बालात्रिपुरसुन्दरी ध्यान स्तोत्रम्
अन्य नाम / खोज: bala tripurasundari stotram · bala tripurasundari dhyanam · bala dhyana shloka · aruna kirana jalaih · balambika stotram
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✦ अर्थ
यह बालात्रिपुरसुन्दरी का प्रसिद्ध ध्यान-श्लोक है — 'बाला', परम देवी ललिता त्रिपुरसुन्दरी का नवयौवना (नौ वर्षीय) रूप तथा श्रीविद्या परम्परा की प्रमुख देवी हैं। यह श्लोक उन्हें अरुण-वर्णा, लाल किरणें बिखेरती हुई, हाथों में जपमाला एवं पुस्तक तथा अभय एवं वर मुद्राएँ धारण किए, विकसित श्वेत कमल पर विराजमान रूप में चित्रित करता है। इसे बाला की पूजा एवं जप के आरम्भ में पढ़ा जाता है, जिससे उपासक देवी की मूर्ति को हृदय में स्थापित कर सके, और यह 'नित्यकल्याणशीला बाला मेरे हृदय में निवास करें' की प्रार्थना से समाप्त होता है।
उत्पत्ति और कथा
Traditional Sri Vidya / Shakta dhyana verse (used in Bala upasana and Tantric manuals) · Traditional (anonymous, within the Sri Vidya tradition) · Classical / Medieval
श्रीविद्या परम्परा में प्रत्येक देवता की पूजा एक ध्यान-श्लोक से आरम्भ होती है — एक श्लोक जो देवता के स्वरूप को चित्रित करता है ताकि उपासक उसे हृदय में धारण कर सके। यह श्लोक, 'अरुण-किरण-जालैः', ललिता के नवयौवना रूप बालात्रिपुरसुन्दरी का प्रतिष्ठित ध्यान है। बाला अक्सर श्रीविद्या दीक्षित को दिया जाने वाला प्रथम मन्त्र एवं रूप हैं; सौम्य एवं शीघ्र कृपा करने वाली, वे जपमाला एवं ज्ञान की पुस्तक धारण करती हैं और अभय एवं वर मुद्राएँ दिखाती हैं। यह श्लोक तान्त्रिक पूजा-पद्धतियों में सुरक्षित है और समस्त परम्परा में बाला के जप एवं पूजा के आरम्भ में पढ़ा जाता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
परम्परा से माना जाता है कि बाल-देवी बाला सच्ची एवं सरल भक्ति का उत्तर विशेष रूप से शीघ्र देती हैं — कि जो विद्यार्थी इस ध्यान द्वारा उन्हें हृदय में स्थापित करते हैं वे स्पष्टता एवं वाणी प्राप्त करते हैं, और उनकी अभय-मुद्रा उपासक को भय से बचाती है, क्योंकि वे 'नित्य-कल्याण-शीला' हैं, जिनका स्वभाव ही निरन्तर कल्याणमय है।
मंत्र
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अरुणकिरणजालैः रञ्जिताशावकाशा विधृतजपवटीका पुस्तकाभीतिहस्ता । इतरकरवराढ्या फुल्लकह्लारसंस्था निवसतु हृदि बाला नित्यकल्याणशीला ॥
aruṇa-kiraṇa-jālaiḥ rañjitāśāvakāśā vidhṛta-japa-vaṭīkā pustakābhīti-hastā | itara-kara-varāḍhyā phulla-kahlāra-saṃsthā nivasatu hṛdi bālā nitya-kalyāṇa-śīlā ||
अर्थ:बाला — वह युवती देवी जिनका स्वभाव ही नित्य कल्याणमय है — मेरे हृदय में सदा निवास करें: जो अपनी अरुण किरणों के जाल से समस्त दिशाओं एवं अवकाश को रंजित कर देती हैं, जो अपने हाथों में जपमाला एवं पुस्तक, तथा अभय एवं वर मुद्राएँ धारण करती हैं, और जो पूर्ण विकसित श्वेत कह्लार (कुमुद) पुष्प पर विराजमान हैं।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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बालात्रिपुरसुन्दरी ध्यान स्तोत्रम् पाठ के लाभ
जप या पूजा से पूर्व बालात्रिपुरसुन्दरी को हृदय में स्थापित करने का आवश्यक ध्यान (ध्यान) श्लोक
बाला का आवाहन करता है, जो ललिता त्रिपुरसुन्दरी का नवयौवना रूप एवं श्रीविद्या की प्रिय देवी हैं, विशेषतः नवदीक्षितों के लिए
उनकी जपमाला एवं पुस्तक भक्त को मन्त्र-शक्ति, ज्ञान एवं विद्या का आशीर्वाद देती हैं
उनकी अभय (निर्भयता) एवं वर (वरदान) मुद्राएँ रक्षा एवं मनोकामना-पूर्ति का वचन देती हैं
'नित्य-कल्याण-शीला' — सदा कल्याणमय स्वभाव वाली — के रूप में वर्णित, निरन्तर कल्याण का आवाहन करती हैं
छोटा एवं कण्ठस्थ करने में सरल, दैनिक स्मरण तथा पूजा से पूर्व मन को स्थिर करने के लिए आदर्श
बाला परम्परागत रूप से बालकों, विद्यार्थियों एवं सच्चे आरम्भकों को शीघ्र आशीर्वाद देने वाली मानी जाती हैं
बालात्रिपुरसुन्दरी ध्यान स्तोत्रम् जप विधि
यह ध्यान-श्लोक पूजा के आरम्भ में देवी का दर्शन करने हेतु पढ़ा जाता है। पूर्व की ओर मुख कर बैठें, और जप करते हुए उनकी मूर्ति को हृदय में ठीक वैसे ही गढ़ें जैसा वर्णित है — अवकाश को भरती अरुण आभा, हाथों में जपमाला एवं पुस्तक, निर्भयता एवं वरदान की मुद्राएँ, श्वेत कमल पर विराजमान। मन को स्थिर करने हेतु इसे तीन या नौ बार पढ़ें, फिर बाला मन्त्र के जप या विधिवत पूजा की ओर बढ़ें, अन्त में यह प्रार्थना करते हुए कि वे आपके हृदय में निवास करें।