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अपवित्रः पवित्रो वा

🕉️ hindu·📿 3× जप·🕐 किसी भी पूजा, हवन या पवित्र अनुष्ठान के ठीक आरम्भ में; अथवा जब भी पवित्रीकरण की आवश्यकता हो·📜 Traditional Pavitrikarana mantra (Vaishnava / Puranic ritual tradition; widely cited from Garuda and Padma Purana usage)

अन्य नाम / खोज: apavitrah pavitro va · apavitra pavitro va · pavitrikarana mantra · purification mantra · yah smaret pundarikaksham · sarvavastham gato pi va

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अर्थ

अपवित्रः पवित्रो वा प्रायः हर हिन्दू पूजा एवं अनुष्ठान के आरम्भ में पढ़ा जाने वाला सार्वभौमिक पवित्रीकरण मंत्र है। यह घोषित करता है कि कमलनयन भगवान विष्णु का मात्र स्मरण मनुष्य को भीतर-बाहर से पवित्र कर देता है, चाहे उसकी अवस्था कैसी भी हो। इसे अपने ऊपर तथा पूजा-सामग्री पर जल छिड़कते हुए बोला जाता है।

उत्पत्ति और कथा

Traditional Pavitrikarana mantra (Vaishnava / Puranic ritual tradition; widely cited from Garuda and Padma Purana usage) · Traditional (ancient ritual verse) · Puranic / classical

यह श्लोक लगभग सभी परम्पराओं में हिन्दू अनुष्ठानिक पूजा का सार्वभौमिक प्रारम्भ बन गया। पूजा करने से पूर्व उपासक को पहले पवित्र होना चाहिए, परन्तु केवल बाहरी शुद्धि अधूरी है। यह श्लोक इस समस्या का समाधान यह घोषित करके करता है कि कमलनयन भगवान विष्णु का स्मरण मनुष्य की अवस्था कैसी भी हो, उसे भीतर-बाहर से पूर्ण पवित्रता प्रदान कर देता है। इसी कारण इसे साधारण गृह-पूजा से लेकर विशाल यज्ञों तक अनगिनत समारोहों के आरम्भ में पढ़ा जाता है।

शास्त्रों में वर्णित

श्लोक स्वयं अपनी शक्ति का प्रमाण है: यह वचन देता है कि जो अपवित्र है अथवा किसी भी संकटपूर्ण अवस्था में है, वह भी कमलनयन भगवान पुण्डरीकाक्ष का स्मरण करने के एकमात्र कार्य से तत्क्षण बाहर और भीतर से पूर्ण पवित्र हो जाता है।

मंत्र

किसी भी पंक्ति या ▶ बटन पर टैप कर सुनें

अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥

Apavitraḥ pavitro vā sarvāvasthāṃ gato 'pi vā. yaḥ smaret puṇḍarīkākṣaṃ sa bāhyābhyantaraḥ śuciḥ.

अर्थ:मनुष्य चाहे अपवित्र हो या पवित्र, अथवा किसी भी अवस्था को प्राप्त हो — जो भी कमलनयन भगवान (विष्णु) का स्मरण करता है, वह बाहर और भीतर से पवित्र हो जाता है।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

अपवित्रः🔊apavitraḥअपवित्र, अशुद्ध
पवित्रः🔊pavitraḥपवित्र, शुद्ध
वा🔊अथवा
सर्व-अवस्थाम्🔊sarva-avasthāmकिसी भी दशा या अवस्था में
गतः🔊gataḥपहुँचा हुआ / स्थित
अपि🔊apiभी
वा🔊अथवा
यः🔊yaḥजो कोई
स्मरेत्🔊smaretस्मरण करता है / ध्यान करता है
पुण्डरीकाक्षम्🔊puṇḍarīkākṣamकमलनयन भगवान (विष्णु)
सः🔊saḥवह, वह व्यक्ति
बाह्य-अभ्यन्तरः🔊bāhya-abhyantaraḥबाहर और भीतर से
शुचिः🔊śuciḥपवित्र, शुद्ध

अपवित्रः पवित्रो वा पाठ के लाभ

किसी भी पूजा से पूर्व उपासक और समस्त पूजा-सामग्री को पवित्र करता है

यह दृढ़ करता है कि विष्णु का स्मरण भीतरी और बाहरी अशुद्धि को धो देता है

अनुष्ठानिक एवं मानसिक अशुद्धि (अशौच) को दूर करता है, जिससे पूजा प्रारम्भ हो सके

किसी भी समारोह के आरम्भ में सही भक्तिभाव स्थापित करता है

जब भी अपवित्रता का अनुभव हो या पवित्र कार्यों से पूर्व इसका जप किया जा सकता है

कमलनयन भगवान पुण्डरीकाक्ष की कृपा का आवाहन करता है

भीतरी शुद्धता, शान्ति और पूजा के योग्य होने का भाव प्रदान करता है

अपवित्रः पवित्रो वा जप विधि

जप संख्या3बार
उत्तम समयकिसी भी पूजा, हवन या पवित्र अनुष्ठान के ठीक आरम्भ में; अथवा जब भी पवित्रीकरण की आवश्यकता हो

यह मानक पवित्रीकरण (आत्म-शुद्धि) श्लोक है। दाहिने हाथ में थोड़ा जल अथवा कुश/पुष्प लें, श्लोक का पाठ करें और जल को अपने सिर तथा शरीर पर और पूजा-सामग्री पर छिड़कें। पुण्डरीकाक्ष (कमलनयन विष्णु) का स्मरण करते हुए इसे तीन बार पढ़ने से उपासक और स्थान पवित्र हो जाते हैं और आगे की पूजा के लिए तैयार हो जाते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यह पवित्रीकरण मंत्र है — लगभग हर हिन्दू पूजा या अनुष्ठान के आरम्भ में पढ़ा जाने वाला शुद्धिकरण श्लोक। यह पूजा प्रारम्भ होने से पूर्व उपासक, स्थान और सामग्री को पवित्र करता है।
पुण्डरीकाक्ष का अर्थ है 'कमल के समान नेत्रों वाले', जो भगवान विष्णु का सुप्रसिद्ध नाम है। यह श्लोक सिखाता है कि उनका मात्र स्मरण मनुष्य को बाहर और भीतर से पूर्णतः पवित्र कर देता है।
परम्परा से जल लेकर (प्रायः कुश की एक तीली या पुष्प के साथ) इस श्लोक का पाठ करते हुए उसे अपने ऊपर तथा पूजा-सामग्री पर छिड़का जाता है, जो यह दर्शाता है कि विष्णु के स्मरण से सब पवित्र हो गए हैं।
हाँ। कोई भी व्यक्ति जब चाहे इसका पाठ कर सकता है जब वह स्वयं को पवित्र अनुभव करना चाहे — प्रार्थना, अध्ययन या किसी पवित्र कार्य से पूर्व — क्योंकि इसका सार यही है कि भगवान का स्मरण बाहरी परिस्थिति की चिन्ता किए बिना मनुष्य को पवित्र बना देता है।

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