परमार्थस्तुतिः — Complete Lyrics
परमार्थस्तुतिः
Sanskrit text with English transliteration and translation
Verse 1
श्रीमद्गृध्रसरस्तीरपारिजातमुपास्महे ।
यत्र तुङ्गैरतुङ्गैश्च प्रणतैर्गृह्यते फलम् ॥ १ ॥
śrīmadgṛdhrasarastīrapārijātamupāsmahe |
yatra tuṅgairatuṅgaiśca praṇatairgṛhyate phalam || 1 ||
हम उस श्रीमान् गृध्र-सरोवर के तट पर स्थित कल्पवृक्ष (पारिजात) की उपासना करते हैं, जहाँ ऊँचे और नीचे — सभी प्रणाम मात्र से अपना अभीष्ट फल प्राप्त कर लेते हैं।
Verse 2
गुरुभिस्त्वदनन्यसर्वभावैर्
गुणसिन्धौ कृतसम्प्लवस्त्वदीये ।
रणपुङ्गव वन्दिभावमिच्छन्न्
अहमस्म्येकमनुग्रहास्पदं ते ॥ २ ॥
gurubhistvadananyasarvabhāvair
guṇasindhau kṛtasamplavastvadīye |
raṇapuṅgava vandibhāvamicchann
ahamasmyekamanugrahāspadaṃ te || 2 ||
हे रणपुङ्गव! आप में पूर्णतः अनुरक्त गुरुओं द्वारा आपके गुण-सागर में स्नान कराया गया मैं, आपका वन्दी (स्तुतिपाठक) बनने की कामना करते हुए, स्वयं ही आपकी कृपा का एक पात्र हूँ।
Verse 3
भुवनाश्रयभूषणास्त्रवर्गं
मनसि त्वन्मयतां ममातनोतु ।
वपुराहवपुङ्गव त्वदीयं
महिषीणामनिमेषदर्शनीयम् ॥ ३ ॥
bhuvanāśrayabhūṣaṇāstravargaṃ
manasi tvanmayatāṃ mamātanotu |
vapurāhavapuṅgava tvadīyaṃ
mahiṣīṇāmanimeṣadarśanīyam || 3 ||
हे आहवपुङ्गव! भुवनों के आश्रय आपके आभूषण और अस्त्रों का समूह — वह आपका विग्रह जो आपकी महिषियों (देवियों) द्वारा अनिमेष दृष्टि से देखने योग्य है — मेरे मन में आपमयता का विस्तार करे।
Verse 4
अभिरक्षितुमग्रतः स्थितं त्वाम्
प्रणवे पार्थरथे च भावयन्तः ।
अहितप्रशमैरयत्नलभ्यैः
कथयन्त्याहवपुङ्गवं गुणज्ञाः ॥ ४ ॥
abhirakṣitumagrataḥ sthitaṃ tvām
praṇave pārtharathe ca bhāvayantaḥ |
ahitapraśamairayatnalabhyaiḥ
kathayantyāhavapuṅgavaṃ guṇajñāḥ || 4 ||
प्रणव (ॐ) में और पार्थ (अर्जुन) के रथ पर रक्षा हेतु आगे स्थित आपका ध्यान करते हुए, गुणज्ञ जन आपको — अनायास ही शत्रुओं (अनिष्टों) के शमन के कारण — 'आहवपुङ्गव' कहते हैं।
Verse 5
कमला निरपायधर्मपत्नी
करुणाद्याः स्वयमृत्विजो गुणास्ते ।
अवनं श्रयतामहीनमाद्यं
स च धर्मस्त्वदनन्यसेवनीयः ॥ ५ ॥
kamalā nirapāyadharmapatnī
karuṇādyāḥ svayamṛtvijo guṇāste |
avanaṃ śrayatāmahīnamādyaṃ
sa ca dharmastvadananyasevanīyaḥ || 5 ||
कमला (लक्ष्मी) आपकी अविनाशी धर्मपत्नी, और करुणा आदि आपके गुण — ये स्वयं ही, आपकी शरण में आए हुओं की पूर्ण एवं आदिम रक्षा के लिए ऋत्विज् (पुरोहित) हैं; और वह रक्षारूप धर्म आपके अतिरिक्त किसी अन्य से सेव्य नहीं।
Verse 6
कृपणाः सुधियः कृपासहायं
शरणं त्वां रणपुङ्गव प्रपन्नाः ।
अपवर्गनयादनन्यभावा
वरिवस्यारसमेकमाद्रियन्ते ॥ ६ ॥
kṛpaṇāḥ sudhiyaḥ kṛpāsahāyaṃ
śaraṇaṃ tvāṃ raṇapuṅgava prapannāḥ |
apavarganayādananyabhāvā
varivasyārasamekamādriyante || 6 ||
हे रणपुङ्गव! दीन होते हुए भी बुद्धिमान् जन, करुणा जिनकी सहायिका है उन आपकी शरण में आकर, मोक्ष को ही मार्ग मानकर तथा अनन्यभाव से, केवल आपकी सेवा के एक रस का आदर करते हैं।
Verse 7
अवधीर्य चतुर्विधं पुमर्थं
भवदर्थे विनियुक्तजीवितः सन् ।
लभते भवतः फलानि जन्तुर्
निखिलान्यत्र निदर्शनं जटायुः ॥ ७ ॥
avadhīrya caturvidhaṃ pumarthaṃ
bhavadarthe viniyuktajīvitaḥ san |
labhate bhavataḥ phalāni jantur
nikhilānyatra nidarśanaṃ jaṭāyuḥ || 7 ||
चतुर्विध पुरुषार्थ को (साध्य रूप में) त्यागकर, अपना जीवन आपके निमित्त समर्पित करने वाला जीव आपसे प्राप्त होने वाले समस्त फलों को पाता है — इसमें जटायु ही दृष्टान्त है।
Verse 8
शरणागतरक्षणव्रती मां
न विहातुं रणपुङ्गवार्हसि त्वम् ।
विदितिं भुवने विभीषणो वा
यदि वा रावण इत्युदीरितं ते ॥ ८ ॥
śaraṇāgatarakṣaṇavratī māṃ
na vihātuṃ raṇapuṅgavārhasi tvam |
viditiṃ bhuvane vibhīṣaṇo vā
yadi vā rāvaṇa ityudīritaṃ te || 8 ||
हे रणपुङ्गव! शरणागत-रक्षण के व्रती आप मुझे त्यागना उचित नहीं समझें — क्योंकि इस लोक में आपने ही घोषित किया है कि 'चाहे विभीषण हो अथवा रावण' (जो शरण आए, उसकी रक्षा करूँगा)।
Verse 9
भुजगेन्द्रगरुत्मदादिलभ्यैस्
त्वदनुज्ञानुभवप्रवाहभेदैः ।
स्वपदे रणपुङ्गव स्वयं मां
परिचर्याविभवैः परिष्क्रियेथाः ॥ ९ ॥
bhujagendragarutmadādilabhyais
tvadanujñānubhavapravāhabhedaiḥ |
svapade raṇapuṅgava svayaṃ māṃ
paricaryāvibhavaiḥ pariṣkriyethāḥ || 9 ||
हे रणपुङ्गव! अपने धाम में, आदिशेष-गरुड़ आदि को भी प्राप्य, आपकी अनुज्ञा से प्रवाहित अनुभव की विविध धाराओं रूपी सेवा-वैभव से, आप स्वयं मुझे विभूषित कीजिए।
Verse 10
विमलाशय वेङ्कटेशजन्मा
रमणीया रणपुङ्गव प्रसादात् ।
अनसूयुभिरादरेण भाव्या
परमार्थस्तुतिरन्वहं प्रपन्नैः ॥ १० ॥
vimalāśaya veṅkaṭeśajanmā
ramaṇīyā raṇapuṅgava prasādāt |
anasūyubhirādareṇa bhāvyā
paramārthastutiranvahaṃ prapannaiḥ || 10 ||
हे विमल हृदय वाले! रणपुङ्गव के प्रसाद से (वेङ्कटेश) देशिक से उत्पन्न यह रमणीय परमार्थस्तुति, अनसूय (ईर्ष्यारहित) शरणागतों द्वारा प्रतिदिन आदरपूर्वक मननीय है।
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