अग्नि गायत्री मंत्र — Word-by-Word Meaning
अग्नि गायत्री मंत्र
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
ॐ
Om
ॐ — आदिनाद, परब्रह्म
वैश्वानराय
Vaishvanaraya
वैश्वानर को — सब प्राणियों में निवास करने वाली सर्वव्यापी अग्नि को
विद्महे
Vidmahe
हम जानें / जानने का यत्न करें
लालीलाय
Lalilaya
लपलपाती, चंचल ज्वाला-जिह्वाओं वाले का
धीमहि
Dhimahi
हम ध्यान करते हैं
तन्नः
Tannah
इसलिए, हमारे लिए / वह
अग्निः
Agnih
अग्नि, अग्निदेव — देवताओं तक आहुति पहुँचाने वाले
प्रचोदयात्
Prachodayat
वे हमारी बुद्धि को प्रेरित व प्रकाशित करें
Complete Translation
ॐ। हम वैश्वानर (सर्वव्यापी अग्नि) को जानें, लपलपाती ज्वालाओं वाले का ध्यान करें; वे अग्निदेव हमारी बुद्धि को प्रेरित व प्रकाशित करें।
Origin & History
Source: The Gayatri mantra of Agni
Author: Traditional (Vedic)
सार्वभौम गायत्री मंत्र के अतिरिक्त वैदिक परम्परा प्रत्येक महादेव को उनकी अपनी गायत्री प्रदान करती है — पवित्र गायत्री छंद में वह प्रार्थना जो उस देवता से बुद्धि को प्रकाशित करने की याचना करती है। अग्नि गायत्री अग्नि का आवाहन करती है — वह अग्निदेव जिनसे ऋग्वेद का ही आरम्भ होता है और जो यज्ञ की प्रत्येक आहुति को देवताओं तक पहुँचाते हैं। सब प्राणियों में विद्यमान सर्वव्यापी अग्नि वैश्वानर के रूप में सम्बोधित अग्नि की वन्दना "विद्महे… धीमहि… प्रचोदयात्" के शाश्वत प्रतिमान में की जाती है, और यह मंत्र शुद्धि तथा पूजा की सफलता के लिए जपा जाता है।
Frequently Asked Questions
अग्नि गायत्री मंत्र क्या है?▼
यह अग्निदेव की गायत्री है: "ॐ वैश्वानराय विद्महे लालीलाय धीमहि। तन्नो अग्निः प्रचोदयात्"। पवित्र गायत्री छंद में रचित यह मंत्र लपलपाती ज्वालाओं वाली सर्वव्यापी अग्नि (वैश्वानर) का आवाहन करता है कि वे बुद्धि को शुद्ध और प्रकाशित करें — "विद्महे… धीमहि… प्रचोदयात्" के प्रतिमान में।
अग्नि गायत्री मंत्र के क्या लाभ हैं?▼
यह शुद्धि, अग्नि कार्यों (होम/यज्ञ) की सफलता तथा आंतरिक तेज और ओज के लिए जपा जाता है। चूँकि अग्नि प्रत्येक आहुति को देवताओं तक पहुँचाते हैं और सब प्राणियों में अग्नि (वैश्वानर) के रूप में निवास करते हैं, यह मंत्र नकारात्मकता के निवारण और ज्ञान-प्रकाश के प्रज्वलन हेतु अत्यन्त मूल्यवान है।
मंत्र में नामित वैश्वानर कौन हैं?▼
वैश्वानर का अर्थ है 'सब लोगों से सम्बन्धित' — वह सर्वव्यापी अग्नि जो ब्रह्माण्ड में व्याप्त है और प्रत्येक प्राणी में, जठराग्नि और प्राणशक्ति के रूप में भी, निवास करती है। वैश्वानर का ध्यान करके यह मंत्र उस सर्वव्यापी अग्नि का आवाहन करता है जिनकी वैदिक पूजा में प्रथम पूजा होती है।
इसे कब और कितनी बार जपना चाहिए?▼
इसे माला पर 108 बार जपें, आदर्श रूप से प्रातः तथा अन्य सन्ध्या कालों में, पूर्व की ओर मुख करके, और विशेषकर होम या हवन से पूर्व या उसके दौरान। इसे दैनिक गायत्री साधना का अंग बनाया जा सकता है।
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