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अयि शतखण्डविखण्डित

🕉️ hindu·📿 3× जप·🕐 नवरात्रि के दौरान, विशेषकर अष्टमी और नवमी को, अथवा जब भी साहस और रक्षा की आवश्यकता हो·📜 Mahishasura Mardini Stotram, verse 4 (attributed to Adi Shankaracharya)

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अर्थ

यह महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र (अयि गिरि नन्दिनि) का चतुर्थ श्लोक है, जो आदि शंकराचार्य को आरोपित है। प्रवाहमयी अनुप्रास के साथ यह दुर्गा को युद्ध के मध्य में दिखाता है — दैत्य-गजों को विदीर्ण करते, उनके गण्डस्थल चीरते और अपने भुजदण्डों से दैत्य-नायकों के सिर काटते हुए — फिर प्रसिद्ध टेक 'जय जय हे महिषासुरमर्दिनि' में मुखरित होता है। यह स्तोत्र के सबसे ओजस्वी, द्रुतगति श्लोकों में से एक है।

उत्पत्ति और कथा

Mahishasura Mardini Stotram, verse 4 (attributed to Adi Shankaracharya) · Adi Shankaracharya (traditionally) · 8th century CE

यह महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र का चतुर्थ श्लोक है, एक उल्लासमयी दुर्गा स्तुति जिसका जटिल छन्द ब्रह्माण्डीय युद्ध की लय को प्रतिबिम्बित करता है। जहाँ प्रारम्भिक श्लोक देवी को पर्वत-पुत्री रूप में पूजते हैं, वहीं यह श्लोक युद्ध में ही प्रवेश करता है, दुर्गा को सिंह पर आरूढ़, दैत्य-गजों को विदीर्ण करते और दैत्य-सेनाओं के सिर काटते हुए दर्शाता है — देवी माहात्म्य में वर्णित युद्ध का एक सजीव चित्र।

शास्त्रों में वर्णित

देवी माहात्म्य बताता है कि महिषासुर, जिसे यह वरदान था कि कोई पुरुष उसका वध नहीं कर सकता, ने स्वर्ग पर विजय प्राप्त की, और देवताओं ने अपनी संयुक्त ऊर्जाएँ दुर्गा में उँडेल दीं। उसने नौ रातों (नवरात्रि) तक दैत्य-सेनाओं से युद्ध किया और दसवें दिन रूप-परिवर्तनकारी भैंसासुर को अपने पैर से दबाकर त्रिशूल से उसका हृदय बेध दिया, तब देवताओं ने पुष्प-वर्षा की। यह श्लोक उस युद्ध में उनके अजेय शौर्य का उत्सव मनाता है।

मंत्र

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अयि शतखण्डविखण्डितरुण्डवितुण्डितशुण्डगजाधिपते रिपुगजगण्डविदारणचण्डपराक्रमशुण्ड मृगाधिपते निजभुजदण्डनिपातितखण्डविपातितमुण्डभटाधिपते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते

Ayi shatakhandavikhanditarundavitunditashundagajadhipate Ripugajagandavidaranachandaparakramashunda mrigadhipate Nijabhujadandanipatitakhandavipatitamundabhatadhipate Jaya jaya he mahishasuramardini ramyakapardini shailasute

अर्थ:हे देवी, जिसने सैकड़ों खण्डों में दैत्य-गजों को विदीर्ण कर उनके शुण्ड काट डाले और मुण्ड छेद डाले; जो शत्रु-गजों के गण्डस्थल को चीरने वाली प्रचण्ड पराक्रमी सिंहवाहिनी है; जिसने अपने भुजदण्डों से दैत्य-योद्धाओं के अधिपतियों को गिराकर उनके सिर काट डाले — जय जय हे महिषासुरमर्दिनि, रम्यकपर्दिनि, शैलसुते!

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

अयि🔊Ayiहे! (देवी को सम्बोधित करता स्नेहपूर्ण वचन)
शतखण्ड🔊Shatakhandaसैकड़ों खण्डों में
विखण्डित🔊Vikhanditaविदीर्ण, टुकड़े-टुकड़े
रुण्ड🔊Rundaमुण्ड (दैत्य-गजों के कटे धड़)
वितुण्डित🔊Vitunditaजिनके शुण्ड कट गए
शुण्ड🔊Shundaशुण्ड (हाथी की सूँड)
गजाधिपते🔊Gajadhipateहे लोकपाल गज-दैत्यों की विजेता
रिपुगजगण्डविदारण🔊Ripu-gaja-ganda-vidaranaशत्रु हाथियों के गण्डस्थल को चीरने वाली
चण्डपराक्रम🔊Chanda-parakramaप्रचण्ड पराक्रम और शौर्य वाली
मृगाधिपते🔊Mrigadhipateहे मृगराज (सिंह) पर सवार
निजभुजदण्ड🔊Nija-bhuja-dandaअपने दण्ड-समान भुजाओं से
निपातित🔊Nipatitaगिराकर, धराशायी कर
मुण्डभटाधिपते🔊Munda-bhatadhipateहे दैत्य-योद्धाओं के अधिपतियों का सिर काटने वाली
जय जय हे🔊Jaya jaya heजय, जय हो आपको!
महिषासुरमर्दिनि🔊Mahishasuramardiniहे महिषासुर (भैंसासुर) का वध करने वाली
रम्यकपर्दिनि🔊Ramyakapardiniहे सुन्दर केशकलाप वाली देवी
शैलसुते🔊Shailasuteहे पर्वत की पुत्री (पार्वती)

अयि शतखण्डविखण्डित पाठ के लाभ

महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र का एक शक्तिशाली योद्धा श्लोक, जो दुर्गा के प्रचण्ड युद्ध-शौर्य का आवाहन करता है

साहस, शत्रुओं पर विजय और नकारात्मकता के नाश के लिए पाठ किया जाता है

इसका द्रुत, अनुप्रासयुक्त छन्द एक तीव्र, समाधि-जैसी भक्तिमयी गति उत्पन्न करता है

विशेषतः नवरात्रि में, विशेषकर अष्टमी और नवमी को पाठ किया जाता है

उच्च स्वर में गाना सर्वोत्तम — इसका लय ब्रह्माण्डीय युद्ध की ऊर्जा को वहन करता है

कठिनाई या भय का सामना करने वालों के लिए दुर्गा के रक्षक, दैत्य-नाशक रूप का आवाहन करता है

अयि शतखण्डविखण्डित जप विधि

जप संख्या3बार
उत्तम समयनवरात्रि के दौरान, विशेषकर अष्टमी और नवमी को, अथवा जब भी साहस और रक्षा की आवश्यकता हो

इस श्लोक को मात्र पढ़ने के बजाय गाना सर्वोत्तम है — इसकी शक्ति इसके वेगवान छन्द में निहित है। तीन लम्बी पंक्तियों के माध्यम से चरम टेक 'जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते' तक निर्माण करें। पहले एक रिकॉर्डिंग सुनकर लय सीखें, फिर नवरात्रि की सन्ध्याओं में दुर्गा की प्रतिमा के समक्ष ३ बार पाठ करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यह देवी दुर्गा को प्रचण्ड युद्ध में दर्शाता है — दैत्य-गजों को सैकड़ों खण्डों में विदीर्ण करते, सिंहवाहिनी रूप में शत्रु-हाथियों के गण्डस्थल चीरते, और अपने भुजदण्डों से दैत्य-योद्धाओं के नायकों के सिर काटते हुए — और 'जय जय हे महिषासुरमर्दिनि' इस विजय-टेक से समाप्त होता है।
यह महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र (इसके प्रारम्भ 'अयि गिरि नन्दिनि' से भी प्रसिद्ध) का चतुर्थ श्लोक है, जो परम्परागत रूप से आदि शंकराचार्य को आरोपित है और नवरात्रि में अत्यन्त लोकप्रिय है।
यह अनुप्रास से भरे लम्बे संस्कृत समासों से बना है ('शतखण्ड-विखण्डित-रुण्ड-वितुण्डित-शुण्ड')। यह सघन, लयबद्ध ध्वनि जान-बूझकर है — यह ब्रह्माण्डीय युद्ध की गति और कोलाहल को प्रतिबिम्बित करती है और गाने पर श्लोक को उसकी रोमांचक गति देती है।
यह दुर्गा पूजा में, विशेषकर नवरात्रि की अष्टमी और नवमी को, तथा किसी भी समय जब साहस, रक्षा और कठिनाइयों पर विजय की शक्ति चाहिए, पाठ किया जाता है।

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