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अग्नि गायत्री मंत्र

🕉️ hindu·📿 108× जप·🕐 प्रातःकाल और सन्ध्या कालों में; होम/हवन से पूर्व या उसके दौरान।·📜 The Gayatri mantra of Agni

अन्य नाम / खोज: om vaishvanaraya vidmahe lalilaya dhimahi · agni gayatri · agni dev gayatri mantra

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अर्थ

अग्नि गायत्री मंत्र अग्निदेव की गायत्री छंद में वैदिक प्रार्थना है, जो वेद के देवताओं में अग्रणी और देवताओं तक हर आहुति पहुँचाने वाले हैं। सबमें विद्यमान सर्वव्यापी अग्नि वैश्वानर के रूप में सम्बोधित अग्नि से बुद्धि की शुद्धि और प्रकाश की प्रार्थना है। यह शुद्धि, यज्ञ एवं पूजा की सफलता, ओज और आंतरिक तेज के लिए जपा जाता है।

उत्पत्ति और कथा

The Gayatri mantra of Agni · Traditional (Vedic)

सार्वभौम गायत्री मंत्र के अतिरिक्त वैदिक परम्परा प्रत्येक महादेव को उनकी अपनी गायत्री प्रदान करती है — पवित्र गायत्री छंद में वह प्रार्थना जो उस देवता से बुद्धि को प्रकाशित करने की याचना करती है। अग्नि गायत्री अग्नि का आवाहन करती है — वह अग्निदेव जिनसे ऋग्वेद का ही आरम्भ होता है और जो यज्ञ की प्रत्येक आहुति को देवताओं तक पहुँचाते हैं। सब प्राणियों में विद्यमान सर्वव्यापी अग्नि वैश्वानर के रूप में सम्बोधित अग्नि की वन्दना "विद्महे… धीमहि… प्रचोदयात्" के शाश्वत प्रतिमान में की जाती है, और यह मंत्र शुद्धि तथा पूजा की सफलता के लिए जपा जाता है।

शास्त्रों में वर्णित

ऋग्वेद के सर्वप्रथम सूक्त में अग्नि की वन्दना उस दिव्य पुरोहित के रूप में होती है जो देवताओं को यज्ञ में लाते हैं और समृद्धि प्रदान करते हैं; पवित्र अग्नि प्रज्वलित करने से पूर्व उनकी गायत्री द्वारा अग्नि का आवाहन परम्परा से उपासक को शुद्ध करने और उनकी प्रार्थनाओं को निष्कलंक देवताओं तक पहुँचाने वाला माना जाता है।

मंत्र

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वैश्वानराय विद्महे लालीलाय धीमहि तन्नो अग्निः प्रचोदयात्

Om Vaishvanaraya Vidmahe Lalilaya Dhimahi. Tanno Agnih Prachodayat.

अर्थ:ॐ। हम वैश्वानर (सर्वव्यापी अग्नि) को जानें, लपलपाती ज्वालाओं वाले का ध्यान करें; वे अग्निदेव हमारी बुद्धि को प्रेरित व प्रकाशित करें।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

🔊Omॐ — आदिनाद, परब्रह्म
वैश्वानराय🔊Vaishvanarayaवैश्वानर को — सब प्राणियों में निवास करने वाली सर्वव्यापी अग्नि को
विद्महे🔊Vidmaheहम जानें / जानने का यत्न करें
लालीलाय🔊Lalilayaलपलपाती, चंचल ज्वाला-जिह्वाओं वाले का
धीमहि🔊Dhimahiहम ध्यान करते हैं
तन्नः🔊Tannahइसलिए, हमारे लिए / वह
अग्निः🔊Agnihअग्नि, अग्निदेव — देवताओं तक आहुति पहुँचाने वाले
प्रचोदयात्🔊Prachodayatवे हमारी बुद्धि को प्रेरित व प्रकाशित करें

अग्नि गायत्री मंत्र पाठ के लाभ

अग्नि की गायत्री — वह वैदिक अग्निदेव जो यज्ञ की प्रत्येक आहुति को देवताओं तक पहुँचाते हैं

शरीर, मन और परिवेश की शुद्धि तथा नकारात्मकता एवं अशुद्धि के निवारण हेतु जपा जाता है

अग्नि कार्यों (होम/यज्ञ) की सफलता तथा वैदिक पूजा के आरम्भ हेतु आवाहित, जहाँ अग्नि की प्रथम पूजा होती है

आंतरिक तेज, ओज, जठराग्नि (अन्तर्वैश्वानर) और ज्ञान-प्रकाश को प्रज्वलित करता है

गायत्री होने के कारण यह 'विद्महे-धीमहि-प्रचोदयात्' के शाश्वत प्रतिमान से बुद्धि को प्रकाशित करता है

सन्ध्या काल (प्रातः, मध्याह्न, सायं) तथा होम एवं हवन के समय विशेष रूप से शक्तिशाली

अग्नि गायत्री मंत्र जप विधि

जप संख्या108बार
उत्तम समयप्रातःकाल और सन्ध्या कालों में; होम/हवन से पूर्व या उसके दौरान।

स्नान के पश्चात् शान्त मन से पूर्व की ओर मुख करके बैठें और "ॐ वैश्वानराय विद्महे लालीलाय धीमहि। तन्नो अग्निः प्रचोदयात्" का माला पर 108 बार जप करें। समस्त गायत्री मंत्रों की भाँति यह आदर्श रूप से सन्ध्या कालों (प्रातः, मध्याह्न, सायं) में जपा जाता है। पवित्र अग्नि प्रज्वलित करने या होम/हवन करने से पूर्व यह विशेष रूप से उपयुक्त है, जहाँ अग्नि की प्रथम पूजा होती है। हृदय में देवताओं तक प्रार्थना ले जाने वाली उज्ज्वल, पवित्र अग्नि का ध्यान करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यह अग्निदेव की गायत्री है: "ॐ वैश्वानराय विद्महे लालीलाय धीमहि। तन्नो अग्निः प्रचोदयात्"। पवित्र गायत्री छंद में रचित यह मंत्र लपलपाती ज्वालाओं वाली सर्वव्यापी अग्नि (वैश्वानर) का आवाहन करता है कि वे बुद्धि को शुद्ध और प्रकाशित करें — "विद्महे… धीमहि… प्रचोदयात्" के प्रतिमान में।
यह शुद्धि, अग्नि कार्यों (होम/यज्ञ) की सफलता तथा आंतरिक तेज और ओज के लिए जपा जाता है। चूँकि अग्नि प्रत्येक आहुति को देवताओं तक पहुँचाते हैं और सब प्राणियों में अग्नि (वैश्वानर) के रूप में निवास करते हैं, यह मंत्र नकारात्मकता के निवारण और ज्ञान-प्रकाश के प्रज्वलन हेतु अत्यन्त मूल्यवान है।
वैश्वानर का अर्थ है 'सब लोगों से सम्बन्धित' — वह सर्वव्यापी अग्नि जो ब्रह्माण्ड में व्याप्त है और प्रत्येक प्राणी में, जठराग्नि और प्राणशक्ति के रूप में भी, निवास करती है। वैश्वानर का ध्यान करके यह मंत्र उस सर्वव्यापी अग्नि का आवाहन करता है जिनकी वैदिक पूजा में प्रथम पूजा होती है।
इसे माला पर 108 बार जपें, आदर्श रूप से प्रातः तथा अन्य सन्ध्या कालों में, पूर्व की ओर मुख करके, और विशेषकर होम या हवन से पूर्व या उसके दौरान। इसे दैनिक गायत्री साधना का अंग बनाया जा सकता है।

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