विश्वं दर्पणदृश्यमान (दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम् १) PDF
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विश्वं दर्पणदृश्यमाननगरीतुल्यं निजान्तर्गतं पश्यन्नात्मनि मायया बहिरिवोद्भूतं यथा निद्रया। यः साक्षात्कुरुते प्रबोधसमये स्वात्मानमेवाद्वयं तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये॥
viśvaṃ darpaṇa-dṛśyamāna-nagarī-tulyaṃ nijāntargataṃ paśyann ātmani māyayā bahir ivodbhūtaṃ yathā nidrayā | yaḥ sākṣāt kurute prabodha-samaye svātmānam evādvayaṃ tasmai śrī-guru-mūrtaye nama idaṃ śrī-dakṣiṇāmūrtaye ||
यह विश्व दर्पण में दिखाई देती हुई नगरी के समान है, जो वस्तुतः अपने ही आत्मा के भीतर स्थित है, किन्तु माया के कारण बाहर प्रकट हुई-सी प्रतीत होती है — जैसे निद्रा में स्वप्न-जगत् प्रकट होता है। जो प्रबोध (जागृति) के समय इसे साक्षात् कर लेता है और अपने आत्मा को ही एकमात्र अद्वय (अद्वितीय) तत्त्व जानता है — उस श्रीगुरुमूर्ति, श्रीदक्षिणामूर्ति को यह नमस्कार है।