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शान्ताकारं भुजगशयनं Meaning — Line by Line

शान्ताकारं भुजगशयनं

Every verse and every word explained in English & Hindi

Meaning — Line by Line

Every verse of शान्ताकारं भुजगशयनं with its Hindi meaning. Tap any word to hear it, or ▶ to recite the verse.

Verse 1#

Shantakaram bhujagashayanam padmanabham suresham

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्

Shantakaram bhujagashayanam padmanabham suresham Vishvadharam gaganasadrisham meghavarnam shubhangam

Meaningशान्त रूप वाले, सर्प (शेष) पर शयन करने वाले, नाभि से कमल प्रकट करने वाले, देवों के स्वामी; विश्व के आधार, आकाश-समान असीम, मेघवर्ण, समस्त शुभ अंगों वाले;

Verse 2#

Lakshmikantam kamalanayanam yogibhirdhyanagamyam

लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्

Lakshmikantam kamalanayanam yogibhirdhyanagamyam Vande vishnum bhavabhayaharam sarvalokaikanatham

Meaningलक्ष्मी के प्रिय, कमलनयन, ध्यान में योगियों द्वारा प्राप्य — मैं उन विष्णु को नमस्कार करता हूँ, जो सांसारिक भय के हरण करने वाले और समस्त लोकों के एकमात्र स्वामी हैं।

Word-by-Word Breakdown

शान्ताकारम्
Shantakaram
शान्त, सौम्य रूप वाले
भुजगशयनम्
Bhujagashayanam
क्षीरसागर पर शेषनाग (आदिशेष) पर शयन करने वाले
पद्मनाभम्
Padmanabham
जिनकी नाभि से वह कमल प्रकट होता है जिस पर ब्रह्मा का जन्म होता है
लक्ष्मीकान्तम्
Lakshmikantam
देवी लक्ष्मी के प्रिय (पति)
भवभयहरम्
Bhavabhayaharam
सांसारिक अस्तित्व (भव) के भय (भय) को हरने वाले

Origin & History

Source: Traditional Vishnu Dhyana Shloka

Author: Traditional

Period: Classical

यह एकल देदीप्यमान श्लोक भगवान विष्णु का शास्त्रीय ध्यान (ध्यान) श्लोक है, जो समस्त भारत में उनकी पूजा और विष्णु सहस्रनाम से पूर्व पढ़ा जाता है। एक ही झलक में यह नारायण को क्षीर-सागर पर शेषनाग पर सोते हुए दर्शाता है — शान्त, नाभि-कमल वाले, मेघवर्ण और कमलनयन — समस्त लोकों के आधार और हर भय के हरण करने वाले।

Frequently Asked Questions

शान्ताकारं भुजगशयनं क्या है?
यह भगवान विष्णु का सर्वाधिक प्रसिद्ध ध्यान श्लोक (ध्यान-पद्य) है, जो उन्हें शान्त मूर्ति में शेषनाग पर शयन करते, नाभि से कमल, मेघवर्ण और कमलनयन रूप में वर्णित करता है। इसे पारम्परिक रूप से पूजा और विष्णु सहस्रनाम से पूर्व प्रभु के दर्शन हेतु पढ़ा जाता है।
शान्ताकारं श्लोक कब पढ़ा जाता है?
इसे प्रतिदिन और विशेषकर गुरुवार (विष्णु का दिन) तथा एकादशी को, और विष्णु सहस्रनाम, भगवद् गीता के पाठ से पूर्व या विष्णु/सत्यनारायण पूजा से पूर्व आरम्भिक ध्यान के रूप में पढ़ा जाता है।
शान्ताकारं भुजगशयनं का अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है: 'मैं विष्णु को नमस्कार करता हूँ — शान्त रूप वाले, शेषनाग पर शयन करने वाले, नाभि-कमल वाले, देवों के स्वामी, विश्व के आधार, आकाश-समान विशाल, मेघवर्ण और शुभ अंगों वाले, लक्ष्मी के प्रिय, कमलनयन, ध्यान में योगियों द्वारा प्राप्य, सांसारिक भय के हरण करने वाले और समस्त लोकों के एकमात्र स्वामी को।'
विष्णु को सर्प पर शयन करते क्यों दिखाया जाता है?
विष्णु क्षीरसागर पर तैरते सहस्र-फण वाले आदिशेष पर शयन करते हैं, जो सृष्टि-चक्रों के बीच प्रभु के शान्त ब्रह्माण्डीय चेतना में विश्राम का प्रतीक है, जिनकी नाभि से कमल उठता है जिससे ब्रह्मा लोकों की रचना करते हैं।

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