श्री शिव भुजङ्गप्रयात स्तोत्रम् — Complete Lyrics
श्री शिव भुजङ्गप्रयात स्तोत्रम्
Sanskrit text with English transliteration and translation
Verse 1
कृपासागरायाशुकाव्यप्रदाय
प्रणम्राखिलाभीष्टसन्दायकाय।
यतीन्द्रैरुपास्याङ्घ्रिपाथोरुहाय
प्रबोधप्रदात्रे नमः शङ्कराय॥१॥
Kripa-Sagaraya-Ashu-Kavya-Pradaya
Pranamra-Akhila-Abhishta-Sandayakaya
Yatindrair-Upasya-Anghri-Pathoruhaya
Prabodha-Pradatre Namah Shankaraya (1)
उस शंकर को नमस्कार है जो करुणा के सागर हैं, जो शीघ्र ही काव्य-शक्ति प्रदान करते हैं, जो प्रणाम करने वालों की समस्त अभिलाषाएँ पूर्ण करते हैं, जिनके चरण-कमल यतीन्द्रों द्वारा उपासित हैं, और जो आत्मज्ञान का प्रबोध देते हैं।
Verse 2
चिदानन्दरूपाय चिन्मुद्रिकोद्य-
त्करायेशपर्यायरूपाय तुभ्यम्।
मुदा गीयमानाय वेदोत्तमाङ्गैः
श्रितानन्ददात्रे नमः शङ्कराय॥२॥
Chidananda-Rupaya Chinmudrik-Odyat-
Karaya-Isha-Paryaya-Rupaya Tubhyam
Muda Giyamanaya Vedottamangaih
Shrita-Ananda-Datre Namah Shankaraya (2)
उस शंकर को नमस्कार है जिनका स्वरूप चिदानन्द है, जिनका हाथ ज्ञान की चिन्मुद्रा में उठा हुआ है, जो परमेश्वर के ही पर्यायरूप हैं, और जिन्हें उपनिषद् आनन्दपूर्वक गाते हैं।
Verse 3
जटाजूटमध्ये पुरा या सुराणां
धुनी साद्य कर्मन्दिरूपस्य शम्भोः।
गले मल्लिकामालिकाव्याजतस्ते
विभातीति मन्ये नमः शङ्कराय॥३॥
Jata-Juta-Madhye Pura Ya Suranam
Dhuni Sadya Karmandi-Rupasya Shambhoh
Gale Mallika-Malika-Vyajatas-Te
Vibhati-Iti Manye Namah Shankaraya (3)
जिनकी जटाओं में पहले देवों की नदी (गंगा) बहती थी, अब कर्मन्दि (संन्यासी) रूपधारी शम्भु के कण्ठ पर वही गंगा मानो मल्लिका की माला के बहाने सुशोभित होती है — उन शंकर को नमस्कार।
Verse 4
तटिल्लोलकेशप्रवालप्रभाङ्गं
लसच्चन्द्रकोटिप्रकाशाधिकाङ्गम्।
सुधासारसौख्यानुकूलं स्मरामि
प्रसन्नं सदा शङ्करं लोकनाथम्॥४॥
Tatil-Lola-Kesha-Pravala-Prabha-Angam
Lasach-Chandra-Koti-Prakasha-Adhika-Angam
Sudha-Sara-Saukhya-Anukulam Smarami
Prasannam Sada Shankaram Loka-Natham (4)
मैं उस सदा प्रसन्न लोकनाथ शंकर का स्मरण करता हूँ जिनके अंग विद्युत् सदृश केशों के बीच मूँगे की भाँति दीप्त हैं, जिनका शरीर करोड़ों चन्द्रमाओं से अधिक प्रकाशमान है, और जो अमृतमयी सुख के मूल हैं।
Verse 5
प्रवालप्रवाहप्रभाशोणमर्धं
मरुत्वन्मणिश्रीमहःश्याममर्धम्।
गुणस्यूतमेतद्वपुः शैवमन्तः
स्मरामि स्मरापत्तिसम्पत्तिहेतोः॥५॥
Pravala-Pravaha-Prabha-Shona-Mardham
Marutvan-Mani-Shri-Mahah-Shyama-Mardham
Gunasyutam-Etad-Vapuh Shaivam-Antah
Smarami Smara-Apatti-Sampatti-Hetoh (5)
जिनका आधा शरीर मूँगे के प्रवाह सा लाल और आधा नीलमणि की कान्ति सा श्याम है — उस एकीभूत शैव (अर्धनारीश्वर) स्वरूप का मैं काम पर विजय रूपी सम्पत्ति के लिए स्मरण करता हूँ।
Verse 6
महादेव शम्भो गिरीश त्रिशूलिन्
त्वदीयं समस्तं विभातीति मन्ये।
भवान्येति वर्णत्रयं ते समस्तं
नमस्ते नमस्ते विभो शङ्कराय॥६॥
Mahadeva Shambho Girisha Trishulin
Tvadiyam Samastam Vibhati-Iti Manye
Bhavani-Eti Varna-Trayam Te Samastam
Namaste Namaste Vibho Shankaraya (6)
हे महादेव, शम्भो, गिरीश, त्रिशूलधारी! यह समस्त जगत् आपका ही प्रकाश है ऐसा मैं मानता हूँ; 'भवानी' ये तीनों अक्षर भी सर्वथा आपके ही हैं। हे विभो शंकर, आपको बार-बार नमस्कार।
Verse 7
रुचं ते दधानस्य पादारविन्दे
निमग्नस्य योगीन्द्रवृन्दैरजस्रम्।
समुद्यत्कृपापूरपूर्णेक्षणस्य
नमस्ते नमस्ते महेशाय तुभ्यम्॥७॥
Rucham Te Dadhanasya Pada-Aravinde
Nimagnasya Yogindra-Vrindair-Ajasram
Samudyat-Kripa-Pura-Purna-Ikshanasya
Namaste Namaste Maheshaya Tubhyam (7)
हे महेश, जिनके चरण-कमलों में योगीन्द्रों के समूह निरन्तर निमग्न रहते हैं, और जिनके नेत्र उमड़ती करुणा से परिपूर्ण हैं — आपको बारम्बार नमस्कार।
Verse 8
भवाम्भोधिमग्नान् जनान् दुःखयुक्तान्
जगन्मातरः पाहि देवेति केचित्।
नमन्तीति मन्ये गिरीशाङ्कसंस्थां
भवानीं नमस्ये नमः शङ्कराय॥८॥
Bhava-Ambhodhi-Magnan Janan Duhkha-Yuktan
Jagan-Matarah Pahi Deva-Iti Kechit
Namanti-Iti Manye Girisha-Anka-Samstham
Bhavanim Namasye Namah Shankaraya (8)
'हे देव, संसार-सागर में डूबे दुःखी जनों की रक्षा कीजिए, हे जगन्माता!' — ऐसा कहकर कुछ लोग प्रणाम करते हैं; गिरीश के अंक में स्थित उस भवानी को मैं नमन करता हूँ। शंकर को नमस्कार।
Verse 9
इदं यो भुजङ्गप्रयातं पठेद्वा
शृणोते समाधाय चित्तं मनुष्यः।
स मृत्युं विजित्याशु शम्भोः प्रसादात्
चिरं देवदेवस्य सायुज्यमेति॥९॥
Idam Yo Bhujanga-Prayatam Pathed-Va
Shrinote Samadhaya Chittam Manushyah
Sa Mrityum Vijitya-Ashu Shambhoh Prasadat
Chiram Deva-Devasya Sayujyam-Eti (9)
जो मनुष्य चित्त को एकाग्र कर इस भुजङ्गप्रयात स्तोत्र का पाठ अथवा श्रवण करता है, वह शम्भु की कृपा से शीघ्र ही मृत्यु पर विजय पाकर चिरकाल तक देवदेव के सायुज्य को प्राप्त करता है।
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