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बालात्रिपुरसुन्दरी ध्यान स्तोत्रम् — Word-by-Word Meaning

बालात्रिपुरसुन्दरी ध्यान स्तोत्रम्

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

अरुणकिरणजालैः
aruṇa-kiraṇa-jālaiḥ
with the web of reddish (rosy) rays of light (radiating from her)
रञ्जिताशावकाशा
rañjitāśāvakāśā
who reddens (colours) the whole expanse of the directions and space
विधृतजपवटीका
vidhṛta-japa-vaṭīkā
holding a rosary (japa-mala) for chanting in one hand
पुस्तकाभीतिहस्ता
pustaka-abhīti-hastā
bearing a book in one hand and the gesture of fearlessness (abhaya) in another
इतरकरवराढ्या
itara-kara-varāḍhyā
graced in her remaining hand with the boon-giving gesture (vara-mudra)
फुल्लकह्लारसंस्था
phulla-kahlāra-saṃsthā
seated upon a fully-blossomed white water-lily (kahlara)
निवसतु हृदि
nivasatu hṛdi
may she ever dwell in my heart
बाला
bālā
Bala (the youthful Goddess, the child-form of Tripurasundari)
नित्यकल्याणशीला
nitya-kalyāṇa-śīlā
whose very nature is eternal auspiciousness and welfare
ध्यान
dhyāna
the verse of meditation/visualisation that precedes the worship of Bala
त्रिपुरसुन्दरी
tripurasundarī
the beautiful one of the three worlds — of whom Bala is the youthful aspect
जपवटी / जपमाला
japa-vaṭī / japa-mālā
the rosary, symbol of constant remembrance and mantra-japa
पुस्तक
pustaka
the book — symbol of knowledge and the Vedas/scriptures
अभीति / अभय
abhīti / abhaya
the gesture dispelling fear, assuring the devotee of protection
वर
vara
the boon-granting gesture, bestowing the devotee's desires and grace

Complete Translation

बाला — वह युवती देवी जिनका स्वभाव ही नित्य कल्याणमय है — मेरे हृदय में सदा निवास करें: जो अपनी अरुण किरणों के जाल से समस्त दिशाओं एवं अवकाश को रंजित कर देती हैं, जो अपने हाथों में जपमाला एवं पुस्तक, तथा अभय एवं वर मुद्राएँ धारण करती हैं, और जो पूर्ण विकसित श्वेत कह्लार (कुमुद) पुष्प पर विराजमान हैं।

Origin & History

Source: Traditional Sri Vidya / Shakta dhyana verse (used in Bala upasana and Tantric manuals)

Author: Traditional (anonymous, within the Sri Vidya tradition)

Period: Classical / Medieval

श्रीविद्या परम्परा में प्रत्येक देवता की पूजा एक ध्यान-श्लोक से आरम्भ होती है — एक श्लोक जो देवता के स्वरूप को चित्रित करता है ताकि उपासक उसे हृदय में धारण कर सके। यह श्लोक, 'अरुण-किरण-जालैः', ललिता के नवयौवना रूप बालात्रिपुरसुन्दरी का प्रतिष्ठित ध्यान है। बाला अक्सर श्रीविद्या दीक्षित को दिया जाने वाला प्रथम मन्त्र एवं रूप हैं; सौम्य एवं शीघ्र कृपा करने वाली, वे जपमाला एवं ज्ञान की पुस्तक धारण करती हैं और अभय एवं वर मुद्राएँ दिखाती हैं। यह श्लोक तान्त्रिक पूजा-पद्धतियों में सुरक्षित है और समस्त परम्परा में बाला के जप एवं पूजा के आरम्भ में पढ़ा जाता है।

Frequently Asked Questions

बालात्रिपुरसुन्दरी कौन हैं?
बाला ('बालिका'), जिन्हें बालाम्बिका भी कहते हैं, परम देवी ललिता त्रिपुरसुन्दरी का नवयौवना बाल-रूप हैं। श्रीविद्या परम्परा में वे अक्सर दीक्षितों को दी जाने वाली प्रथम देवता हैं, जो सौम्य, कृपालु एवं शीघ्र आशीर्वाद देने वाली मानी जाती हैं। उन्हें अरुण-वर्णा, हाथों में जपमाला एवं पुस्तक तथा रक्षा एवं वरदान की मुद्राओं सहित ध्यान किया जाता है।
यह श्लोक क्या है?
यह बालात्रिपुरसुन्दरी का ध्यान-श्लोक — ध्यान एवं विज़ुअलाइज़ेशन का श्लोक — है, जो 'अरुण-किरण-जालैः' से आरम्भ होता है। यह बाला के जप एवं पूजा से पूर्व देवी की मूर्ति को हृदय में चित्रित करने हेतु पढ़ा जाने वाला मानक श्लोक है, और सर्वाधिक प्रयुक्त बाला श्लोकों में से एक है।
इसका जप कब करना चाहिए?
इसका जप बाला की पूजा या जप के आरम्भ में उनके स्वरूप को मन में स्थिर करने हेतु किया जाता है। भक्त इसे प्रतिदिन प्रातः, शुक्रवार एवं मंगलवार को, और विशेषतः देवी के पर्व नवरात्रि में पढ़ते हैं।
जपमाला, पुस्तक एवं मुद्राओं का क्या अर्थ है?
जपमाला मन्त्र एवं निरन्तर स्मरण की सूचक है; पुस्तक ज्ञान एवं शास्त्रों की सूचक है; अभय मुद्रा निर्भयता एवं रक्षा प्रदान करती है; और वर मुद्रा वरदान देती है। मिलकर ये बाला को ज्ञान, निर्भयता एवं प्रत्येक आशीर्वाद की दात्री के रूप में दर्शाती हैं।

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