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धन्वन्तरि स्तोत्रम्

🕉️ hindu·📿 108× जप·🕐 धनतेरस (धन्वन्तरि जयन्ती), प्रातःकाल, अथवा औषधि/उपचार लेने से पूर्व·📜 Traditional Sanskrit dhyana shloka (Ayurvedic / Vaishnava tradition)

अन्य नाम / खोज: om shankham chakram jalaukam · dhanvantari dhyana shlokam · dhanvantari stotra · vande dhanvantarim

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अर्थ

धन्वन्तरि स्तोत्रम् भगवान धन्वन्तरि का सर्वाधिक प्रसिद्ध ध्यान-श्लोक है। धन्वन्तरि भगवान विष्णु के अवतार और देवताओं के वैद्य हैं, जो समुद्र-मंथन के समय अमृत-कलश लेकर प्रकट हुए थे। यह श्लोक उनके चतुर्भुज स्वरूप का वर्णन करता है जिसमें वे शंख, चक्र, जलौका और अमृत-कलश धारण करते हैं, तथा उन्हें समस्त रोगों के वन को जलाने वाली दावाग्नि कहता है। आरोग्य, चिकित्सा और रोगमुक्ति के लिए, विशेषकर धनतेरस (धन्वन्तरि जयन्ती) पर, इसका पाठ किया जाता है।

उत्पत्ति और कथा

Traditional Sanskrit dhyana shloka (Ayurvedic / Vaishnava tradition) · Unknown (traditionally recited in Ayurvedic and Vaishnava lineages) · Ancient / Classical

धन्वन्तरि क्षीरसागर (दुग्ध-समुद्र) से समुद्र मन्थन के समय प्रकट हुए, जो देवों और असुरों द्वारा किया गया महान मन्थन था। देवताओं के दिव्य वैद्य रूप में उन्होंने अमरत्व प्रदान करने वाला अमृत-कलश धारण किया। वे विष्णु के अंश-अवतार माने जाते हैं और वह दिव्य स्रोत हैं जिनसे आयुर्वेद, जीवन का विज्ञान, ऋषियों एवं वैद्यों को प्रकट हुआ। यह ध्यान-श्लोक, जो उनकी पूजा के आरम्भिक ध्यान रूप में प्रयुक्त होता है, प्रार्थना से पूर्व भक्त के मन में उनके स्वरूप को स्थिर करता है।

शास्त्रों में वर्णित

परम्परागत कथन है कि धन्वन्तरि की श्रद्धापूर्ण पूजा ने असाध्य रोगों को भी ठीक किया है और आयु को बढ़ाया है। आयुर्वेदिक परम्पराएँ बताती हैं कि जिन चिकित्सकों ने धन्वन्तरि का आवाहन कर अपनी चिकित्सा आरम्भ की, उनकी औषधियाँ असाधारण रूप से प्रभावी सिद्ध हुईं — मानो स्वयं भगवान उनके हाथों से इसी श्लोक में वर्णित 'रोगों के वन' को भस्म कर रहे हों।

मंत्र

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शङ्खं चक्रं जलौकां दधदमृतघटं चारुदोर्भिश्चतुर्भिः सूक्ष्मस्वच्छातिहृद्यांशुकपरिविलसन्मौलिमम्भोजनेत्रम्। कालाम्भोदोज्ज्वलाङ्गं कटितटविलसच्चारुपीताम्बराढ्यं वन्दे धन्वन्तरिं तं निखिलगदवनप्रौढदावाग्निलीलम्॥

Om Shankham Chakram Jalaukam Dadhad-Amrita-Ghatam Charu-Dorbhish-Chaturbhih Sukshma-Svacchati-Hridyamshuka-Parivilasan-Maulim-Ambhoja-Netram Kalambhodojjvalangam Kati-Tata-Vilasach-Charu-Pitambar-Adhyam Vande Dhanvantarim Tam Nikhila-Gada-Vana-Praudha-Davagni-Lilam

अर्थ:ॐ। मैं भगवान धन्वन्तरि को प्रणाम करता हूँ, जो अपने चार सुन्दर हाथों में शंख, चक्र, जलौका (जोंक) और अमृत-कलश धारण करते हैं। उनका मस्तक अति सूक्ष्म, स्वच्छ एवं मनोहर वस्त्र के मुकुट से सुशोभित है और उनके नेत्र कमल के समान हैं। उनका तेजस्वी शरीर श्याम मेघ के समान उज्ज्वल है तथा कटि-प्रदेश सुन्दर पीताम्बर से सुशोभित है। वे समस्त रोगों के वन को भस्म करने वाली प्रचण्ड दावाग्नि की लीला करते हैं।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

शङ्खं🔊Shankhamशंख (एक हाथ में धारण किया हुआ)
चक्रं🔊Chakramचक्र (सुदर्शन चक्र)
जलौकां🔊Jalaukamजलौका — जोंक (आयुर्वेदिक रक्तमोक्षण चिकित्सा में प्रयुक्त)
अमृतघटं🔊Amrita-Ghatamअमृत का घट / कलश (अमरत्व का अमृत-कलश)
दधत्🔊Dadhatधारण करते हुए
चारुदोर्भिः चतुर्भिः🔊Charu-Dorbhih Chaturbhihचार सुन्दर भुजाओं के साथ
अंशुक🔊Amshukaसूक्ष्म वस्त्र / देदीप्यमान आवरण
परिविलसत्🔊Parivilasatचारों ओर भव्यता से शोभायमान
मौलिम्🔊Maulimमुकुटयुक्त मस्तक
अम्भोजनेत्रम्🔊Ambhoja-Netramकमल के समान नेत्रों वाले
कालाम्भोद🔊Kalambhodaश्याम मेघ के समान
उज्ज्वलाङ्गं🔊Ujjvalangamदेदीप्यमान, उज्ज्वल शरीर वाले
कटितट🔊Kati-Tataकटि / नितम्ब के चारों ओर
चारुपीताम्बराढ्यं🔊Charu-Pitambar-Adhyamसुन्दर पीताम्बर से सुशोभित
वन्दे🔊Vandeमैं प्रणाम करता हूँ, वन्दना करता हूँ
धन्वन्तरिं🔊Dhanvantarimभगवान धन्वन्तरि को (दिव्य वैद्य)
निखिलगद🔊Nikhila-Gadaसमस्त रोग / व्याधियों का सम्पूर्ण वन
वन🔊Vanaवन
प्रौढदावाग्निलीलम्🔊Praudha-Davagni-Lilamजो प्रचण्ड दावाग्नि बनकर (समस्त रोगों के वन को) लीलापूर्वक भस्म करते हैं

धन्वन्तरि स्तोत्रम् पाठ के लाभ

आरोग्य एवं रोगमुक्ति हेतु दिव्य वैद्य भगवान धन्वन्तरि का आवाहन करता है

आयुर्वेदिक चिकित्सकों एवं विद्यार्थियों द्वारा रोगियों की चिकित्सा या औषधि-अध्ययन से पूर्व परम्परागत रूप से पढ़ा जाता है

शारीरिक व्याधियों के 'वन' को जलाने वाली दावाग्नि की भाँति कार्य करने वाला माना जाता है

मानसिक एवं शारीरिक कल्याण लाता है तथा शरीर की रोग-निवारक शक्ति को सुदृढ़ करता है

विशेषकर धनतेरस (धन्वन्तरि जयन्ती), दीपावली के प्रथम दिन, अत्यन्त शुभ

भक्त को अमृत — ओज एवं अमरत्व के अमृत — के विश्वस्रोत से जोड़ता है

धन्वन्तरि स्तोत्रम् जप विधि

जप संख्या108बार
उत्तम समयधनतेरस (धन्वन्तरि जयन्ती), प्रातःकाल, अथवा औषधि/उपचार लेने से पूर्व

पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके घी का दीप जलाएँ, और भगवान धन्वन्तरि को अमृत-कलश लिए समुद्र से प्रकट होते हुए की कल्पना करें। श्रद्धापूर्वक स्तोत्र का पाठ करें, यथासम्भव 108 बार अथवा 9 के गुणकों में। बहुत-से भक्त इसे धन्वन्तरि मूल मंत्र 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय धन्वन्तरये...' के साथ पढ़ते हैं। रोगी के निमित्त भी इसका पाठ किया जा सकता है, और देवता के समक्ष अर्पित जल बाद में रोगी को प्रसाद रूप में दिया जा सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

धन्वन्तरि दिव्य वैद्य और भगवान विष्णु के अवतार हैं। वे समुद्र मन्थन (क्षीरसागर मन्थन) के समय अमरत्व के अमृत-कलश को लेकर प्रकट हुए। वे आयुर्वेद के प्रवर्तक माने जाते हैं और औषधि एवं उपचार के देवता रूप में पूजित हैं।
धनतेरस, दीपावली का प्रथम दिन, धन्वन्तरि जयन्ती के रूप में मनाया जाता है — वही दिन जब धन्वन्तरि अमृत-कलश लेकर समुद्र से प्रकट हुए। इस दिन उनकी पूजा से आने वाले वर्ष भर घर में आरोग्य, ओज और रोगों से रक्षा का आशीर्वाद माना जाता है।
इस ध्यान-श्लोक में उन्हें चार हाथों के साथ वर्णित किया गया है, जिनमें शंख, चक्र, जलौका (जोंक, आयुर्वेदिक चिकित्सा का प्रतीक) और अमृत-कलश (अमरत्व का अमृत) धारण किए दर्शाया गया है।
हाँ। यद्यपि यह आयुर्वेदिक चिकित्सकों एवं विद्यार्थियों को विशेष प्रिय है, फिर भी आरोग्य, रोग से उबरने या किसी प्रियजन के कल्याण की कामना रखने वाला कोई भी व्यक्ति श्रद्धा एवं भक्ति से इसका पाठ कर सकता है।

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