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आपत्सु मित्रं जानीयात् — Word-by-Word Meaning

आपत्सु मित्रं जानीयात्

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

आपत्सु
āpatsu
विपत्ति में, संकट के समय
मित्रम्
mitram
सच्चा मित्र
जानीयात्
jānīyāt
जानना चाहिए, पहचाना जाता है
युद्धे
yuddhe
युद्ध में, संग्राम में
शूरम्
śūram
वीर, सच्चा शूरवीर
ऋणे
ṛṇe
ऋण के (मामले) में, जब धन उधार दिया जाए
शुचिम्
śucim
ईमानदार, सत्यनिष्ठ व्यक्ति
भार्याम्
bhāryām
(सच्ची) पत्नी को
क्षीणेषु वित्तेषु
kṣīṇeṣu vitteṣu
जब धन क्षीण हो जाए, जब सम्पत्ति समाप्त हो जाए
व्यसने
vyasane
विपत्ति में, संकट और कष्ट में
ca
और
सुहृज्जनम्
suhṛj-janam
शुभचिंतक, सच्चा सम्बन्धी या स्वजन

Complete Translation

सच्चे मित्र को विपत्ति में, वीर को युद्ध में, ईमानदार को ऋण (लेन-देन) में, सच्ची पत्नी को धन के क्षीण होने पर, और सच्चे सम्बन्धी को संकट में पहचाना जाता है। यह श्लोक सिखाता है कि लोगों की वास्तविक योग्यता अच्छे समय में नहीं, बल्कि कठिनाई की घड़ी में प्रकट होती है।

Origin & History

Source: Subhashita / Chanakya-niti (classical Sanskrit niti verse)

Author: Unknown (traditional; commonly cited in Chanakya-niti)

Period: Classical Sanskrit literature

यह श्लोक संस्कृत नीति-शास्त्र की समृद्ध परम्परा से सम्बन्धित है — व्यावहारिक आचरण की वह बुद्धि जो सुभाषित-संग्रहों तथा चाणक्य-नीति जैसे ग्रन्थों में संरक्षित है। जीवन के परीक्षा-क्षणों की अपनी सटीक सूची के साथ, यह इस बात पर सबसे अधिक उद्धृत शिक्षाओं में से एक बन गया है कि सच्ची मित्रता, साहस, ईमानदारी और समर्पण केवल कसौटी की घड़ी में ही प्रकट होते हैं।

Frequently Asked Questions

आपत्सु मित्रं जानीयात् का अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है 'सच्चे मित्र को विपत्ति में पहचाना जाता है।' श्लोक आगे कहता है कि सच्चे वीर को युद्ध में, ईमानदार को धन के मामले में, समर्पित जीवनसाथी को धन के नष्ट होने पर, और सच्चे सम्बन्धी को संकट में पहचाना जाता है — सब की वास्तविक योग्यता कठिन समय में प्रकट होती है।
इस श्लोक का सार क्या है?
यह कि लोगों की सच्चाई समृद्धि में नहीं, बल्कि कठिन समय में परखी और प्रकट होती है। जो कठिनाई के दौरान निष्ठावान और सहायक बने रहते हैं, वही सच्चे विश्वसनीय मित्र, जीवनसाथी और स्वजन होते हैं।
क्या यह श्लोक किसी विशेष ग्रन्थ से है?
यह शास्त्रीय संस्कृत का एक सुप्रसिद्ध सुभाषित (बुद्धिमत्तापूर्ण उक्ति) है, जो मित्रता और आचरण पर नीति-साहित्य में व्यापक रूप से उद्धृत है, और प्रायः चाणक्य-नीति जैसी संग्रह-परम्परा में उल्लिखित है।

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