श्यामलानवरत्नमालिका PDF
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ओङ्कारपञ्जरशुकीमुपनिषदुद्यानकेलिकलकण्ठीम् । आगमविपिनमयूरीमार्यामन्तर्विभावये गौरीम् ॥१॥
oṅkāra-pañjara-śukīm upaniṣad-udyāna-keli-kalakaṇṭhīm | āgama-vipina-mayūrīm āryām antar vibhāvaye gaurīm || 1||
१. मैं अपने हृदय में आर्या गौरी देवी का ध्यान करता हूँ — जो ओंकार रूपी पिंजरे की शुकी (तोता) हैं, उपनिषद् रूपी उद्यान में क्रीड़ा करती मधुर-कण्ठी कोकिला हैं, और आगम रूपी वन में विचरती मयूरी हैं।
दयमानदीर्घनयनां देशिकरूपेण दर्शिताभ्युदयाम् । वामकुचनिहितवीणां वरदां सङ्गीतमातृकां वन्दे ॥२॥
dayamāna-dīrgha-nayanāṃ deśika-rūpeṇa darśitābhyudayām | vāma-kuca-nihita-vīṇāṃ varadāṃ saṅgīta-mātṛkāṃ vande || 2||
२. मैं समस्त संगीत की जननी, वरदायिनी देवी को प्रणाम करता हूँ — जिनके दीर्घ नेत्र करुणा से द्रवित हैं, जो गुरु रूप धारण कर भक्तों को अभ्युदय दिखाती हैं, और जो वाम वक्ष पर वीणा धारण करती हैं।
श्यामलिमसौकुमार्यां सौन्दर्यानन्दसम्पदुन्मेषाम् । तरुणिमकरुणापूरां मदजलकल्लोललोचनां वन्दे ॥३॥
śyāmalima-saukumāryāṃ saundaryānanda-sampad-unmeṣām | taruṇima-karuṇā-pūrāṃ mada-jala-kallola-locanāṃ vande || 3||
३. मैं उनकी वन्दना करता हूँ — जो श्याम-वर्ण एवं सुकुमारी हैं, सौंदर्य-आनन्द-सम्पत्ति का उन्मेष हैं, तारुण्य एवं करुणा की पूर हैं, और जिनके नेत्र मद-जल की तरंगों से चंचल हैं।
नखमुखमुखरितवीणानादरसास्वादनवनवोल्लासम् । मुखमम्ब मोदयतु मां मुक्ताताटङ्कमुग्धहसितं ते ॥४॥
nakha-mukha-mukharita-vīṇā-nāda-rasāsvādana-navanavollāsam | mukham amba modayatu māṃ muktā-tāṭaṅka-mugdha-hasitaṃ te || 4||
४. हे अम्ब! तुम्हारा मुख मुझे आनन्दित करे — जो तुम्हारी अंगुलियों से बजती वीणा के नादरस के आस्वादन से नित-नवीन उल्लसित है, मुक्ता-कुण्डलों एवं मुग्ध मुस्कान से सुशोभित है।
सरिगमपधनिरतां तां वीणासङ्क्रान्तकान्तहस्तान्ताम् । शान्तां मृदुलस्वान्तां कुचभरतान्तां नमामि शिवकान्ताम् ॥५॥
sa-ri-ga-ma-pa-dha-ni-ratāṃ tāṃ vīṇā-saṅkrānta-kānta-hastāntām | śāntāṃ mṛdula-svāntāṃ kuca-bhara-tāntāṃ namāmi śiva-kāntām || 5||
५. मैं शिव की प्रिया को प्रणाम करता हूँ — जो सात स्वरों (सा रि ग म प ध नि) में निरत हैं, जिनके सुन्दर कर वीणा पर संक्रान्त हैं, जो शान्त, मृदु-हृदया एवं कुचभार से किंचित श्रान्त हैं।
अवटुतटघटितचूलीताडितताळीपलाशताटङ्काम् । वीणावादनलेशाकम्पितशीर्षां नमामि मातङ्गीम् ॥६॥
avaṭu-taṭa-ghaṭita-cūlī-tāḍita-tāḷī-palāśa-tāṭaṅkām | vīṇā-vādana-leśā-kampita-śīrṣāṃ namāmi mātaṅgīm || 6||
६. मैं मातंगी को प्रणाम करता हूँ — जिनके कपोलों पर रचित अलकों से ताडित ताळी-पत्र के आकार के ताटंक (कुण्डल) शोभित हैं, और जिनका शीर्ष वीणावादन के लेश-मात्र से कम्पित होता है।
वीणारवानुषङ्गं विकलकचामोदमाधुरीभृङ्गम् । करुणापूरतरङ्गं कलये मातङ्गकन्यकापाङ्गम् ॥७॥
vīṇā-ravānuṣaṅgaṃ vikala-kacāmoda-mādhurī-bhṛṅgam | karuṇā-pūra-taraṅgaṃ kalaye mātaṅga-kanyakāpāṅgam || 7||
७. मैं मातंग-कन्या के अपांग (कटाक्ष) का ध्यान करता हूँ — जो वीणा के नाद का अनुषंगी है, विकल केशों के सौरभ-माधुरी का भ्रमर है, और करुणा-पूर की तरंग है।
मेचकमासेचनकं मिथ्यादृष्टान्तमध्यभागं ते । मातस्तव स्वरूपं मङ्गलसङ्गीतसौरभं वन्दे ॥८॥
mecakam āsecanakaṃ mithyā-dṛṣṭānta-madhya-bhāgaṃ te | mātas tava svarūpaṃ maṅgala-saṅgīta-saurabhaṃ vande || 8||
८. हे मात:! मैं तुम्हारे स्वरूप की वन्दना करता हूँ — जो श्याम एवं नयन-तृप्तिकर है, जिसका मध्यभाग (कटि) इतना क्षीण है कि उसकी उपमा मिथ्या दृष्टान्त ही ठहरती है, और जो मंगलमय संगीत के सौरभ से युक्त है।
मणिभङ्गमेचकाङ्गीं मातङ्गीं नौमि सिद्धमातङ्गीम् । यौवनवनसारङ्गीं सङ्गीताम्भोरुहानुभवभृङ्गीम् ॥९॥
maṇi-bhaṅga-mecakāṅgīṃ mātaṅgīṃ naumi siddha-mātaṅgīm | yauvana-vana-sāraṅgīṃ saṅgītāmbhoruhānubhava-bhṛṅgīm || 9||
९. मैं मातंगी, सिद्ध-मातंगी की स्तुति करता हूँ — जिनके अंग नवभग्न मणि (नीलमणि) के समान श्याम हैं, जो यौवन-वन की सारंगी (हरिणी) हैं, और जो संगीत-कमल के अनुभव-रस की भ्रमरी हैं।