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धन्वन्तरि स्तोत्रम् — Word-by-Word Meaning

धन्वन्तरि स्तोत्रम्

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

शङ्खं
Shankham
शंख (एक हाथ में धारण किया हुआ)
चक्रं
Chakram
चक्र (सुदर्शन चक्र)
जलौकां
Jalaukam
जलौका — जोंक (आयुर्वेदिक रक्तमोक्षण चिकित्सा में प्रयुक्त)
अमृतघटं
Amrita-Ghatam
अमृत का घट / कलश (अमरत्व का अमृत-कलश)
दधत्
Dadhat
धारण करते हुए
चारुदोर्भिः चतुर्भिः
Charu-Dorbhih Chaturbhih
चार सुन्दर भुजाओं के साथ
अंशुक
Amshuka
सूक्ष्म वस्त्र / देदीप्यमान आवरण
परिविलसत्
Parivilasat
चारों ओर भव्यता से शोभायमान
मौलिम्
Maulim
मुकुटयुक्त मस्तक
अम्भोजनेत्रम्
Ambhoja-Netram
कमल के समान नेत्रों वाले
कालाम्भोद
Kalambhoda
श्याम मेघ के समान
उज्ज्वलाङ्गं
Ujjvalangam
देदीप्यमान, उज्ज्वल शरीर वाले
कटितट
Kati-Tata
कटि / नितम्ब के चारों ओर
चारुपीताम्बराढ्यं
Charu-Pitambar-Adhyam
सुन्दर पीताम्बर से सुशोभित
वन्दे
Vande
मैं प्रणाम करता हूँ, वन्दना करता हूँ
धन्वन्तरिं
Dhanvantarim
भगवान धन्वन्तरि को (दिव्य वैद्य)
निखिलगद
Nikhila-Gada
समस्त रोग / व्याधियों का सम्पूर्ण वन
वन
Vana
वन
प्रौढदावाग्निलीलम्
Praudha-Davagni-Lilam
जो प्रचण्ड दावाग्नि बनकर (समस्त रोगों के वन को) लीलापूर्वक भस्म करते हैं

Complete Translation

ॐ। मैं भगवान धन्वन्तरि को प्रणाम करता हूँ, जो अपने चार सुन्दर हाथों में शंख, चक्र, जलौका (जोंक) और अमृत-कलश धारण करते हैं। उनका मस्तक अति सूक्ष्म, स्वच्छ एवं मनोहर वस्त्र के मुकुट से सुशोभित है और उनके नेत्र कमल के समान हैं। उनका तेजस्वी शरीर श्याम मेघ के समान उज्ज्वल है तथा कटि-प्रदेश सुन्दर पीताम्बर से सुशोभित है। वे समस्त रोगों के वन को भस्म करने वाली प्रचण्ड दावाग्नि की लीला करते हैं।

Origin & History

Source: Traditional Sanskrit dhyana shloka (Ayurvedic / Vaishnava tradition)

Author: Unknown (traditionally recited in Ayurvedic and Vaishnava lineages)

Period: Ancient / Classical

धन्वन्तरि क्षीरसागर (दुग्ध-समुद्र) से समुद्र मन्थन के समय प्रकट हुए, जो देवों और असुरों द्वारा किया गया महान मन्थन था। देवताओं के दिव्य वैद्य रूप में उन्होंने अमरत्व प्रदान करने वाला अमृत-कलश धारण किया। वे विष्णु के अंश-अवतार माने जाते हैं और वह दिव्य स्रोत हैं जिनसे आयुर्वेद, जीवन का विज्ञान, ऋषियों एवं वैद्यों को प्रकट हुआ। यह ध्यान-श्लोक, जो उनकी पूजा के आरम्भिक ध्यान रूप में प्रयुक्त होता है, प्रार्थना से पूर्व भक्त के मन में उनके स्वरूप को स्थिर करता है।

Frequently Asked Questions

भगवान धन्वन्तरि कौन हैं?
धन्वन्तरि दिव्य वैद्य और भगवान विष्णु के अवतार हैं। वे समुद्र मन्थन (क्षीरसागर मन्थन) के समय अमरत्व के अमृत-कलश को लेकर प्रकट हुए। वे आयुर्वेद के प्रवर्तक माने जाते हैं और औषधि एवं उपचार के देवता रूप में पूजित हैं।
धनतेरस पर धन्वन्तरि की पूजा क्यों होती है?
धनतेरस, दीपावली का प्रथम दिन, धन्वन्तरि जयन्ती के रूप में मनाया जाता है — वही दिन जब धन्वन्तरि अमृत-कलश लेकर समुद्र से प्रकट हुए। इस दिन उनकी पूजा से आने वाले वर्ष भर घर में आरोग्य, ओज और रोगों से रक्षा का आशीर्वाद माना जाता है।
धन्वन्तरि अपने हाथों में क्या धारण करते हैं?
इस ध्यान-श्लोक में उन्हें चार हाथों के साथ वर्णित किया गया है, जिनमें शंख, चक्र, जलौका (जोंक, आयुर्वेदिक चिकित्सा का प्रतीक) और अमृत-कलश (अमरत्व का अमृत) धारण किए दर्शाया गया है।
क्या कोई भी धन्वन्तरि स्तोत्रम् का पाठ कर सकता है?
हाँ। यद्यपि यह आयुर्वेदिक चिकित्सकों एवं विद्यार्थियों को विशेष प्रिय है, फिर भी आरोग्य, रोग से उबरने या किसी प्रियजन के कल्याण की कामना रखने वाला कोई भी व्यक्ति श्रद्धा एवं भक्ति से इसका पाठ कर सकता है।

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