Mantra.Tips
waterapahpurificationrigveda

आपो हि ष्ठा मयोभुवः

🕉️ hindu·📿 3× जप·🕐 प्रातः, मध्याह्न और सायं सन्ध्या के समय मार्जन में; किसी भी पूजा या होम से पूर्व·📜 Rigveda 10.9.1–3 (also in Yajurveda); used in Sandhyavandana Marjana

अन्य नाम / खोज: apo hi shtha · apo hi stha mayo bhuvah · apah suktam · marjana mantra · water purification mantra · apo hi shtha mayobhuvah

Share:

अर्थ

ये तीन ऋचाएँ दिव्य जल (आप:) को सम्बोधित हैं और ऋग्वेद की सर्वाधिक प्रिय ऋचाओं में हैं; इन्हें नित्य मार्जन — पवित्र जल के प्रोक्षण — के समय सन्ध्यावन्दन एवं अनेक पूजाओं में बोला जाता है। ये जल को कल्याण, बल और नवजीवन का स्रोत कहकर उसे स्नेहमयी माताओं के समान बताती हैं, और उसके परम कल्याणकारी आनन्दमय रस का अंश माँगती हैं। इन्हें बोलते हुए सिर एवं शरीर पर जल छिड़ककर भीतरी-बाहरी शुद्धि की जाती है।

उत्पत्ति और कथा

Rigveda 10.9.1–3 (also in Yajurveda); used in Sandhyavandana Marjana · Rishi Sindhudvipa (Ambarisha) · Vedic

जल (आप:) के लिए यह लघु सूक्त वेद के सर्वाधिक बार जपे जाने वाले अंशों में से एक है। ऋग्वेद के दशम मण्डल में ऋषि सिन्धुद्वीप को आरोपित यह जल को एक दिव्य, मातृवत् शक्ति के रूप में मूर्त करता है जो बल, आनन्द और आध्यात्मिक नवजीवन प्रदान करती है। क्योंकि जल महान् शोधक है, परम्परा ने इन ऋचाओं को नित्य मार्जन-कर्म के केन्द्र में रखा, जहाँ उपासक इन्हें बोलते हुए शरीर पर अभिमन्त्रित जल छिड़ककर पवित्र के समीप जाने से पूर्व स्वयं को शुद्ध करता है।

शास्त्रों में वर्णित

वैदिक ऋषियों ने जल को अमरत्व का अमृत और समस्त औषधियों का धारक माना; आप:-सूक्त घोषित करते हैं कि जल में ही सभी औषधियाँ और शरीर को नीरोग करने वाली भेषज विद्यमान हैं। भक्तों का विश्वास है कि इन ऋचाओं से किया गया सच्चा मार्जन न केवल शारीरिक मलिनता, अपितु मन के सूक्ष्म दागों को भी धो देता है।

सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित

किसी भी पंक्ति या ▶ बटन पर टैप कर सुनें

श्लोक 1

आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता ऊर्जे दधातन। महे रणाय चक्षसे॥

Om Apo Hi Shtha Mayo-Bhuvas-Ta Na Urje Dadhatana. Mahe Ranaya Chakshase.

अर्थ:हे जल! तुम निश्चय ही सुख और कल्याण के स्रोत हो; अतः हमें बल और पोषण दो, जिससे हम महान् आनन्द का अनुभव कर सकें। तुम्हारे उस परम कल्याणकारी रस का अंश हमें इसी लोक में दो — उन स्नेहमयी माताओं के समान जो अपने बच्चों को पालने के लिए उत्सुक हों। उस आनन्द के लिए हम तुम्हारी शरण में सहर्ष आते हैं, जिसके धाम की ओर तुम हमें प्रेरित करते हो; हे जल, हमें पुनः नवजीवन दो। (यह मार्जन-सूक्त है, जिसे नित्य अनुष्ठान में पवित्र जल का प्रोक्षण करते समय बोला जाता है।)

श्लोक 2

यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह नः। उशतीरिव मातरः॥

Yo Vah Shivatamo Rasas-Tasya Bhajayateha Nah. Ushatir-Iva Matarah.

श्लोक 3

तस्मा अरं गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्वथ। आपो जनयथा नः॥

Tasma Aram Gamama Vo Yasya Kshayaya Jinvatha. Apo Janayatha Cha Nah.

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

आपः🔊Apahहे जल (दिव्य, जीवनदायी जल)
हि ष्ठा🔊Hi Shthaनिश्चय ही तुम हो; सचमुच तुम विद्यमान हो
मयोभुवः🔊Mayo-Bhuvahसुख और कल्याण के स्रोत; आनन्द प्रदान करने वाले
ता नः🔊Ta Nahअतः, हमें
ऊर्जे दधातन🔊Urje Dadhatanaबल और पोषण (ओज) प्रदान करो
महे रणाय चक्षसे🔊Mahe Ranaya Chakshaseमहान् आनन्द की अनुभूति के लिए (तथा महान् आध्यात्मिक दृष्टि के लिए)
यो वः शिवतमो रसः🔊Yo Vah Shivatamo Rasahतुम्हारा वह परम कल्याणकारी, आनन्दमय रस
तस्य भाजयत इह नः🔊Tasya Bhajayata Iha Nahउसका अंश हमें यहाँ (इस लोक में) दो
उशतीरिव मातरः🔊Ushatir-Iva Matarahउन उत्सुक स्नेहमयी माताओं के समान (जो अपने बच्चों को पोषने को आतुर हों)
तस्मा अरं गमाम वः🔊Tasma Aram Gamama Vahउस हेतु हम तुम्हारी शरण में पूर्ण रूप से आते हैं (सहर्ष आश्रय लेते हैं)
यस्य क्षयाय जिन्वथ🔊Yasya Kshayaya Jinvathaजिसके (आनन्द के) धाम की ओर तुम हमें प्रसन्न कर प्रेरित करते हो
आपो जनयथा च नः🔊Apo Janayatha Cha Nahहे जल, और (इस प्रकार) हमें पुनः नवजीवन दो / नवजन्म दो

आपो हि ष्ठा मयोभुवः पाठ के लाभ

शरीर और मन को छिड़के हुए जल से शुद्ध करने वाला वैदिक मार्जन मन्त्र

दिव्य जल को बल, पोषण और नवजीवन के दाता के रूप में आवाहित करता है

जप, पूजा, होम या सन्ध्यावन्दन से पूर्व सूक्ष्म अशुद्धियों को धोता है

जल के प्रति मातृवत्, जीवनदायी शक्ति के रूप में कृतज्ञता जगाता है

स्वास्थ्य, ओज और दृष्टि की निर्मलता प्रदान करने वाला माना जाता है ('महे रणाय चक्षसे')

एक सरल, सर्वत्र प्रयुक्त ऋग्वेदीय मन्त्र जो नित्य अभ्यास के लिए उपयुक्त है

आपो हि ष्ठा मयोभुवः जप विधि

जप संख्या3बार
उत्तम समयप्रातः, मध्याह्न और सायं सन्ध्या के समय मार्जन में; किसी भी पूजा या होम से पूर्व

दाहिनी हथेली में अथवा छोटे चम्मच (उद्धरणी) में स्वच्छ जल लें। तीनों ऋचाओं का पाठ करते हुए दर्भ-घास या उँगलियों के अग्रभाग को जल में डुबोकर सिर और शरीर पर उसका प्रोक्षण (मार्जन) करें, अथवा भीगी उँगलियों से सिर, नेत्रों और अंगों का स्पर्श करें। प्रत्येक ऋचा के अन्त में जल छिड़का जाता है। पूर्वाभिमुख बैठें, मन शान्त रखें, और जल को दिव्य शोधक आप: के रूप में देखें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'आपो हि ष्ठा' का अर्थ है 'हे जल, तुम निश्चय ही हो…'। यह तीन ऋचाओं वाले ऋग्वेदीय सूक्त का आरम्भ है जो जल को 'मयोभुवः' — कल्याण और आनन्द का स्रोत — कहकर उससे बल, उसका परम कल्याणकारी रस और नवजीवन माँगता है।
यह ऋग्वेद (मण्डल 10, सूक्त 9, ऋचा 1–3) से है, जिसका श्रेय ऋषि सिन्धुद्वीप को दिया जाता है। ये ही ऋचाएँ यजुर्वेद में भी आती हैं और नित्य सन्ध्यावन्दन तथा मन्दिर-पूजा में व्यापक रूप से प्रयुक्त होती हैं।
यह प्रमुख मार्जन (जल-प्रोक्षण) मन्त्र है। उपासक इसे बोलते हुए सिर और शरीर पर पवित्र जल छिड़कता या स्पर्श कराता है, जिससे आगे की पूजा से पूर्व बाह्य शरीर और अन्तरात्मा दोनों की शुद्धि होती है।
यह ऋचा जल की तुलना 'उशतीरिव मातरः' — अपने बच्चों को पोषने को उत्सुक स्नेहमयी माताओं — से करती है। जैसे माता स्वयं अपना दूध देती है, वैसे ही जल से उसके परम आनन्दमय, जीवनधारक रस का अंश उपासक के साथ बाँटने की प्रार्थना की जाती है।

ये भी पढ़ें

उपयोगी लगा? अपनों के साथ साझा करें 🙏

Share:

Explore more sacred mantras with complete meaning and chanting guides