अयि शतखण्डविखण्डित — Word-by-Word Meaning
अयि शतखण्डविखण्डित
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
अयि
Ayi
हे! (देवी को सम्बोधित करता स्नेहपूर्ण वचन)
शतखण्ड
Shatakhanda
सैकड़ों खण्डों में
विखण्डित
Vikhandita
विदीर्ण, टुकड़े-टुकड़े
रुण्ड
Runda
मुण्ड (दैत्य-गजों के कटे धड़)
वितुण्डित
Vitundita
जिनके शुण्ड कट गए
शुण्ड
Shunda
शुण्ड (हाथी की सूँड)
गजाधिपते
Gajadhipate
हे लोकपाल गज-दैत्यों की विजेता
रिपुगजगण्डविदारण
Ripu-gaja-ganda-vidarana
शत्रु हाथियों के गण्डस्थल को चीरने वाली
चण्डपराक्रम
Chanda-parakrama
प्रचण्ड पराक्रम और शौर्य वाली
मृगाधिपते
Mrigadhipate
हे मृगराज (सिंह) पर सवार
निजभुजदण्ड
Nija-bhuja-danda
अपने दण्ड-समान भुजाओं से
निपातित
Nipatita
गिराकर, धराशायी कर
मुण्डभटाधिपते
Munda-bhatadhipate
हे दैत्य-योद्धाओं के अधिपतियों का सिर काटने वाली
जय जय हे
Jaya jaya he
जय, जय हो आपको!
महिषासुरमर्दिनि
Mahishasuramardini
हे महिषासुर (भैंसासुर) का वध करने वाली
रम्यकपर्दिनि
Ramyakapardini
हे सुन्दर केशकलाप वाली देवी
शैलसुते
Shailasute
हे पर्वत की पुत्री (पार्वती)
Complete Translation
हे देवी, जिसने सैकड़ों खण्डों में दैत्य-गजों को विदीर्ण कर उनके शुण्ड काट डाले और मुण्ड छेद डाले; जो शत्रु-गजों के गण्डस्थल को चीरने वाली प्रचण्ड पराक्रमी सिंहवाहिनी है; जिसने अपने भुजदण्डों से दैत्य-योद्धाओं के अधिपतियों को गिराकर उनके सिर काट डाले — जय जय हे महिषासुरमर्दिनि, रम्यकपर्दिनि, शैलसुते!
Origin & History
Source: Mahishasura Mardini Stotram, verse 4 (attributed to Adi Shankaracharya)
Author: Adi Shankaracharya (traditionally)
Period: 8th century CE
यह महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र का चतुर्थ श्लोक है, एक उल्लासमयी दुर्गा स्तुति जिसका जटिल छन्द ब्रह्माण्डीय युद्ध की लय को प्रतिबिम्बित करता है। जहाँ प्रारम्भिक श्लोक देवी को पर्वत-पुत्री रूप में पूजते हैं, वहीं यह श्लोक युद्ध में ही प्रवेश करता है, दुर्गा को सिंह पर आरूढ़, दैत्य-गजों को विदीर्ण करते और दैत्य-सेनाओं के सिर काटते हुए दर्शाता है — देवी माहात्म्य में वर्णित युद्ध का एक सजीव चित्र।
Frequently Asked Questions
महिषासुर मर्दिनी का यह श्लोक किसका वर्णन करता है?▼
यह देवी दुर्गा को प्रचण्ड युद्ध में दर्शाता है — दैत्य-गजों को सैकड़ों खण्डों में विदीर्ण करते, सिंहवाहिनी रूप में शत्रु-हाथियों के गण्डस्थल चीरते, और अपने भुजदण्डों से दैत्य-योद्धाओं के नायकों के सिर काटते हुए — और 'जय जय हे महिषासुरमर्दिनि' इस विजय-टेक से समाप्त होता है।
'अयि शतखण्ड विखण्डित' किस स्तोत्र से है?▼
यह महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र (इसके प्रारम्भ 'अयि गिरि नन्दिनि' से भी प्रसिद्ध) का चतुर्थ श्लोक है, जो परम्परागत रूप से आदि शंकराचार्य को आरोपित है और नवरात्रि में अत्यन्त लोकप्रिय है।
यह श्लोक उच्चारण में इतना कठिन क्यों है?▼
यह अनुप्रास से भरे लम्बे संस्कृत समासों से बना है ('शतखण्ड-विखण्डित-रुण्ड-वितुण्डित-शुण्ड')। यह सघन, लयबद्ध ध्वनि जान-बूझकर है — यह ब्रह्माण्डीय युद्ध की गति और कोलाहल को प्रतिबिम्बित करती है और गाने पर श्लोक को उसकी रोमांचक गति देती है।
मुझे इसका पाठ कब करना चाहिए?▼
यह दुर्गा पूजा में, विशेषकर नवरात्रि की अष्टमी और नवमी को, तथा किसी भी समय जब साहस, रक्षा और कठिनाइयों पर विजय की शक्ति चाहिए, पाठ किया जाता है।
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