शान्ताकारं भुजगशयनं
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✦ अर्थ
शान्ताकारं भुजगशयनं भगवान विष्णु का सर्वश्रेष्ठ ध्यान श्लोक है, जो उनकी शान्त मूर्ति का वर्णन करता है — शेषनाग पर शयन, नाभि से कमल, मेघवर्ण और कमलनयन। इसे विष्णु की पूजा, जप या विष्णु सहस्रनाम से पूर्व उनके स्वरूप का स्मरण करने हेतु पढ़ा जाता है। यह सांसारिक भय को हरने और शान्ति, रक्षा व नारायण की कृपा प्रदान करने वाला माना जाता है।
उत्पत्ति और कथा
Traditional Vishnu Dhyana Shloka · Traditional · Classical
यह एकल देदीप्यमान श्लोक भगवान विष्णु का शास्त्रीय ध्यान (ध्यान) श्लोक है, जो समस्त भारत में उनकी पूजा और विष्णु सहस्रनाम से पूर्व पढ़ा जाता है। एक ही झलक में यह नारायण को क्षीर-सागर पर शेषनाग पर सोते हुए दर्शाता है — शान्त, नाभि-कमल वाले, मेघवर्ण और कमलनयन — समस्त लोकों के आधार और हर भय के हरण करने वाले।
✦ शास्त्रों में वर्णित
ऋषि मानते हैं कि प्रभु को इस श्लोक के वर्णन अनुसार — सर्प पर शान्त, कमलनयन और मेघवर्ण — दर्शन करना ही भय से मुक्त होना है; इसे सबसे पहले जपा जाता है ताकि मन, उस शान्त स्वरूप पर स्थिर होकर, बिना विचलन के पूजा में प्रवेश कर सके।
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शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् ।
Shantakaram bhujagashayanam padmanabham suresham Vishvadharam gaganasadrisham meghavarnam shubhangam
अर्थ:शान्त रूप वाले, सर्प (शेष) पर शयन करने वाले, नाभि से कमल प्रकट करने वाले, देवों के स्वामी; विश्व के आधार, आकाश-समान असीम, मेघवर्ण, समस्त शुभ अंगों वाले;
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥
Lakshmikantam kamalanayanam yogibhirdhyanagamyam Vande vishnum bhavabhayaharam sarvalokaikanatham
अर्थ:लक्ष्मी के प्रिय, कमलनयन, ध्यान में योगियों द्वारा प्राप्य — मैं उन विष्णु को नमस्कार करता हूँ, जो सांसारिक भय के हरण करने वाले और समस्त लोकों के एकमात्र स्वामी हैं।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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शान्ताकारं भुजगशयनं पाठ के लाभ
भगवान विष्णु का सर्वोच्च ध्यान श्लोक (ध्यान-पद्य), जो पूजा, जप या विष्णु सहस्रनाम से पूर्व उनके स्वरूप का स्मरण कराता है।
विष्णु को शेषनाग पर शयन करते, नाभि-कमल, मेघवर्ण और कमलनयन रूप में वर्णित करता है, जिससे प्रभु के दर्शन में शान्ति और भक्ति गहराती है।
सांसारिक भय (भव-भय) को हरने और शान्ति, रक्षा तथा नारायण की कृपा प्रदान करने वाला माना जाता है।
प्रतिदिन, और विशेषकर गुरुवार (विष्णु का दिन), एकादशी को, तथा विष्णु सहस्रनाम या भगवद् गीता के पाठ से पूर्व पढ़ा जाता है।
विष्णु, नारायण, कृष्ण या सत्यनारायण पूजा से पूर्व आरम्भिक ध्यान के रूप में जपा जाता है।
शान्ताकारं भुजगशयनं जप विधि
विष्णु (या नारायण / कृष्ण) के चित्र के सम्मुख शान्ति से बैठें, दीपक जलाएँ, और श्लोक को धीरे-धीरे पढ़ते हुए प्रभु के स्वरूप के प्रत्येक विवरण का दर्शन करें — सर्प-शय्या, नाभि-कमल, मेघ-नीला शरीर और कमल नेत्र। यह विष्णु सहस्रनाम से पूर्व पढ़ा जाने वाला पारम्परिक ध्यान श्लोक है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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