त्वमेव माता च पिता त्वमेव
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✦ अर्थ
त्वमेव माता च पिता त्वमेव संपूर्ण समर्पण (शरणागति) की एक छोटी और प्रिय प्रार्थना है, जिसमें भगवान को अपनी माता, पिता, मित्र, विद्या, धन और सर्वस्व घोषित किया जाता है। इसे संपूर्ण विश्वास और भक्ति जगाने तथा यह भाव दृढ़ करने के लिए पढ़ा जाता है कि दिव्य ही एकमात्र आश्रय है। यह सार्वभौमिक है, अपने इष्ट देवता को समर्पित।
उत्पत्ति और कथा
Traditional Sanskrit prayer · Traditional · Classical
यह एक ही श्लोक हिंदू जगत में सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली प्रार्थनाओं में से एक है — चार पंक्तियों में समर्पण का संपूर्ण भाव। भगवान को माता, पिता, मित्र, बंधु, विद्या, धन और सर्वस्व घोषित करके भक्त हर छोटे आश्रय को त्यागकर केवल दिव्य में स्थित होता है। बच्चे के लिए सरल और ऋषि के लिए गहन, यह भारत भर में असंख्य पूजाओं और आरतियों का समापन करता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
इसकी शक्ति इसकी सरलता में है: भाव से 'तुम ही मेरा सर्वस्व हो' कहना ही निर्भरता और भय का हर बोझ उतार देना है, और कई लोग जीवन के सबसे कठिन क्षणों में इसे पढ़ते हैं ताकि उस एक की उपस्थिति का अनुभव कर सकें जो एक साथ माता, पिता और मित्र है।
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त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।
Tvameva mata cha pita tvameva Tvameva bandhushcha sakha tvameva
अर्थ:तुम ही मेरी माता हो, और तुम ही मेरे पिता; तुम ही मेरे बंधु, और तुम ही मेरे सखा।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देव देव ॥
Tvameva vidya dravinam tvameva Tvameva sarvam mama deva deva
अर्थ:तुम ही विद्या हो, और तुम ही मेरा धन; तुम ही मेरा सर्वस्व हो, हे देवों के देव।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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त्वमेव माता च पिता त्वमेव पाठ के लाभ
संपूर्ण समर्पण (शरणागति) की एक छोटी और प्रिय प्रार्थना, जिसमें भगवान को अपनी माता, पिता, मित्र, विद्या, धन और सर्वस्व घोषित किया जाता है।
संपूर्ण विश्वास और भक्ति जगाने तथा इस भाव में हृदय को स्थिर करने के लिए पढ़ी जाती है कि दिव्य ही एकमात्र आश्रय है।
शांति, विनम्रता और रक्षा प्रदान करने वाली मानी जाती है, अकेलेपन या असहाय होने के भाव को मिटाती है।
प्रायः पूजा और आरती के अंत में, भोजन से पूर्व, यात्रा के आरंभ में पढ़ी जाती है, और बच्चों को पहली प्रार्थना के रूप में सिखाई जाती है।
भाव में सार्वभौमिक — अपने इष्ट देवता को संबोधित, प्रायः विष्णु, कृष्ण या गुरु को।
त्वमेव माता च पिता त्वमेव जप विधि
इस श्लोक को हाथ जोड़कर और संपूर्ण समर्पण के भाव से पढ़ें, अपने आप को और अपनी सभी चिंताओं को भगवान को माता, पिता, मित्र और सर्वस्व के रूप में अर्पित करते हुए। यह प्रायः पूजा या आरती के अंत में पढ़ा जाता है, और कंठस्थ करने तथा बच्चों को सिखाने के लिए एक सरल, शक्तिशाली प्रार्थना है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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