अग्नि गायत्री मंत्र
अन्य नाम / खोज: om vaishvanaraya vidmahe lalilaya dhimahi · agni gayatri · agni dev gayatri mantra
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✦ अर्थ
अग्नि गायत्री मंत्र अग्निदेव की गायत्री छंद में वैदिक प्रार्थना है, जो वेद के देवताओं में अग्रणी और देवताओं तक हर आहुति पहुँचाने वाले हैं। सबमें विद्यमान सर्वव्यापी अग्नि वैश्वानर के रूप में सम्बोधित अग्नि से बुद्धि की शुद्धि और प्रकाश की प्रार्थना है। यह शुद्धि, यज्ञ एवं पूजा की सफलता, ओज और आंतरिक तेज के लिए जपा जाता है।
उत्पत्ति और कथा
The Gayatri mantra of Agni · Traditional (Vedic)
सार्वभौम गायत्री मंत्र के अतिरिक्त वैदिक परम्परा प्रत्येक महादेव को उनकी अपनी गायत्री प्रदान करती है — पवित्र गायत्री छंद में वह प्रार्थना जो उस देवता से बुद्धि को प्रकाशित करने की याचना करती है। अग्नि गायत्री अग्नि का आवाहन करती है — वह अग्निदेव जिनसे ऋग्वेद का ही आरम्भ होता है और जो यज्ञ की प्रत्येक आहुति को देवताओं तक पहुँचाते हैं। सब प्राणियों में विद्यमान सर्वव्यापी अग्नि वैश्वानर के रूप में सम्बोधित अग्नि की वन्दना "विद्महे… धीमहि… प्रचोदयात्" के शाश्वत प्रतिमान में की जाती है, और यह मंत्र शुद्धि तथा पूजा की सफलता के लिए जपा जाता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
ऋग्वेद के सर्वप्रथम सूक्त में अग्नि की वन्दना उस दिव्य पुरोहित के रूप में होती है जो देवताओं को यज्ञ में लाते हैं और समृद्धि प्रदान करते हैं; पवित्र अग्नि प्रज्वलित करने से पूर्व उनकी गायत्री द्वारा अग्नि का आवाहन परम्परा से उपासक को शुद्ध करने और उनकी प्रार्थनाओं को निष्कलंक देवताओं तक पहुँचाने वाला माना जाता है।
मंत्र
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ॐ वैश्वानराय विद्महे लालीलाय धीमहि । तन्नो अग्निः प्रचोदयात् ॥
Om Vaishvanaraya Vidmahe Lalilaya Dhimahi. Tanno Agnih Prachodayat.
अर्थ:ॐ। हम वैश्वानर (सर्वव्यापी अग्नि) को जानें, लपलपाती ज्वालाओं वाले का ध्यान करें; वे अग्निदेव हमारी बुद्धि को प्रेरित व प्रकाशित करें।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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अग्नि गायत्री मंत्र पाठ के लाभ
अग्नि की गायत्री — वह वैदिक अग्निदेव जो यज्ञ की प्रत्येक आहुति को देवताओं तक पहुँचाते हैं
शरीर, मन और परिवेश की शुद्धि तथा नकारात्मकता एवं अशुद्धि के निवारण हेतु जपा जाता है
अग्नि कार्यों (होम/यज्ञ) की सफलता तथा वैदिक पूजा के आरम्भ हेतु आवाहित, जहाँ अग्नि की प्रथम पूजा होती है
आंतरिक तेज, ओज, जठराग्नि (अन्तर्वैश्वानर) और ज्ञान-प्रकाश को प्रज्वलित करता है
गायत्री होने के कारण यह 'विद्महे-धीमहि-प्रचोदयात्' के शाश्वत प्रतिमान से बुद्धि को प्रकाशित करता है
सन्ध्या काल (प्रातः, मध्याह्न, सायं) तथा होम एवं हवन के समय विशेष रूप से शक्तिशाली
अग्नि गायत्री मंत्र जप विधि
स्नान के पश्चात् शान्त मन से पूर्व की ओर मुख करके बैठें और "ॐ वैश्वानराय विद्महे लालीलाय धीमहि। तन्नो अग्निः प्रचोदयात्" का माला पर 108 बार जप करें। समस्त गायत्री मंत्रों की भाँति यह आदर्श रूप से सन्ध्या कालों (प्रातः, मध्याह्न, सायं) में जपा जाता है। पवित्र अग्नि प्रज्वलित करने या होम/हवन करने से पूर्व यह विशेष रूप से उपयुक्त है, जहाँ अग्नि की प्रथम पूजा होती है। हृदय में देवताओं तक प्रार्थना ले जाने वाली उज्ज्वल, पवित्र अग्नि का ध्यान करें।