त्रिपुरसुन्दरी स्तोत्रम्
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✦ अर्थ
त्रिपुरसुन्दरी स्तोत्रम् त्रिपुरसुन्दरी (ललिता) की द्वादश-श्लोकी स्तुति है — तीनों लोकों की परम सुन्दरी, जो गणेश, ग्रह, नक्षत्र व योगिनियों का स्वरूप हैं। वे श्रीविद्या परम्परा की दिव्य माता हैं। श्रद्धा से इसका पाठ करने से देवी की कृपा प्राप्त होती है।
उत्पत्ति और कथा
Traditional · Traditional · Classical
त्रिपुरसुन्दरी स्तोत्रम् एक प्रिय परंपरागत स्तोत्र है। यह त्रिपुरसुन्दरी (ललिता) की द्वादश-श्लोकी स्तुति है — तीनों लोकों की परम सुन्दरी, जो गणेश, ग्रह, नक्षत्र व योगिनियों का स्वरूप हैं — श्रीविद्या परम्परा की दिव्य माता।
✦ शास्त्रों में वर्णित
कहा जाता है कि शुद्ध और भक्तिपूर्ण हृदय से त्रिपुरसुन्दरी स्तोत्रम् का पाठ करना उस दिव्य कृपा के निकट पहुँचना है, जो प्रेम से उसे पुकारने वालों को कभी नहीं त्यागती।
मंत्र
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गणेशग्रहनक्षत्रयोगिनीराशिरूपिणीम् । देवीं मन्त्रमयीं नौमि मातृकापीठरूपिणीम् ॥ १॥ प्रणमामि महादेवीं मातृकां परमेश्वरीम् । कालहृल्लोहलोल्लोहकलानाशनकारिणीम् ॥ २॥ यदक्षरैकमात्रेऽपि संसिद्धे स्पर्द्धते नरः । रविताक्ष्येन्दुकन्दर्पैः शङ्करानलविष्णुभिः ॥ ३॥ यदक्षरशशिज्योत्स्नामण्डितं भुवनत्रयम् । वन्दे सर्वेश्वरीं देवीं महाश्रीसिद्धमातृकाम् ॥ ४॥ यदक्षरमहासूत्रप्रोतमेतज्जगत्त्रयम् । ब्रह्माण्डादिकटाहान्तं तां वन्दे सिद्धमातृकाम् ॥ ५॥ यदेकादशमाधारं बीजं कोणत्रयोद्भवम् । ब्रह्माण्डादिकटाहान्तं जगदद्यापि दृश्यते ॥ ६॥ अकचादिटतोन्नद्धपयशाक्षरवर्गिणीम् । ज्येष्ठाङ्गबाहुहृत्कण्ठकटिपादनिवासिनीम् ॥ ७॥ नौमीकाराक्षरोद्धारां सारात्सारां परात्पराम् । प्रणमामि महादेवीं परमानन्दरूपिणीम् ॥ ८॥ अथापि यस्या जानन्ति न मनागपि देवताः । केयं कस्मात्क्व केनेति सरूपारूपभावनाम् ॥ ९॥ वन्दे तामहमक्षय्यां क्षकाराक्षररूपिणीम् । देवीं कुलकलोल्लोलप्रोल्लसन्तीं शिवां पराम् ॥ १०॥ वर्गानुक्रमयोगेन यस्याख्योमाष्टकं स्थितम् । वन्दे तामष्टवर्गोत्थमहासिद्ध्यादिकेश्वरीम् ॥ ११॥ कामपूर्णजकाराख्यसुपीठान्तर्न्निवासिनीम् । चतुराज्ञाकोशभूतां नौमि श्रीत्रिपुरामहम् ॥ १२॥ इति द्वादशभी श्लोकैः स्तवनं सर्वसिद्धिकृत् । देव्यास्त्वखण्डरूपायाः स्तवनं तव तद्यतः ॥ १३॥ इति त्रिपुरसुन्दर्याद्वादशश्लोकीस्तुतिः समाप्ता ।
gaṇeśagrahanakṣatrayoginīrāśirūpiṇīm | devīṃ mantramayīṃ naumi mātṛkāpīṭharūpiṇīm || 1|| praṇamāmi mahādevīṃ mātṛkāṃ parameśvarīm | kālahṛllohalollohakalānāśanakāriṇīm || 2|| yadakṣaraikamātre'pi saṃsiddhe sparddhate naraḥ | ravitākṣyendukandarpaiḥ śaṅkarānalaviṣṇubhiḥ || 3|| yadakṣaraśaśijyotsnāmaṇḍitaṃ bhuvanatrayam | vande sarveśvarīṃ devīṃ mahāśrīsiddhamātṛkām || 4|| yadakṣaramahāsūtraprotametajjagattrayam | brahmāṇḍādikaṭāhāntaṃ tāṃ vande siddhamātṛkām || 5|| yadekādaśamādhāraṃ bījaṃ koṇatrayodbhavam | brahmāṇḍādikaṭāhāntaṃ jagadadyāpi dṛśyate || 6|| akacādiṭatonnaddhapayaśākṣaravargiṇīm | jyeṣṭhāṅgabāhuhṛtkaṇṭhakaṭipādanivāsinīm || 7|| naumīkārākṣaroddhārāṃ sārātsārāṃ parātparām | praṇamāmi mahādevīṃ paramānandarūpiṇīm || 8|| athāpi yasyā jānanti na manāgapi devatāḥ | keyaṃ kasmātkva keneti sarūpārūpabhāvanām || 9|| vande tāmahamakṣayyāṃ kṣakārākṣararūpiṇīm | devīṃ kulakalollolaprollasantīṃ śivāṃ parām || 10|| vargānukramayogena yasyākhyomāṣṭakaṃ sthitam | vande tāmaṣṭavargotthamahāsiddhyādikeśvarīm || 11|| kāmapūrṇajakārākhyasupīṭhāntarnnivāsinīm | caturājñākośabhūtāṃ naumi śrītripurāmaham || 12|| iti dvādaśabhī ślokaiḥ stavanaṃ sarvasiddhikṛt | devyāstvakhaṇḍarūpāyāḥ stavanaṃ tava tadyataḥ || 13|| iti tripurasundaryādvādaśaślokīstutiḥ samāptā |
अर्थ:त्रिपुरसुन्दरी (ललिता) की द्वादश-श्लोकी स्तुति — तीनों लोकों की परम सुन्दरी, जो गणेश, ग्रह, नक्षत्र व योगिनियों का स्वरूप हैं — श्रीविद्या परम्परा की दिव्य माता।
त्रिपुरसुन्दरी स्तोत्रम् पाठ के लाभ
त्रिपुरसुन्दरी स्तोत्रम् के पाठ से देवी की कृपा, आशीर्वाद और रक्षा प्राप्त होती है, ऐसा माना जाता है।
भक्ति बढ़ाता है, मन को शांत करता है और हृदय को देवी के स्मरण में स्थिर करता है।
शुक्रवार को तथा नवरात्रि में सर्वाधिक शुभ है।
एक अनमोल संस्कृत स्तोत्र, श्रद्धा से नित्य पाठ हेतु उपयुक्त।
त्रिपुरसुन्दरी स्तोत्रम् जप विधि
स्नान करके देवी की प्रतिमा के सम्मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। दीप जलाकर त्रिपुरसुन्दरी स्तोत्रम् का धीरे-धीरे और भक्तिभाव से पाठ करें। इसका पाठ प्रतिदिन, अथवा विशेषकर शुक्रवार को तथा नवरात्रि में किया जा सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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