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सरस्वती कवचम् PDF

सरस्वती कवचम् की पूरी लिरिक्स — संस्कृत, रोमन व अर्थ सहित। एक क्लिक में PDF सेव करें या प्रिंट करें।

श‍ृणु वत्स प्रवक्ष्यामि कवचं सर्वकामदम्। श्रुतिसारं श्रुतिसुखं श्रुत्युक्तं श्रुतिपूजितम्॥

Shrinu Vatsa Pravakshyami Kavacham Sarvakamadam Shrutisaram Shrutisukham Shrutyuktam Shrutipujitam

(नारायण बोले—) हे वत्स, सुनो, मैं तुम्हें वह कवच कहता हूँ जो समस्त कामनाओं को देने वाला है—जो श्रुति का सार है, श्रुति को प्रिय है, श्रुति द्वारा कहा गया और श्रुति द्वारा पूजित है।

उक्तं कृष्णेन गोलोके मह्यं वृन्दावने वने। रासेश्वरेण विभुना रासे वै रासमण्डले॥

Uktam Krishnena Goloke Mahyam Vrindavane Vane Raseshvarena Vibhuna Rase Vai Rasamandale

यह गोलोक में कृष्ण ने मुझसे, वृन्दावन के वन में, रासेश्वर विभु ने रासमण्डल में कहा था।

अतीव गोपनीयं च कल्पवृक्षसमं परम्। ॐ श्रीं ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा शिरो मे सर्वदावतु॥

Ativa Gopaniyam Cha Kalpavriksha Samam Param Om Shrim Hrim Saraswatyai Svaha Shiro Me Sarvada Avatu

यह अत्यन्त गोपनीय और कल्पवृक्ष के समान परम है। 'ॐ श्रीं ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा'—यह सदा मेरे सिर की रक्षा करे।

श्रीं वाग्देवतायै स्वाहेति ललाटं मे सदावतु। ॐ श्रीं ह्रीं भारत्यै स्वाहा नेत्रयुग्मं सदावतु॥

Shrim Vagdevatayai Svaheti Lalatam Me Sada Avatu Om Shrim Hrim Bharatyai Svaha Netrayugmam Sada Avatu

'श्रीं वाग्देवतायै स्वाहा'—यह सदा मेरे ललाट की रक्षा करे। 'ॐ श्रीं ह्रीं भारत्यै स्वाहा'—यह सदा मेरे दोनों नेत्रों की रक्षा करे।

ॐ सरस्वत्यै नमः स्वाहा नासां मे सर्वदावतु। ॐ श्रीं ह्रीं वाण्यै स्वाहेति ओष्ठाधरं सदावतु॥

Om Saraswatyai Namah Svaha Nasam Me Sarvada Avatu Om Shrim Hrim Vanyai Svaheti Oshthadharam Sada Avatu

'ॐ सरस्वत्यै नमः स्वाहा'—यह सदा मेरी नासिका की रक्षा करे। 'ॐ श्रीं ह्रीं वाण्यै स्वाहा'—यह सदा मेरे ओष्ठों की रक्षा करे।

ॐ श्रीं ह्रीं ब्राह्म्यै स्वाहेति दन्तपङ्क्तिं सदावतु। ऐमित्येकाक्षरो मन्त्रो मम कण्ठं सदावतु॥

Om Shrim Hrim Brahmyai Svaheti Dantapanktim Sada Avatu Aim Ityekaksharo Mantro Mama Kantham Sada Avatu

'ॐ श्रीं ह्रीं ब्राह्म्यै स्वाहा'—यह सदा मेरी दन्तपंक्ति की रक्षा करे। एकाक्षर मन्त्र 'ऐं'—यह सदा मेरे कण्ठ की रक्षा करे।

ॐ श्रीं ह्रीं पातु मे ग्रीवां स्कन्धौ मे श्रीं सदावतु। ॐ श्रीं विद्याधिदेवतायै स्वाहा वक्षःस्थलं सदा॥

Om Shrim Hrim Patu Me Grivam Skandhau Me Shrim Sada Avatu Om Shrim Vidyadhidevatayai Svaha Vakshahsthalam Sada

'ॐ श्रीं ह्रीं'—यह मेरी ग्रीवा की रक्षा करे; 'श्रीं' मेरे कन्धों की रक्षा करे। 'ॐ श्रीं विद्याधिदेवतायै स्वाहा'—यह सदा मेरे वक्षःस्थल की रक्षा करे।

ॐ ह्रीं विद्यास्वरूपायै स्वाहा मे पातु नाभिकाम्। ॐ ह्रीं श्रीं त्र्यक्षरो मन्त्रः पातु पादयुगं मम॥

Om Hrim Vidyasvarupayai Svaha Me Patu Nabhikam Om Hrim Shrim Tryaksharo Mantrah Patu Padayugam Mama

'ॐ ह्रीं विद्यास्वरूपायै स्वाहा'—यह मेरी नाभि की रक्षा करे। त्र्यक्षर मन्त्र 'ॐ ह्रीं श्रीं'—यह मेरे दोनों चरणों की रक्षा करे।

ॐ सर्वार्णादिबीजाद्या व्याप्य पातु सदा च माम्। ॐ श्रीं ह्रीं ब्रह्मरूपायै सर्वाङ्गं मे सदावतु॥

Om Sarvarnadi Bijadya Vyapya Patu Sada Cha Mam Om Shrim Hrim Brahmarupayai Sarvangam Me Sada Avatu

समस्त बीजाक्षरों की आदिस्वरूपा देवी मुझमें व्याप्त होकर सदा मेरी रक्षा करें। 'ॐ श्रीं ह्रीं ब्रह्मरूपायै'—यह सदा मेरे समस्त अंगों की रक्षा करे।

इति ते कथितं वत्स सर्वमन्त्रौघविग्रहम्। मयापि कीर्तितं भद्रं ब्रह्मणे नाभिपङ्कजे॥

Iti Te Kathitam Vatsa Sarva Mantraugha Vigraham Mayapi Kirtitam Bhadram Brahmane Nabhipankaje

इस प्रकार हे वत्स, मैंने तुम्हें समस्त मन्त्रसमूह के विग्रहस्वरूप यह कवच कहा; यह कल्याणकारी स्तोत्र मैंने ब्रह्मा को भी उनके नाभि-कमल पर कहा था।

यो धारयति स ज्ञानी त्रिषु लोकेषु पूजितः। लक्ष्मीर्धृत्वा ब्रह्मरूपं देवीं वै कृतवान् हरिः॥

Yo Dharayati Sa Jnani Trishu Lokeshu Pujitah Lakshmir Dhritva Brahmarupam Devim Vai Kritavan Harih

जो इसे धारण करता है वह ज्ञानी होता है और तीनों लोकों में पूजित होता है। स्वयं लक्ष्मी ने ब्रह्मरूप धारण कर इस देवी का आश्रय लिया, और हरि ने भी वैसा ही किया।

इदं विश्वजयाख्यं वै कवचं ब्रह्मरूपकम्। ब्रह्मणा कथितं पूर्वं प्रवक्ष्यामि शृणु प्रिये॥

Idam Vishvajayakhyam Vai Kavacham Brahmarupakam Brahmana Kathitam Purvam Pravakshyami Shrinu Priye

यह 'विश्वजय' नामक कवच ब्रह्मस्वरूप है। इसे पूर्वकाल में ब्रह्मा ने कहा था, और अब मैं कहता हूँ—हे प्रिये, सुनो।

प्रातरुत्थाय यो भक्त्या पठेद्वा धारयेद्यदि। वाचस्पतिसमो वाग्मी स कविर्भवति ध्रुवम्॥

Pratarutthaya Yo Bhaktya Pathedva Dharayedyadi Vachaspati Samo Vagmi Sa Kavir Bhavati Dhruvam

जो प्रातः उठकर भक्ति से इसका पाठ करता या इसे धारण करता है, वह वाचस्पति (बृहस्पति) के समान वाग्मी और निश्चय ही कवि हो जाता है।