ varada svīkuru svayam || 7 ||

हे वरद! मुझे तथा मेरे सम्पूर्ण चेतन-अचेतन को अपने कैंकर्य के उपकरण रूप में स्वयं स्वीकार कीजिए।

त्वमेव रक्षकोऽसि मे त्वमेव करुणाकरः । न प्रवर्तय पापानि प्रवृत्तानि निवारय ॥ ८ ॥

tvameva rakṣako'si me tvameva karuṇākaraḥ | na pravartaya pāpāni pravṛttāni nivāraya || 8 ||

आप ही मेरे रक्षक हैं, आप ही करुणा के आगार हैं। मुझसे पाप न कराइए, और जो प्रवृत्त हो चुके हैं उन्हें निवारण कीजिए।

अकृत्यानां च करणं कृत्यानां वर्जनं च मे । क्षमस्व निखिलं देव प्रणतार्तिहर प्रभो ॥ ९ ॥

akṛtyānāṃ ca karaṇaṃ kṛtyānāṃ varjanaṃ ca me | kṣamasva nikhilaṃ deva praṇatārtihara prabho || 9 ||

हे प्रणतार्तिहर प्रभो! मेरे द्वारा अकर्तव्य का किया जाना तथा कर्तव्य का त्याग — इस सब को, हे देव, क्षमा कीजिए।

श्रीमन्नियतपञ्चाङ्गं मद्रक्षणभरार्पणम् । अचीकरत्स्वयं स्वस्मिन्नतोऽहमिह निर्भरः ॥ १० ॥

śrīmanniyatapañcāṅgaṃ madrakṣaṇabharārpaṇam | acīkaratsvayaṃ svasminnato'hamiha nirbharaḥ || 10 ||

श्रीसहित भगवान् ने पाँच अंगों से युक्त मेरी रक्षा-भार-समर्पण को स्वयं अपने में करा लिया है; अतः अब मैं यहाँ पूर्णतः निर्भार (निश्चिन्त) हूँ।