गणाधिप स्तोत्रम् (गणाधिपताष्टकम्) — Complete Lyrics
गणाधिप स्तोत्रम् (गणाधिपताष्टकम्)
Sanskrit text with English transliteration and translation
Verse 1
श्रियमनपायिनीं प्रदिशतु श्रितकल्पतरुः
शिवतनयः शिरोविधृतशीतमयूखशिशुः ।
सकलसुरासुरादिशरणीकरणीयपदः
करटिमुखः करोतु करुणाजलधिः कुशलम् ॥१॥
śriyam anapāyinīṁ pradiśatu śrita-kalpataruḥ
śiva-tanayaḥ śiro-vidhṛta-śīta-mayūkha-śiśuḥ ।
sakala-surāsurādi-śaraṇī-karaṇīya-padaḥ
karaṭi-mukhaḥ karotu karuṇā-jaladhiḥ kuśalam ॥1॥
शिवपुत्र अक्षय श्री (सम्पत्ति) प्रदान करें — जो शरणागतों के लिए कल्पवृक्ष हैं, जो शीतल किरणों वाले बालचन्द्र को मस्तक पर धारण करते हैं, जिनके चरण समस्त सुर-असुरों के शरण्य हैं; वे करुणा के सागर, गजमुख, हमारा कुशल करें।
Verse 2
द्विरदमुखो धुनोतु दुरितानि दुरन्तमद-
त्रिदशविरोधियूथकुमुदाकरतिग्मकरः ।
कलुषमपाकरोतु कृपया कलभेन्द्रमुखः
कुलगिरिनन्दिनीकुतुकदोहनसंहननः ॥२॥
dvirada-mukho dhunotu duritāni duranta-mada-
tridaśa-virodhi-yūtha-kumudākara-tigma-karaḥ ।
kaluṣam apākarotu kṛpayā kalabhendra-mukhaḥ
kula-giri-nandinī-kutuka-dohana-saṁhananaḥ ॥2॥
गजमुख हमारे पापों को दूर करें — जो दुर्दम मद वाले देवविरोधियों के कुमुद-समूह के लिए प्रचण्ड सूर्य के समान हैं; वे कलभेन्द्रमुख, कुलपर्वत की नन्दिनी (पार्वती) के आलिंगन से उत्पन्न, कृपा से हमारा कलुष धो दें।
Verse 3
गजवदनो धिनोतु धियमाधिपयोधिवल-
त्सुजनमनःप्लवायितपदाम्बुरुहोऽविरतम् ।
दिशतु शतक्रतुप्रभृतिनिर्जरतर्जनकृ-
द्दितिजचमूचमूरुमृगराडिभराजमुखः ॥३॥
gaja-vadano dhinotu dhiyam ādhi-payodhi-vala-
t su-jana-manaḥ-plavāyita-padāmburuho'viratam ।
diśatu śata-kratu-prabhṛti-nirjara-tarjana-kṛ-
d ditija-chamū-chamūru-mṛga-rāḍ ibha-rāja-mukhaḥ ॥3॥
गजवदन हमारी बुद्धि को सदा प्रसन्न एवं समृद्ध करें — जिनके चरणकमल सज्जनों के मन के लिए चिन्ता के समुद्र में नौका के समान हैं; वे इन्द्रादि का तर्जन करने वाले, दैत्यसेना के लिए सिंहमुख के समान गजराजमुख, हमें अभीष्ट प्रदान करें।
Verse 4
अतुलबलोऽतिवेलमघवन्मतिदर्पहर-
स्फुरदहितापकारिमहिमा वपुषीढविधुः ।
निजरदशूलपाशनवशालिशिरोरिगदा-
कुवलयमातुलुङ्गकमलेक्षुशरासकरः ॥४॥
atula-balo'ti-velam aghavan-mati-darpa-hara-
sphurad-ahitāpakāri-mahimā vapuṣīḍha-vidhuḥ ।
nija-rada-śūla-pāśa-nava-śāli-śiro'ri-gadā-
kuvalaya-mātuluṅga-kamalekṣu-śarāsa-karaḥ ॥4॥
जो अतुलबल वाले, दुष्टों के अति मद एवं दर्प को हरने वाले, अहितकारियों के विरुद्ध प्रकाशमान महिमा वाले, चन्द्र को भी आच्छादित करने वाली देहकान्ति वाले हैं — जो अपने हाथों में अपना दाँत, त्रिशूल, पाश, नवीन धान की बाली, शत्रु का कटा शिर, गदा, नीलकमल, मातुलुङ्ग (बिजौरा), कमल एवं इक्षु-धनुष धारण करते हैं।
Verse 5
हरतु विपत्तिमेष भगवान् सकलापदुदार-
श्रवणसुधाधुनीमुदितमानसकैरवकः ।
रचयतु संपदः सपदि देवशिखामणिर-
प्यनुदिनमुन्नतिं वितनुतां वरकुञ्जरवक्त्रः ॥५॥
haratu vipattim eṣa bhagavān sakalāpad-udāra-
śravaṇa-sudhā-dhunī-mudita-mānasa-kairavakaḥ ।
rachayatu saṁpadaḥ sapadi deva-śikhā-maṇir-
apy anu-dinam unnatiṁ vitanutāṁ vara-kuñjara-vaktraḥ ॥5॥
ये भगवान् समस्त विपत्ति हरें — जो प्रत्येक आपत्ति में उदार हैं, जिनका मन भक्तों की स्तुति-रूपी अमृत-धारा से कुमुद के समान खिल उठता है; वे देवशिखामणि, श्रेष्ठ गजमुख, शीघ्र सम्पत्ति रचें और प्रतिदिन उन्नति का विस्तार करें।
Verse 6
जगति विभूतयः सकलसिद्धिविधायि-गणा-
धिपपदपङ्कजस्मरणमात्रत एव नृणाम् ।
प्रभवति यस्य तस्य परमेश्वरमेकमजं
शरणमुपास्महे जगति सर्वहितैकपरम् ॥६॥
jagati vibhūtayaḥ sakala-siddhi-vidhāyi-gaṇā-
dhipa-pada-paṅkaja-smaraṇa-mātrata eva nṛṇām ।
prabhavati yasya tasya parameśvaram ekam ajaṁ
śaraṇam upāsmahe jagati sarva-hitaika-param ॥6॥
जिस मनुष्य के लिए केवल समस्त सिद्धियों के दाता गणाधिप के चरणकमल के स्मरणमात्र से जगत् की समस्त विभूतियाँ प्रकट हो जाती हैं — उस एकमात्र अज परमेश्वर की, जो जगत् के सर्वहित में तत्पर हैं, हम शरण रूप में उपासना करते हैं।
Verse 7
पठतु गणाधिपाष्टकमिदं सुजनोऽनुदिनं
कठिनशुचाकुठावलिकठोरकुठारवरम् ।
विमतपराभवोद्भटनिदाघनवीनघनं
विमलवचोविलासकमलाकरबालरविम् ॥७॥
paṭhatu gaṇādhipāṣṭakam idaṁ su-jano'nudinaṁ
kaṭhina-śuchā-kuṭhāvali-kaṭhora-kuṭhāra-varam ।
vimata-parābhavod-bhaṭa-nidāgha-navīna-ghanaṁ
vimala-vacho-vilāsa-kamalākara-bāla-ravim ॥7॥
सज्जन प्रतिदिन इस गणाधिपाष्टक का पाठ करें — जो कठिन शोक की सघन झाड़ी के लिए तीक्ष्ण कुठार (कुल्हाड़ा) है, शत्रुओं की पराजय रूपी प्रचण्ड ग्रीष्म के लिए नवीन मेघ है, तथा निर्मल वाणी के विलास रूपी कमल-सरोवर के लिए बालसूर्य है।
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