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आपो हि ष्ठा मयोभुवः — Word-by-Word Meaning

आपो हि ष्ठा मयोभुवः

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

आपः
Apah
हे जल (दिव्य, जीवनदायी जल)
हि ष्ठा
Hi Shtha
निश्चय ही तुम हो; सचमुच तुम विद्यमान हो
मयोभुवः
Mayo-Bhuvah
सुख और कल्याण के स्रोत; आनन्द प्रदान करने वाले
ता नः
Ta Nah
अतः, हमें
ऊर्जे दधातन
Urje Dadhatana
बल और पोषण (ओज) प्रदान करो
महे रणाय चक्षसे
Mahe Ranaya Chakshase
महान् आनन्द की अनुभूति के लिए (तथा महान् आध्यात्मिक दृष्टि के लिए)
यो वः शिवतमो रसः
Yo Vah Shivatamo Rasah
तुम्हारा वह परम कल्याणकारी, आनन्दमय रस
तस्य भाजयत इह नः
Tasya Bhajayata Iha Nah
उसका अंश हमें यहाँ (इस लोक में) दो
उशतीरिव मातरः
Ushatir-Iva Matarah
उन उत्सुक स्नेहमयी माताओं के समान (जो अपने बच्चों को पोषने को आतुर हों)
तस्मा अरं गमाम वः
Tasma Aram Gamama Vah
उस हेतु हम तुम्हारी शरण में पूर्ण रूप से आते हैं (सहर्ष आश्रय लेते हैं)
यस्य क्षयाय जिन्वथ
Yasya Kshayaya Jinvatha
जिसके (आनन्द के) धाम की ओर तुम हमें प्रसन्न कर प्रेरित करते हो
आपो जनयथा च नः
Apo Janayatha Cha Nah
हे जल, और (इस प्रकार) हमें पुनः नवजीवन दो / नवजन्म दो

Complete Translation

हे जल! तुम निश्चय ही सुख और कल्याण के स्रोत हो; अतः हमें बल और पोषण दो, जिससे हम महान् आनन्द का अनुभव कर सकें। तुम्हारे उस परम कल्याणकारी रस का अंश हमें इसी लोक में दो — उन स्नेहमयी माताओं के समान जो अपने बच्चों को पालने के लिए उत्सुक हों। उस आनन्द के लिए हम तुम्हारी शरण में सहर्ष आते हैं, जिसके धाम की ओर तुम हमें प्रेरित करते हो; हे जल, हमें पुनः नवजीवन दो। (यह मार्जन-सूक्त है, जिसे नित्य अनुष्ठान में पवित्र जल का प्रोक्षण करते समय बोला जाता है।)

Origin & History

Source: Rigveda 10.9.1–3 (also in Yajurveda); used in Sandhyavandana Marjana

Author: Rishi Sindhudvipa (Ambarisha)

Period: Vedic

जल (आप:) के लिए यह लघु सूक्त वेद के सर्वाधिक बार जपे जाने वाले अंशों में से एक है। ऋग्वेद के दशम मण्डल में ऋषि सिन्धुद्वीप को आरोपित यह जल को एक दिव्य, मातृवत् शक्ति के रूप में मूर्त करता है जो बल, आनन्द और आध्यात्मिक नवजीवन प्रदान करती है। क्योंकि जल महान् शोधक है, परम्परा ने इन ऋचाओं को नित्य मार्जन-कर्म के केन्द्र में रखा, जहाँ उपासक इन्हें बोलते हुए शरीर पर अभिमन्त्रित जल छिड़ककर पवित्र के समीप जाने से पूर्व स्वयं को शुद्ध करता है।

Frequently Asked Questions

'आपो हि ष्ठा' का क्या अर्थ है?
'आपो हि ष्ठा' का अर्थ है 'हे जल, तुम निश्चय ही हो…'। यह तीन ऋचाओं वाले ऋग्वेदीय सूक्त का आरम्भ है जो जल को 'मयोभुवः' — कल्याण और आनन्द का स्रोत — कहकर उससे बल, उसका परम कल्याणकारी रस और नवजीवन माँगता है।
यह मन्त्र कहाँ से आया है?
यह ऋग्वेद (मण्डल 10, सूक्त 9, ऋचा 1–3) से है, जिसका श्रेय ऋषि सिन्धुद्वीप को दिया जाता है। ये ही ऋचाएँ यजुर्वेद में भी आती हैं और नित्य सन्ध्यावन्दन तथा मन्दिर-पूजा में व्यापक रूप से प्रयुक्त होती हैं।
यह नित्य अनुष्ठान में कैसे प्रयुक्त होता है?
यह प्रमुख मार्जन (जल-प्रोक्षण) मन्त्र है। उपासक इसे बोलते हुए सिर और शरीर पर पवित्र जल छिड़कता या स्पर्श कराता है, जिससे आगे की पूजा से पूर्व बाह्य शरीर और अन्तरात्मा दोनों की शुद्धि होती है।
जल को 'माता' क्यों कहा गया है?
यह ऋचा जल की तुलना 'उशतीरिव मातरः' — अपने बच्चों को पोषने को उत्सुक स्नेहमयी माताओं — से करती है। जैसे माता स्वयं अपना दूध देती है, वैसे ही जल से उसके परम आनन्दमय, जीवनधारक रस का अंश उपासक के साथ बाँटने की प्रार्थना की जाती है।

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