अपवित्रः पवित्रो वा — Word-by-Word Meaning
अपवित्रः पवित्रो वा
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
अपवित्रः
apavitraḥ
अपवित्र, अशुद्ध
पवित्रः
pavitraḥ
पवित्र, शुद्ध
वा
vā
अथवा
सर्व-अवस्थाम्
sarva-avasthām
किसी भी दशा या अवस्था में
गतः
gataḥ
पहुँचा हुआ / स्थित
अपि
api
भी
वा
vā
अथवा
यः
yaḥ
जो कोई
स्मरेत्
smaret
स्मरण करता है / ध्यान करता है
पुण्डरीकाक्षम्
puṇḍarīkākṣam
कमलनयन भगवान (विष्णु)
सः
saḥ
वह, वह व्यक्ति
बाह्य-अभ्यन्तरः
bāhya-abhyantaraḥ
बाहर और भीतर से
शुचिः
śuciḥ
पवित्र, शुद्ध
Complete Translation
मनुष्य चाहे अपवित्र हो या पवित्र, अथवा किसी भी अवस्था को प्राप्त हो — जो भी कमलनयन भगवान (विष्णु) का स्मरण करता है, वह बाहर और भीतर से पवित्र हो जाता है।
Origin & History
Source: Traditional Pavitrikarana mantra (Vaishnava / Puranic ritual tradition; widely cited from Garuda and Padma Purana usage)
Author: Traditional (ancient ritual verse)
Period: Puranic / classical
यह श्लोक लगभग सभी परम्पराओं में हिन्दू अनुष्ठानिक पूजा का सार्वभौमिक प्रारम्भ बन गया। पूजा करने से पूर्व उपासक को पहले पवित्र होना चाहिए, परन्तु केवल बाहरी शुद्धि अधूरी है। यह श्लोक इस समस्या का समाधान यह घोषित करके करता है कि कमलनयन भगवान विष्णु का स्मरण मनुष्य की अवस्था कैसी भी हो, उसे भीतर-बाहर से पूर्ण पवित्रता प्रदान कर देता है। इसी कारण इसे साधारण गृह-पूजा से लेकर विशाल यज्ञों तक अनगिनत समारोहों के आरम्भ में पढ़ा जाता है।
Frequently Asked Questions
अपवित्रः पवित्रो वा मंत्र किस लिए प्रयुक्त होता है?▼
यह पवित्रीकरण मंत्र है — लगभग हर हिन्दू पूजा या अनुष्ठान के आरम्भ में पढ़ा जाने वाला शुद्धिकरण श्लोक। यह पूजा प्रारम्भ होने से पूर्व उपासक, स्थान और सामग्री को पवित्र करता है।
पुण्डरीकाक्ष कौन हैं?▼
पुण्डरीकाक्ष का अर्थ है 'कमल के समान नेत्रों वाले', जो भगवान विष्णु का सुप्रसिद्ध नाम है। यह श्लोक सिखाता है कि उनका मात्र स्मरण मनुष्य को बाहर और भीतर से पूर्णतः पवित्र कर देता है।
पूजा के समय इस मंत्र का प्रयोग कैसे किया जाता है?▼
परम्परा से जल लेकर (प्रायः कुश की एक तीली या पुष्प के साथ) इस श्लोक का पाठ करते हुए उसे अपने ऊपर तथा पूजा-सामग्री पर छिड़का जाता है, जो यह दर्शाता है कि विष्णु के स्मरण से सब पवित्र हो गए हैं।
क्या इसे औपचारिक पूजा के बाहर भी जप सकते हैं?▼
हाँ। कोई भी व्यक्ति जब चाहे इसका पाठ कर सकता है जब वह स्वयं को पवित्र अनुभव करना चाहे — प्रार्थना, अध्ययन या किसी पवित्र कार्य से पूर्व — क्योंकि इसका सार यही है कि भगवान का स्मरण बाहरी परिस्थिति की चिन्ता किए बिना मनुष्य को पवित्र बना देता है।
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