विष्णु भुजङ्गप्रयात स्तोत्रम् PDF
विष्णु भुजङ्गप्रयात स्तोत्रम् की पूरी लिरिक्स — संस्कृत, रोमन व अर्थ सहित। एक क्लिक में PDF सेव करें या प्रिंट करें।
चिदंशं विभुं निर्मलं निर्विकल्पं निरीहं निराकारमोङ्कारगम्यम्। गुणातीतमव्यक्तमेकं तुरीयं परं ब्रह्म यं वेद तस्मै नमस्ते॥
Chidamsham Vibhum Nirmalam Nirvikalpam Niriham Nirakaram-Onkara-Gamyam Gunatitam-Avyaktam-Ekam Turiyam Param Brahma Yam Veda Tasmai Namaste
जिन्हें ज्ञानीजन परब्रह्म रूप में जानते हैं — जो चित्-स्वरूप, विभु, निर्मल, निर्विकल्प, निरीह, निराकार, ओंकार से गम्य, गुणातीत, अव्यक्त, एक और तुरीय हैं — उन्हें नमस्कार है।
विशुद्धं शिवं शान्तमाद्यन्तशून्यं जगज्जीवनं ज्योतिरानन्दरूपम्। अदिग्देशकालव्यवच्छेदनीयं त्रयी वक्ति यं वेद तस्मै नमस्ते॥
Vishuddham Shivam Shantam-Adyanta-Shunyam Jagaj-Jivanam Jyotir-Ananda-Rupam A-dig-desha-kala-vyavacchedaniyam Trayi Vakti Yam Veda Tasmai Namaste
जिन्हें तीनों वेद उद्घोषित करते हैं — जो विशुद्ध, शिव, शान्त, आदि-अन्त रहित, जगत के जीवन, ज्योति एवं आनन्द स्वरूप, तथा दिशा-देश-काल से अपरिच्छिन्न हैं — उन्हें नमस्कार है।
महायोगपीठे परिभ्राजमाने धरण्यादितत्त्वात्मके शक्तियुक्ते। गुणाहस्करे वह्निबिम्बार्धमध्ये समासीनमोङ्कर्णिकेऽष्टाक्षराब्जे॥
Maha-Yoga-Pithe Paribhrajamane Dharanyadi-Tattvatmake Shakti-Yukte Gunahaskare Vahni-Bimbardha-Madhye Samasinam-Onkarnike-Ashtaksharabje
महायोगपीठ पर, पृथ्वी आदि तत्त्वों से शोभायमान एवं शक्ति से युक्त, गुणरूपी सूर्य के वह्नि-बिम्ब के अर्ध-मध्य में, ओंकाररूपी अष्टाक्षर-कमल की कर्णिका पर विराजमान आपको नमस्कार।
समानोदितानेकसूर्येन्दुकोटि- प्रभापूरतुल्यद्युतिं दुर्निरीक्षम्। न शीतं न चोष्णं सुवर्णावदात- प्रसन्नं सदानन्दसंवित्स्वरूपम्॥
Samanoditaneka-Suryendu-Koti- Prabha-Pura-Tulya-Dyutim Durniriksham Na Shitam Na Choshnam Suvarnavadata- Prasannam Sadananda-Samvit-Svarupam
एक साथ उदित अनेक कोटि सूर्य-चन्द्रों की प्रभा के समान दुर्निरीक्ष कान्ति वाले, न शीत न उष्ण, स्वर्ण के समान उज्ज्वल, सदा प्रसन्न, नित्यानन्द-संवित्स्वरूप।
सुनासापुटं सुन्दरभ्रूललाटं किरीटोचिताकुञ्चितस्निग्धकेशम्। स्फुरत्पुण्डरीकाभिरामायताक्षं समुत्फुल्लरत्नप्रसूनावतंसम्॥
Sunasaputam Sundara-Bhru-Lalatam Kiritochitakunchita-Snigdha-Kesham Sphurat-Pundarikabhiramayataksham Samutphulla-Ratna-Prasunavatamsam
सुन्दर नासिका, मनोहर भृकुटि एवं ललाट, मुकुट के योग्य घुँघराले स्निग्ध केश, खिले हुए कमल के समान विशाल नेत्र, तथा रत्नमय पुष्पों के कर्णाभूषण से सुशोभित।
लसत्कुण्डलामृष्टगण्डस्थलान्तं जपारागचोराधरं चारुहासम्। अलिव्याकुलामोलिमन्दारमालं महोरःस्फुरत्कौस्तुभोदारहारम्॥
Lasat-Kundalamrishta-Ganda-Sthalantam Japa-Raga-Choradharam Charu-Hasam Ali-Vyakulamoli-Mandara-Malam Mahorah-Sphurat-Kaustubhodara-Haram
चमकते कुण्डलों से स्पर्शित कपोल, जपा-पुष्प की लालिमा को चुराने वाले अधर, मनोहर हास, भ्रमरों से व्याप्त मन्दार-माला, और विशाल वक्ष पर देदीप्यमान कौस्तुभ-हार से युक्त।
सुरत्नाङ्गदैरन्वितं बाहुदण्डै- श्चतुर्भिश्चलत्कङ्कणालंकृताग्रैः। उदारोदरालंकृतं पीतवस्त्रं पदद्वन्द्वनिर्धूतपद्माभिरामम्॥
Suratnangadair-Anvitam Bahu-Dandai- sh-Chaturbhish-Chalat-Kankanalankritagraih Udarodaralankritam Pita-Vastram Pada-Dvandva-Nirdhuta-Padmabhiramam
रत्नजड़ित अंगदों से सुशोभित चार भुजदण्ड, जिनके अग्रभाग चंचल कंकणों से अलंकृत हैं, उदार उदर पीताम्बर से सुशोभित, और कमल को लज्जित करने वाले चरण-युगल से रमणीय।
स्वभक्तेषु सन्दर्शिताकारमेवं सदा भावयन्संनिरुद्धेन्द्रियाश्वः। दुरापं नरो याति संसारपारं परस्मै परेभ्योऽपि तस्मै नमस्ते॥
Sva-Bhakteshu Sandarshitakaram-Evam Sada Bhavayan-Sannirudhendriyashvah Durapam Naro Yati Samsara-Param Parasmai Parebhyo-Api Tasmai Namaste
इस प्रकार अपने भक्तों को दर्शाए स्वरूप का जो सदा ध्यान करता है, इन्द्रियरूपी अश्वों को वश में करके वह दुस्तर संसार-सागर को पार कर जाता है — परात्पर आपको नमस्कार।
श्रिया शातकुम्भद्युतिस्निग्धकान्त्या धरण्या च दूर्वादलश्यामलाङ्ग्या। कलत्रद्वयेनामुना तोषिताय त्रिलोकीगृहस्थाय विष्णो नमस्ते॥
Shriya Shatakumbha-Dyuti-Snigdha-Kantya Dharanya Cha Durva-Dala-Shyamalangya Kalatra-Dvayenamuna Toshitaya Triloki-Grihasthaya Vishno Namaste
हे विष्णो! स्वर्ण-सी स्निग्ध कान्ति वाली श्री (लक्ष्मी) और दूर्वादल-सी श्यामल अंगों वाली पृथ्वी — इन दो पत्नियों से सन्तुष्ट, त्रिलोकी के गृहस्थ आपको नमस्कार।
शरीरं कलत्रं सुतं बन्धुवर्गं वयस्यं धनं सद्म भृत्यं भुवं च। समस्तं परित्यज्य हा कष्टमेको गमिष्यामि दुःखेन दूरं किलाहम्॥
Shariram Kalatram Sutam Bandhu-Vargam Vayasyam Dhanam Sadma Bhrityam Bhuvam Cha Samastam Parityajya Ha Kashtam-Eko Gamishyami Duhkhena Duram Kilaham
शरीर, पत्नी, पुत्र, बन्धुजन, मित्र, धन, घर, सेवक और भूमि — इन सबको त्यागकर, हाय कष्ट! अकेला, दुःख से दूर अवश्य ही चला जाऊँगा।
जरेयं पिशाचीव हा जीवतो मे वसामत्ति रक्तं च मांसं बलं च। अहो देव सीदामि दीनानुकम्पि- न्किमद्यापि हन्त त्वयोदासितव्यम्॥
Jareyam Pishachiva Ha Jivato Me Vasam-Atti Raktam Cha Mamsam Balam Cha Aho Deva Sidami Dinanukampin Kim-Adyapi Hanta Tvayodasitavyam
यह बुढ़ापा पिशाचिनी के समान, मेरे जीते-जी ही मेरी वसा, रक्त, मांस और बल को खा रहा है। हे देव! मैं डूब रहा हूँ; हे दीनानुकम्पी! क्या अब भी आपके द्वारा मेरी उपेक्षा की जाएगी?
कफव्याहतोष्णोल्बणश्वासवेग- व्यथाविस्फुरत्सर्वमर्मास्थिबन्धाम्। विचिन्त्याहमन्त्यामसङ्ख्यामवस्थां बिभेमि प्रभो किं करोमि प्रसीद॥
Kapha-Vyahatoshnolbana-Shvasa-Vega- Vyatha-Visphurat-Sarva-Marmasthi-Bandham Vichintyaham-Antyam-Asankhyam-Avastham Bibhemi Prabho Kim Karomi Prasida
कफ से अवरुद्ध, उष्ण एवं प्रचण्ड श्वास के वेग की व्यथा से जब समस्त मर्म, अस्थि एवं सन्धियाँ काँप उठेंगी — उस अन्तिम असंख्य अवस्था का विचार कर मैं भयभीत हूँ। हे प्रभो! मैं क्या करूँ? प्रसन्न होइए।
लपन्नच्युतानन्त गोविन्द विष्णो मुरारे हरे नाथ नारायणेति। यथानुस्मरिष्यामि भक्त्या भवन्तं तथा मे दयाशील देव प्रसीद॥
Lapann-Achyutananta Govinda Vishno Murare Hare Natha Narayaneti Yathanusmarishyami Bhaktya Bhavantam Tatha Me Daya-Shila Deva Prasida
हे अच्युत, अनन्त, गोविन्द, विष्णो, मुरारे, हरे, नाथ, नारायण! — जैसे मैं भक्तिपूर्वक आपके नामों का उच्चारण करते हुए आपका स्मरण करूँ, वैसे ही हे दयाशील देव! मुझ पर प्रसन्न होइए।
भुजङ्गप्रयातं पठेद्यस्तु भक्त्या समाधाय चित्ते भवन्तं मुरारे। स मोहं विहायाशु युष्मत्प्रसादा- त्समाश्रित्य योगं व्रजत्यच्युतं त्वाम्॥
Bhujanga-Prayatam Pathed-Yas-Tu Bhaktya Samadhaya Chitte Bhavantam Murare Sa Moham Vihayashu Yushmat-Prasadat Samashritya Yogam Vrajaty-Achyutam Tvam
जो भक्तिपूर्वक इस भुजङ्गप्रयात स्तोत्र का पाठ करता है और हे मुरारे! आपको हृदय में धारण करता है, वह शीघ्र ही मोह को त्यागकर, आपकी कृपा से योग का आश्रय लेकर, अच्युत आप तक पहुँच जाता है।