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अङ्गिकं भुवनं यस्य (नटराज ध्यान)

🕉️ hindu·📿 1× जप·🕐 नृत्य अथवा संगीत के अभ्यास एवं प्रदर्शन से पूर्व; नटराज पूजा के समय; प्रदोष एवं महाशिवरात्रि पर·📜 Mangala (invocatory) shloka traditionally associated with the Abhinaya Darpana of Nandikeshvara

अन्य नाम / खोज: angikam bhuvanam yasya · aangikam bhuvanam yasya · tam numah satvikam shivam · nataraja dhyana shloka · bharatanatyam invocation shloka

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अर्थ

अङ्गिकं भुवनं यस्य नटराज रूप शिव की प्रसिद्ध मंगल-वन्दना है, जिसे भरतनाट्यम् तथा अन्य शास्त्रीय नृत्यों के आरम्भ में पढ़ा जाता है। यह अभिनय के चारों भेदों को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड पर आरोपित करती है: प्रभु का शरीर ही जगत् है, उनकी वाणी समस्त वाङ्मय है, उनका आभूषण चन्द्र-तारे हैं, और उनका अन्तःस्वरूप शुद्ध सात्त्विक भाव है। इस प्रकार नर्तक उस परम नर्तक को प्रणाम करता है जिसे समस्त कला अर्पित है।

उत्पत्ति और कथा

Mangala (invocatory) shloka traditionally associated with the Abhinaya Darpana of Nandikeshvara · Attributed to the tradition of Nandikeshvara (Abhinaya Darpana) · Classical (treatise tradition of Indian dramaturgy)

भारतीय नृत्य एवं नाट्य के शास्त्रीय सिद्धान्त में अभिनय (नाट्य-अभिव्यक्ति) के चार भेद हैं। यह मंगल-श्लोक सुन्दर रूप से घोषित करता है कि नटराज रूप शिव के लिए ये चारों भेद साक्षात् ब्रह्माण्ड ही हैं: उनका आंगिक जगत् है, उनका वाचिक समस्त वाणी है, उनका आहार्य चन्द्र-तारे हैं, और उनका सात्त्विक शुद्ध सत्ता है। प्रदर्शन की देहरी पर पढ़ा जाकर यह सम्पूर्ण नृत्य-कला को उस दिव्य नर्तक के प्रति अर्पण के रूप में स्थापित करता है।

शास्त्रों में वर्णित

कहा जाता है कि चिदम्बरम् में नटराज का कॉस्मिक नृत्य सृष्टि की लय को धारण करता है; जो कलाकार इस वन्दना से आरम्भ करते हैं वे साक्षी देते हैं कि उनके प्रदर्शन में सहज लालित्य आ जाता है, मानो स्वयं वह परम नर्तक उनके अंगों एवं वाणी से प्रवाहित हो रहा हो।

मंत्र

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आङ्गिकं भुवनं यस्य वाचिकं सर्ववाङ्मयम्। आहार्यं चन्द्रतारादि तं नुमः सात्त्विकं शिवम्॥

Āṅgikaṃ bhuvanaṃ yasya vāchikaṃ sarvavāṅmayam Āhāryaṃ chandratārādi taṃ numaḥ sāttvikaṃ śivam

अर्थ:हम उन शिव को प्रणाम करते हैं जो साक्षात् सात्त्विक भाव हैं, जिनका आंगिक अभिनय (अंग-संचालन) समस्त भुवन है, जिनका वाचिक अभिनय (वाणी) सम्पूर्ण वाङ्मय है, और जिनका आहार्य अभिनय (वेश-भूषा) चन्द्र, तारे आदि हैं।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

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आङ्गिकं🔊Āṅgikaṃआंगिक अभिनय — अंग-संचालन एवं मुद्रा द्वारा अभिव्यक्ति
भुवनं🔊Bhuvanaṃसमस्त संसार / ब्रह्माण्ड
यस्य🔊Yasyaजिसका; जिनका
वाचिकं🔊Vāchikaṃवाचिक अभिनय — वाणी एवं गान द्वारा अभिव्यक्ति
सर्ववाङ्मयम्🔊Sarvavāṅmayamसमस्त भाषा, सम्पूर्ण वाणी — ध्वनि एवं वाक् का समग्र रूप
आहार्यं🔊Āhāryaṃआहार्य अभिनय — वेश, आभूषण एवं अलंकरण द्वारा अभिव्यक्ति
चन्द्रतारादि🔊Chandratārādiचन्द्र, तारे आदि (उनके दिव्य आभूषण)
तं🔊Taṃउन्हें
नुमः🔊Numaḥहम प्रणाम करते हैं / नमन करते हैं
सात्त्विकं🔊Sāttvikaṃसात्त्विक अभिनय — सच्चे भाव की आन्तरिक, हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति; सत्त्व (शुद्धता) का साक्षात् स्वरूप
शिवम्🔊Śivamशिव — मंगलमय (यहाँ नटराज, नृत्य के अधिराज रूप में)

अङ्गिकं भुवनं यस्य (नटराज ध्यान) पाठ के लाभ

शास्त्रीय नृत्य एवं संगीत की पारम्परिक प्रारम्भिक वन्दना — कला को उपासना के रूप में पवित्र करती है

कलाकार को स्मरण कराती है कि समस्त अभिव्यक्ति अन्ततः ईश्वर की ओर संकेत करती है

प्रदर्शन अथवा अभ्यास से पूर्व विनम्रता एवं भक्ति को विकसित करती है

साधक को नटराज से जोड़ती है, जिनका कॉस्मिक नृत्य ब्रह्माण्ड का सृजन एवं संहार करता है

शरीर एवं वाणी में एकाग्रता, लालित्य एवं आन्तरिक सामंजस्य (सत्त्व) लाती है

किसी भी सृजनात्मक अथवा कलात्मक कार्य से पूर्व पढ़ना शुभ माना जाता है

अङ्गिकं भुवनं यस्य (नटराज ध्यान) जप विधि

जप संख्या1बार
उत्तम समयनृत्य अथवा संगीत के अभ्यास एवं प्रदर्शन से पूर्व; नटराज पूजा के समय; प्रदोष एवं महाशिवरात्रि पर

नृत्य, संगीत अथवा कलात्मक अभ्यास आरम्भ करने से पूर्व खड़े होकर अथवा बैठकर, हाथ जोड़कर इसे एक बार (अथवा तीन बार) पढ़ें। मन को नटराज पर एकाग्र करें, जिनका चतुर्विध नृत्य स्वयं ब्रह्माण्ड है। अनेक नर्तक प्रदर्शन में पग रखने से पूर्व इस श्लोक को रंगपूजा (मंच को नमस्कार) तथा गुरु-वन्दना के साथ अर्पित करते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यह नन्दिकेश्वर के अभिनय दर्पण से पारम्परिक रूप से सम्बद्ध सुप्रसिद्ध मंगल (वन्दना) श्लोक है, जो हाव-भाव एवं अभिव्यक्ति का शास्त्रीय ग्रन्थ है। इसे भरतनाट्यम् तथा अन्य शास्त्रीय प्रदर्शनों के आरम्भ में पढ़ा जाता है।
आंगिक (शरीर द्वारा अभिव्यक्ति), वाचिक (वाणी एवं गान द्वारा), आहार्य (वेश एवं आभूषण द्वारा), तथा सात्त्विक (सच्चे आन्तरिक भाव द्वारा)। श्लोक घोषित करता है कि शिव-नटराज के लिए ये चारों ही ब्रह्माण्ड, समस्त भाषा, चन्द्र-तारे और शुद्ध भाव हैं।
क्योंकि नटराज नृत्य के अधिपति एवं आदि नर्तक हैं। उन्हें पहले प्रणाम कर कलाकार प्रदर्शन को उपासना रूप में अर्पित करता है तथा कला के लिए कृपा, एकाग्रता एवं आशीर्वाद चाहता है।
हाँ। कोई भी इसे नटराज रूप शिव की सुन्दर वन्दना के रूप में पढ़ सकता है, विशेषकर किसी भी सृजनात्मक कार्य से पूर्व, ताकि उस कार्य को ईश्वर को समर्पित किया जा सके।

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