ब्रह्मज्ञानावलीमाला — Complete Lyrics
ब्रह्मज्ञानावलीमाला
Sanskrit text with English transliteration and translation
Verse 1
असङ्गोऽहमसङ्गोऽहमसङ्गोऽहं पुनः पुनः।
सच्चिदानन्दरूपोऽहमहमेवाहमव्ययः॥१॥
asaṅgo'ham asaṅgo'ham asaṅgo'haṃ punaḥ punaḥ |
sac-cid-ānanda-rūpo'ham aham evāham avyayaḥ ||1||
मैं असंग हूँ, मैं असंग हूँ, मैं असंग हूँ — बार-बार (यही सत्य है); मैं सच्चिदानन्दस्वरूप हूँ, मैं ही मैं हूँ, अव्यय हूँ।
Verse 2
नित्यशुद्धविमुक्तोऽहं निराकारोऽहमव्ययः।
भूमानन्दस्वरूपोऽहमहमेवाहमव्ययः॥२॥
nitya-śuddha-vimukto'haṃ nirākāro'ham avyayaḥ |
bhūmānanda-svarūpo'ham aham evāham avyayaḥ ||2||
मैं नित्य, शुद्ध और विमुक्त हूँ, निराकार और अव्यय हूँ; मैं भूमानन्दस्वरूप हूँ, मैं ही मैं हूँ, अव्यय हूँ।
Verse 3
नित्योऽहं निरवद्योऽहं निराकारोऽहमुच्यते।
परमानन्दरूपोऽहमहमेवाहमव्ययः॥३॥
nityo'haṃ niravadyo'haṃ nirākāro'ham ucyate |
paramānanda-rūpo'ham aham evāham avyayaḥ ||3||
मैं नित्य हूँ, निर्दोष हूँ, निराकार कहा जाता हूँ; मैं परमानन्दस्वरूप हूँ, मैं ही मैं हूँ, अव्यय हूँ।
Verse 4
शुद्धचैतन्यरूपोऽहमात्मारामोऽहमेव च।
अखण्डानन्दरूपोऽहमहमेवाहमव्ययः॥४॥
śuddha-caitanya-rūpo'ham ātmārāmo'ham eva ca |
akhaṇḍānanda-rūpo'ham aham evāham avyayaḥ ||4||
मैं शुद्ध चैतन्यस्वरूप हूँ, आत्माराम हूँ; मैं अखण्डानन्दस्वरूप हूँ, मैं ही मैं हूँ, अव्यय हूँ।
Verse 5
प्रत्यक्चैतन्यरूपोऽहं शान्तोऽहं प्रकृतेः परः।
शाश्वतानन्दरूपोऽहमहमेवाहमव्ययः॥५॥
pratyak-caitanya-rūpo'haṃ śānto'haṃ prakṛteḥ paraḥ |
śāśvatānanda-rūpo'ham aham evāham avyayaḥ ||5||
मैं प्रत्यक्-चैतन्यस्वरूप हूँ, शान्त हूँ, प्रकृति से परे हूँ; मैं शाश्वतानन्दस्वरूप हूँ, मैं ही मैं हूँ, अव्यय हूँ।
Verse 6
तत्त्वातीतः परात्माहं मध्यातीतः परः शिवः।
मायातीतः परंज्योतिरहमेवाहमव्ययः॥६॥
tattvātītaḥ parātmāhaṃ madhyātītaḥ paraḥ śivaḥ |
māyātītaḥ paraṃ-jyotir aham evāham avyayaḥ ||6||
मैं तत्त्वों से अतीत परमात्मा हूँ, मध्य से परे परम शिव हूँ; मायातीत परंज्योति हूँ, मैं ही मैं हूँ, अव्यय हूँ।
Verse 7
नानारूपव्यतीतोऽहं चिदाकारोऽहमच्युतः।
सुखरूपस्वरूपोऽहमहमेवाहमव्ययः॥७॥
nānā-rūpa-vyatīto'haṃ cid-ākāro'ham acyutaḥ |
sukha-rūpa-svarūpo'ham aham evāham avyayaḥ ||7||
मैं नाना रूपों से अतीत हूँ, चिदाकार और अच्युत हूँ; मैं सुखस्वरूप हूँ, मैं ही मैं हूँ, अव्यय हूँ।
Verse 8
मायातत्कार्यदेहादि मम नास्त्येव सर्वदा।
स्वप्रकाशैकरूपोऽहमहमेवाहमव्ययः॥८॥
māyā-tat-kārya-dehādi mama nāsty eva sarvadā |
sva-prakāśaika-rūpo'ham aham evāham avyayaḥ ||8||
माया और उसके कार्य — देह आदि — सदा मुझमें हैं ही नहीं; मैं स्वप्रकाश एकरूप हूँ, मैं ही मैं हूँ, अव्यय हूँ।
Verse 9
गुणत्रयव्यतीतोऽहं ब्रह्मादीनां च साक्ष्यहम्।
अनन्तानन्दरूपोऽहमहमेवाहमव्ययः॥९॥
guṇa-traya-vyatīto'haṃ brahmādīnāṃ ca sākṣy aham |
anantānanda-rūpo'ham aham evāham avyayaḥ ||9||
मैं तीनों गुणों से अतीत हूँ, ब्रह्मा आदि का साक्षी हूँ; मैं अनन्तानन्दस्वरूप हूँ, मैं ही मैं हूँ, अव्यय हूँ।
Verse 10
अन्तर्यामिस्वरूपोऽहं कूटस्थः सर्वगोऽस्म्यहम्।
परमात्मस्वरूपोऽहमहमेवाहमव्ययः॥१०॥
antaryāmi-svarūpo'haṃ kūṭasthaḥ sarvago'smy aham |
paramātma-svarūpo'ham aham evāham avyayaḥ ||10||
मैं अन्तर्यामीस्वरूप हूँ, कूटस्थ और सर्वगत हूँ; मैं परमात्मस्वरूप हूँ, मैं ही मैं हूँ, अव्यय हूँ।
Verse 11
निष्कलोऽहं निष्क्रियोऽहं सर्वात्माद्यः सनातनः।
अपरोक्षस्वरूपोऽहमहमेवाहमव्ययः॥११॥
niṣkalo'haṃ niṣkriyo'haṃ sarvātmādyaḥ sanātanaḥ |
aparokṣa-svarūpo'ham aham evāham avyayaḥ ||11||
मैं निष्कल हूँ, निष्क्रिय हूँ, सबका आत्मा, आदि और सनातन हूँ; मैं अपरोक्षस्वरूप हूँ, मैं ही मैं हूँ, अव्यय हूँ।
Verse 12
द्वन्द्वादिसाक्षिरूपोऽहमचलोऽहं सनातनः।
सर्वसाक्षिस्वरूपोऽहमहमेवाहमव्ययः॥१२॥
dvandvādi-sākṣi-rūpo'ham acalo'haṃ sanātanaḥ |
sarva-sākṣi-svarūpo'ham aham evāham avyayaḥ ||12||
मैं द्वन्द्वादि का साक्षीस्वरूप हूँ, अचल और सनातन हूँ; मैं सर्वसाक्षीस्वरूप हूँ, मैं ही मैं हूँ, अव्यय हूँ।
Verse 13
प्रज्ञानघन एवाहं विज्ञानघन एव च।
अकर्ताहमभोक्ताहमहमेवाहमव्ययः॥१३॥
prajñāna-ghana evāhaṃ vijñāna-ghana eva ca |
akartāham abhoktāham aham evāham avyayaḥ ||13||
मैं प्रज्ञानघन ही हूँ और विज्ञानघन भी हूँ; मैं अकर्ता और अभोक्ता हूँ, मैं ही मैं हूँ, अव्यय हूँ।
Verse 14
निराधारस्वरूपोऽहं सर्वाधारोऽहमेव च।
आप्तकामस्वरूपोऽहमहमेवाहमव्ययः॥१४॥
nirādhāra-svarūpo'haṃ sarvādhāro'ham eva ca |
āpta-kāma-svarūpo'ham aham evāham avyayaḥ ||14||
मैं निराधारस्वरूप हूँ, और सबका आधार भी हूँ; मैं आप्तकामस्वरूप हूँ, मैं ही मैं हूँ, अव्यय हूँ।
Verse 15
तापत्रयविनिर्मुक्तो देहत्रयविलक्षणः।
अवस्थात्रयसाक्ष्यस्मि चाहमेवाहमव्ययः॥१५॥
tāpa-traya-vinirmukto deha-traya-vilakṣaṇaḥ |
avasthā-traya-sākṣy asmi cāham evāham avyayaḥ ||15||
मैं तापत्रय से विमुक्त, देहत्रय से विलक्षण, और अवस्थात्रय का साक्षी हूँ, मैं ही मैं हूँ, अव्यय हूँ।
Verse 16
दृग्दृश्यौ द्वौ पदार्थौ स्तः परस्परविलक्षणौ।
दृग्ब्रह्म दृश्यं मायेति सर्ववेदान्तडिण्डिमः॥१६॥
dṛg-dṛśyau dvau padārthau staḥ paraspara-vilakṣaṇau |
dṛg-brahma dṛśyaṃ māyeti sarva-vedānta-ḍiṇḍimaḥ ||16||
दृक् और दृश्य — ये दो पदार्थ परस्पर विलक्षण हैं; दृक् ब्रह्म है और दृश्य माया है — यही समस्त वेदान्त की डिंडिम-घोषणा है।
Verse 17
अहं साक्षीति यो विद्याद्विविच्यैवं पुनः पुनः।
स एव मुक्तः सो विद्वानिति वेदान्तडिण्डिमः॥१७॥
ahaṃ sākṣīti yo vidyād vivicyaivaṃ punaḥ punaḥ |
sa eva muktaḥ so vidvān iti vedānta-ḍiṇḍimaḥ ||17||
जो इस प्रकार बार-बार विवेक करके 'मैं साक्षी हूँ' ऐसा जान लेता है, वही मुक्त है, वही विद्वान् है — यही वेदान्त की घोषणा है।
Verse 18
घटकुड्यादिकं सर्वं मृत्तिकामात्रमेव च।
तद्वद्ब्रह्म जगत्सर्वमिति वेदान्तडिण्डिमः॥१८॥
ghaṭa-kuḍyādikaṃ sarvaṃ mṛttikā-mātram eva ca |
tadvad brahma jagat sarvam iti vedānta-ḍiṇḍimaḥ ||18||
जैसे घट, भित्ति आदि सब मृत्तिका मात्र हैं, वैसे ही यह सम्पूर्ण जगत् ब्रह्म ही है — यही वेदान्त की घोषणा है।
Verse 19
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः।
अनेन वेद्यं सच्छास्त्रमिति वेदान्तडिण्डिमः॥१९॥
brahma satyaṃ jagan mithyā jīvo brahmaiva nāparaḥ |
anena vedyaṃ sac-chāstram iti vedānta-ḍiṇḍimaḥ ||19||
ब्रह्म सत्य है, जगत् मिथ्या है, और जीव ब्रह्म ही है, अन्य नहीं; यही सच्छास्त्र का ज्ञातव्य है — यही वेदान्त की घोषणा है।
Verse 20
अन्तर्ज्योतिर्बहिर्ज्योतिः प्रत्यग्ज्योतिः परात्परः।
ज्योतिर्ज्योतिः स्वयंज्योतिरात्मज्योतिः शिवोऽस्म्यहम्॥२०॥
antar-jyotir bahir-jyotiḥ pratyag-jyotiḥ parāt-paraḥ |
jyotir-jyotiḥ svayaṃ-jyotir ātma-jyotiḥ śivo'smy aham ||20||
अन्तर्ज्योति, बहिर्ज्योति, प्रत्यग्ज्योति, परात्पर; ज्योतियों की ज्योति, स्वयंज्योति, आत्मज्योति — वह शिव मैं ही हूँ।
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