श्री वृन्दादेव्यष्टकम् PDF
श्री वृन्दादेव्यष्टकम् की पूरी लिरिक्स — संस्कृत, रोमन व अर्थ सहित। एक क्लिक में PDF सेव करें या प्रिंट करें।
गाङ्गेयचाम्पेयतडिद्विनिन्दिरोचिःप्रवाहस्नपितात्मवृन्दे । बन्धूकबन्धुद्युतिदिव्यवासो वृन्दे नमस्ते चरणारविन्दम् ॥ १॥
gāṅgeya-cāmpeya-taḍid-vinindi-rociḥ-pravāha-snapitātma-vṛnde | bandhūka-bandhu-dyuti-divya-vāso vṛnde namas te caraṇāravindam || 1||
हे वृन्दे, जिनकी कान्ति स्वर्ण, स्वर्णिम चम्पा और विद्युत् को भी लज्जित कर देती है और जो उस प्रभा से अपने समस्त संगियों को स्नात करती हैं, जो बन्धूक पुष्प के समान अरुण दिव्य वस्त्र धारण करती हैं — हे वृन्दे, मैं आपके चरणकमलों को प्रणाम करता हूँ।
बिम्बाधरोदित्वरमन्दहास्यनासाग्रमुक्ताद्युतिदीपितास्ये । विचित्ररत्नाभरणश्रियाढ्ये वृन्दे नमस्ते चरणारविन्दम् ॥ २॥
bimbādharoditvara-manda-hāsya-nāsāgra-muktā-dyuti-dīpitāsye | vicitra-ratnābharaṇa-śrīyāḍhye vṛnde namas te caraṇāravindam || 2||
हे वृन्दे, जिनका मुख बिम्बफल-सदृश अधर, उदित होती मन्द मुस्कान और नासाग्र के मोती की द्युति से प्रकाशित है, जो विचित्र रत्नाभूषणों की शोभा से समृद्ध हैं — हे वृन्दे, मैं आपके चरणकमलों को प्रणाम करता हूँ।
समस्तवैकुण्ठशिरोमणौ श्रीकृष्णस्य वृन्दावनधन्यधाम्नि । दत्ताधिकारे वृषभानुपुत्र्या वृन्दे नमस्ते चरणारविन्दम् ॥ ३॥
samasta-vaikuṇṭha-śiromaṇau śrī-kṛṣṇasya vṛndāvana-dhanya-dhāmni | dattādhikāre vṛṣabhānu-putryā vṛnde namas te caraṇāravindam || 3||
हे वृन्दे, जिन्हें वृषभानुनन्दिनी (श्री राधा) ने समस्त वैकुण्ठों के शिरोमणि श्रीकृष्ण के धन्य धाम वृन्दावन का अधिकार सौंपा है — हे वृन्दे, मैं आपके चरणकमलों को प्रणाम करता हूँ।
त्वदाज्ञया पल्लवपुष्पभृङ्गमृगादिभिर्माधवकेलिकुञ्जाः । मध्वादिभिर्भान्ति विभूष्यमाणा वृन्दे नमस्ते चरणारविन्दम् ॥ ४॥
tvad-ājñayā pallava-puṣpa-bhṛṅga-mṛgādibhir mādhava-keli-kuñjāḥ | madhv-ādibhir bhānti vibhūṣyamāṇā vṛnde namas te caraṇāravindam || 4||
हे वृन्दे, जिनकी आज्ञा से माधव की केलि-कुंजें नवपल्लव, पुष्प, भ्रमर, मृग, मधु आदि से सुसज्जित होकर शोभायमान होती हैं — हे वृन्दे, मैं आपके चरणकमलों को प्रणाम करता हूँ।
त्वदीयदूत्येन निकुञ्जयूनोरत्युत्कयोः केलिविलाससिद्धिः । त्वत्सौभगं केन निरुच्यतां तद् वृन्दे नमस्ते चरणारविन्दम् ॥ ५॥
tvadīya-dūtyena nikuñja-yūnor atyutkayoḥ keli-vilāsa-siddhiḥ | tvat-saubhagaṁ kena nirucyatāṁ tad vṛnde namas te caraṇāravindam || 5||
हे वृन्दे, जिनके दूतीकर्म से निकुंज के अत्यन्त उत्सुक युगल की केलि-विलास की सिद्धि होती है — आपके सौभाग्य का वर्णन भला कौन कर सके? — हे वृन्दे, मैं आपके चरणकमलों को प्रणाम करता हूँ।
रासाभिलाषो वसतिश्च वृन्दावने त्वदीशाङ्घ्रिसरोजसेवा । लभ्या च पुंसां कृपया तवैव वृन्दे नमस्ते चरणारविन्दम् ॥ ६॥
rāsābhilāṣo vasatiś ca vṛndāvane tvad-īśāṅghri-saroja-sevā | labhyā ca puṁsāṁ kṛpayā tavaiva vṛnde namas te caraṇāravindam || 6||
हे वृन्दे, रासलीला की अभिलाषा, वृन्दावन में निवास और आपके प्रभु-प्रभुनी के चरणकमलों की सेवा — ये सब केवल आपकी कृपा से ही मनुष्यों को प्राप्त होते हैं — हे वृन्दे, मैं आपके चरणकमलों को प्रणाम करता हूँ।
त्वं कीर्त्यसे सात्वततन्त्रविद्भिर्लीलाभिधाना किल कृष्णशक्तिः । तवैव मूर्तिस्तुलसी नृलोके वृन्दे नमस्ते चरणारविन्दम् ॥ ७॥
tvaṁ kīrtyase sātvata-tantra-vidbhir līlābhidhānā kila kṛṣṇa-śaktiḥ | tavaiva mūrtis tulasī nṛ-loke vṛnde namas te caraṇāravindam || 7||
हे वृन्दे, सात्वत-तन्त्र के ज्ञाता आपको 'लीला' नामक कृष्णशक्ति के रूप में कीर्तित करते हैं; और मनुष्यलोक में आपकी ही मूर्ति तुलसी है — हे वृन्दे, मैं आपके चरणकमलों को प्रणाम करता हूँ।
भक्त्या विहीना अपराधलक्षैः क्षिप्ताश्च कामादितरङ्गमध्ये । कृपामयि त्वां शरणं प्रपन्ना वृन्दे नमस्ते चरणारविन्दम् ॥ ८॥
bhaktyā vihīnā aparādha-lakṣaiḥ kṣiptāś ca kāmādi-taraṅga-madhye | kṛpāmayi tvāṁ śaraṇaṁ prapannā vṛnde namas te caraṇāravindam || 8||
हे कृपामयी वृन्दे, भक्तिहीन और लाखों अपराधों से काम आदि की तरंगों के बीच फेंका हुआ मैं आपकी शरण में आया हूँ — हे वृन्दे, मैं आपके चरणकमलों को प्रणाम करता हूँ।
वृन्दाष्टकं यः शृणुयात्पठेद्वा वृन्दावनाधीशपदाब्जभृङ्गः । स प्राप्य वृन्दावननित्यवासं तत्प्रेमसेवां लभते कृतार्थः ॥
vṛndāṣṭakaṁ yaḥ śṛṇuyāt paṭhed vā vṛndāvanādhīśa-padābja-bhṛṅgaḥ | sa prāpya vṛndāvana-nitya-vāsaṁ tat-prema-sevāṁ labhate kṛtārthaḥ ||
जो भी इस वृन्दाष्टक का श्रवण या पाठ करता है, वह वृन्दावनाधीश के चरणकमलों का भ्रमर बनकर वृन्दावन में नित्य वास तथा कृतार्थ होकर वहाँ की प्रेममयी सेवा प्राप्त करता है।