अङ्गिकं भुवनं यस्य (नटराज ध्यान) — Word-by-Word Meaning
अङ्गिकं भुवनं यस्य (नटराज ध्यान)
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
आङ्गिकं
Āṅgikaṃ
आंगिक अभिनय — अंग-संचालन एवं मुद्रा द्वारा अभिव्यक्ति
भुवनं
Bhuvanaṃ
समस्त संसार / ब्रह्माण्ड
यस्य
Yasya
जिसका; जिनका
वाचिकं
Vāchikaṃ
वाचिक अभिनय — वाणी एवं गान द्वारा अभिव्यक्ति
सर्ववाङ्मयम्
Sarvavāṅmayam
समस्त भाषा, सम्पूर्ण वाणी — ध्वनि एवं वाक् का समग्र रूप
आहार्यं
Āhāryaṃ
आहार्य अभिनय — वेश, आभूषण एवं अलंकरण द्वारा अभिव्यक्ति
चन्द्रतारादि
Chandratārādi
चन्द्र, तारे आदि (उनके दिव्य आभूषण)
तं
Taṃ
उन्हें
नुमः
Numaḥ
हम प्रणाम करते हैं / नमन करते हैं
सात्त्विकं
Sāttvikaṃ
सात्त्विक अभिनय — सच्चे भाव की आन्तरिक, हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति; सत्त्व (शुद्धता) का साक्षात् स्वरूप
शिवम्
Śivam
शिव — मंगलमय (यहाँ नटराज, नृत्य के अधिराज रूप में)
Complete Translation
हम उन शिव को प्रणाम करते हैं जो साक्षात् सात्त्विक भाव हैं, जिनका आंगिक अभिनय (अंग-संचालन) समस्त भुवन है, जिनका वाचिक अभिनय (वाणी) सम्पूर्ण वाङ्मय है, और जिनका आहार्य अभिनय (वेश-भूषा) चन्द्र, तारे आदि हैं।
Origin & History
Source: Mangala (invocatory) shloka traditionally associated with the Abhinaya Darpana of Nandikeshvara
Author: Attributed to the tradition of Nandikeshvara (Abhinaya Darpana)
Period: Classical (treatise tradition of Indian dramaturgy)
भारतीय नृत्य एवं नाट्य के शास्त्रीय सिद्धान्त में अभिनय (नाट्य-अभिव्यक्ति) के चार भेद हैं। यह मंगल-श्लोक सुन्दर रूप से घोषित करता है कि नटराज रूप शिव के लिए ये चारों भेद साक्षात् ब्रह्माण्ड ही हैं: उनका आंगिक जगत् है, उनका वाचिक समस्त वाणी है, उनका आहार्य चन्द्र-तारे हैं, और उनका सात्त्विक शुद्ध सत्ता है। प्रदर्शन की देहरी पर पढ़ा जाकर यह सम्पूर्ण नृत्य-कला को उस दिव्य नर्तक के प्रति अर्पण के रूप में स्थापित करता है।
Frequently Asked Questions
अङ्गिकं भुवनं यस्य कहाँ से है?▼
यह नन्दिकेश्वर के अभिनय दर्पण से पारम्परिक रूप से सम्बद्ध सुप्रसिद्ध मंगल (वन्दना) श्लोक है, जो हाव-भाव एवं अभिव्यक्ति का शास्त्रीय ग्रन्थ है। इसे भरतनाट्यम् तथा अन्य शास्त्रीय प्रदर्शनों के आरम्भ में पढ़ा जाता है।
श्लोक में वर्णित चार अभिनय कौन से हैं?▼
आंगिक (शरीर द्वारा अभिव्यक्ति), वाचिक (वाणी एवं गान द्वारा), आहार्य (वेश एवं आभूषण द्वारा), तथा सात्त्विक (सच्चे आन्तरिक भाव द्वारा)। श्लोक घोषित करता है कि शिव-नटराज के लिए ये चारों ही ब्रह्माण्ड, समस्त भाषा, चन्द्र-तारे और शुद्ध भाव हैं।
नर्तक प्रदर्शन से पूर्व इसे क्यों गाते हैं?▼
क्योंकि नटराज नृत्य के अधिपति एवं आदि नर्तक हैं। उन्हें पहले प्रणाम कर कलाकार प्रदर्शन को उपासना रूप में अर्पित करता है तथा कला के लिए कृपा, एकाग्रता एवं आशीर्वाद चाहता है।
क्या गैर-नर्तक भी इस श्लोक का पाठ कर सकते हैं?▼
हाँ। कोई भी इसे नटराज रूप शिव की सुन्दर वन्दना के रूप में पढ़ सकता है, विशेषकर किसी भी सृजनात्मक कार्य से पूर्व, ताकि उस कार्य को ईश्वर को समर्पित किया जा सके।
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