गणाधिप स्तोत्रम् (गणाधिपताष्टकम्)
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✦ अर्थ
गणाधिप स्तोत्रम्, जिसे गणाधिपताष्टकम् भी कहा जाता है, गणेश की स्तुति में आठ श्लोकों का अत्यन्त काव्यमय स्तोत्र है, जो परम्परा में आदि शंकराचार्य को आरोपित है। प्रत्येक श्लोक गजमुख प्रभु — शिवपुत्र, करुणासागर, कल्पवृक्ष — से अक्षय सम्पत्ति, पापनाश, बुद्धि की प्रसन्नता, विपत्ति-हरण एवं ऐश्वर्य की प्रार्थना करता है। अन्तिम श्लोक स्वयं इस स्तोत्र को कठिन शोक को काटने वाला कुठार एवं निर्मल वाणी के कमल को खिलाने वाला बालसूर्य बताता है।
उत्पत्ति और कथा
Traditional Sanskrit stotra (Ganadhipati Ashtakam), attributed to Adi Shankaracharya · Attributed to Adi Shankaracharya · Classical (traditionally 8th century CE)
यह अष्टकम् आदि शंकराचार्य को आरोपित भक्ति-स्तोत्रों की समृद्ध परम्परा का अंग है, जिनके विषय में कहा जाता है कि उन्होंने प्रत्येक प्रमुख देवता की त्रुटिहीन संस्कृत श्लोकों में स्तुति की। अलंकार एवं अनुप्रास से सघन एक अलंकृत छन्द में रचित यह गणेश को शिवपुत्र एवं गणों के नायक — गजमुख करुणासागर — रूप में चित्रित करता है, जो अपने स्मरणमात्र से भक्तों पर समृद्धि, बुद्धि एवं रक्षा की वर्षा करते हैं, और जो अपने अनेक हाथों में अपनी प्रभुता के चिह्न धारण करते हैं।
✦ शास्त्रों में वर्णित
छठा श्लोक स्तोत्र के केन्द्रीय वचन को कहता है: भक्त के लिए गणाधिप के चरणकमल के स्मरणमात्र (स्मरण-मात्र) से जगत् की समस्त विभूतियाँ एवं सिद्धियाँ स्वयमेव प्रकट हो जाती हैं — क्योंकि वे एकमात्र अज परमेश्वर हैं, जो सदा सबके कल्याण में तत्पर हैं।
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श्रियमनपायिनीं प्रदिशतु श्रितकल्पतरुः शिवतनयः शिरोविधृतशीतमयूखशिशुः । सकलसुरासुरादिशरणीकरणीयपदः करटिमुखः करोतु करुणाजलधिः कुशलम् ॥१॥
śriyam anapāyinīṁ pradiśatu śrita-kalpataruḥ śiva-tanayaḥ śiro-vidhṛta-śīta-mayūkha-śiśuḥ । sakala-surāsurādi-śaraṇī-karaṇīya-padaḥ karaṭi-mukhaḥ karotu karuṇā-jaladhiḥ kuśalam ॥1॥
अर्थ:शिवपुत्र अक्षय श्री (सम्पत्ति) प्रदान करें — जो शरणागतों के लिए कल्पवृक्ष हैं, जो शीतल किरणों वाले बालचन्द्र को मस्तक पर धारण करते हैं, जिनके चरण समस्त सुर-असुरों के शरण्य हैं; वे करुणा के सागर, गजमुख, हमारा कुशल करें।
द्विरदमुखो धुनोतु दुरितानि दुरन्तमद- त्रिदशविरोधियूथकुमुदाकरतिग्मकरः । कलुषमपाकरोतु कृपया कलभेन्द्रमुखः कुलगिरिनन्दिनीकुतुकदोहनसंहननः ॥२॥
dvirada-mukho dhunotu duritāni duranta-mada- tridaśa-virodhi-yūtha-kumudākara-tigma-karaḥ । kaluṣam apākarotu kṛpayā kalabhendra-mukhaḥ kula-giri-nandinī-kutuka-dohana-saṁhananaḥ ॥2॥
अर्थ:गजमुख हमारे पापों को दूर करें — जो दुर्दम मद वाले देवविरोधियों के कुमुद-समूह के लिए प्रचण्ड सूर्य के समान हैं; वे कलभेन्द्रमुख, कुलपर्वत की नन्दिनी (पार्वती) के आलिंगन से उत्पन्न, कृपा से हमारा कलुष धो दें।
गजवदनो धिनोतु धियमाधिपयोधिवल- त्सुजनमनःप्लवायितपदाम्बुरुहोऽविरतम् । दिशतु शतक्रतुप्रभृतिनिर्जरतर्जनकृ- द्दितिजचमूचमूरुमृगराडिभराजमुखः ॥३॥
gaja-vadano dhinotu dhiyam ādhi-payodhi-vala- t su-jana-manaḥ-plavāyita-padāmburuho'viratam । diśatu śata-kratu-prabhṛti-nirjara-tarjana-kṛ- d ditija-chamū-chamūru-mṛga-rāḍ ibha-rāja-mukhaḥ ॥3॥
अर्थ:गजवदन हमारी बुद्धि को सदा प्रसन्न एवं समृद्ध करें — जिनके चरणकमल सज्जनों के मन के लिए चिन्ता के समुद्र में नौका के समान हैं; वे इन्द्रादि का तर्जन करने वाले, दैत्यसेना के लिए सिंहमुख के समान गजराजमुख, हमें अभीष्ट प्रदान करें।
अतुलबलोऽतिवेलमघवन्मतिदर्पहर- स्फुरदहितापकारिमहिमा वपुषीढविधुः । निजरदशूलपाशनवशालिशिरोरिगदा- कुवलयमातुलुङ्गकमलेक्षुशरासकरः ॥४॥
atula-balo'ti-velam aghavan-mati-darpa-hara- sphurad-ahitāpakāri-mahimā vapuṣīḍha-vidhuḥ । nija-rada-śūla-pāśa-nava-śāli-śiro'ri-gadā- kuvalaya-mātuluṅga-kamalekṣu-śarāsa-karaḥ ॥4॥
अर्थ:जो अतुलबल वाले, दुष्टों के अति मद एवं दर्प को हरने वाले, अहितकारियों के विरुद्ध प्रकाशमान महिमा वाले, चन्द्र को भी आच्छादित करने वाली देहकान्ति वाले हैं — जो अपने हाथों में अपना दाँत, त्रिशूल, पाश, नवीन धान की बाली, शत्रु का कटा शिर, गदा, नीलकमल, मातुलुङ्ग (बिजौरा), कमल एवं इक्षु-धनुष धारण करते हैं।
हरतु विपत्तिमेष भगवान् सकलापदुदार- श्रवणसुधाधुनीमुदितमानसकैरवकः । रचयतु संपदः सपदि देवशिखामणिर- प्यनुदिनमुन्नतिं वितनुतां वरकुञ्जरवक्त्रः ॥५॥
haratu vipattim eṣa bhagavān sakalāpad-udāra- śravaṇa-sudhā-dhunī-mudita-mānasa-kairavakaḥ । rachayatu saṁpadaḥ sapadi deva-śikhā-maṇir- apy anu-dinam unnatiṁ vitanutāṁ vara-kuñjara-vaktraḥ ॥5॥
अर्थ:ये भगवान् समस्त विपत्ति हरें — जो प्रत्येक आपत्ति में उदार हैं, जिनका मन भक्तों की स्तुति-रूपी अमृत-धारा से कुमुद के समान खिल उठता है; वे देवशिखामणि, श्रेष्ठ गजमुख, शीघ्र सम्पत्ति रचें और प्रतिदिन उन्नति का विस्तार करें।
जगति विभूतयः सकलसिद्धिविधायि-गणा- धिपपदपङ्कजस्मरणमात्रत एव नृणाम् । प्रभवति यस्य तस्य परमेश्वरमेकमजं शरणमुपास्महे जगति सर्वहितैकपरम् ॥६॥
jagati vibhūtayaḥ sakala-siddhi-vidhāyi-gaṇā- dhipa-pada-paṅkaja-smaraṇa-mātrata eva nṛṇām । prabhavati yasya tasya parameśvaram ekam ajaṁ śaraṇam upāsmahe jagati sarva-hitaika-param ॥6॥
अर्थ:जिस मनुष्य के लिए केवल समस्त सिद्धियों के दाता गणाधिप के चरणकमल के स्मरणमात्र से जगत् की समस्त विभूतियाँ प्रकट हो जाती हैं — उस एकमात्र अज परमेश्वर की, जो जगत् के सर्वहित में तत्पर हैं, हम शरण रूप में उपासना करते हैं।
पठतु गणाधिपाष्टकमिदं सुजनोऽनुदिनं कठिनशुचाकुठावलिकठोरकुठारवरम् । विमतपराभवोद्भटनिदाघनवीनघनं विमलवचोविलासकमलाकरबालरविम् ॥७॥
paṭhatu gaṇādhipāṣṭakam idaṁ su-jano'nudinaṁ kaṭhina-śuchā-kuṭhāvali-kaṭhora-kuṭhāra-varam । vimata-parābhavod-bhaṭa-nidāgha-navīna-ghanaṁ vimala-vacho-vilāsa-kamalākara-bāla-ravim ॥7॥
अर्थ:सज्जन प्रतिदिन इस गणाधिपाष्टक का पाठ करें — जो कठिन शोक की सघन झाड़ी के लिए तीक्ष्ण कुठार (कुल्हाड़ा) है, शत्रुओं की पराजय रूपी प्रचण्ड ग्रीष्म के लिए नवीन मेघ है, तथा निर्मल वाणी के विलास रूपी कमल-सरोवर के लिए बालसूर्य है।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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गणाधिप स्तोत्रम् (गणाधिपताष्टकम्) पाठ के लाभ
'श्रियम् अनपायिनीम्' — अक्षय, कभी न जाने वाली समृद्धि एवं लक्ष्मी की कृपा की प्रार्थना करता है
प्रत्येक श्लोक एक भिन्न आशीष माँगता है: कुशल, पापनाश, उज्ज्वल बुद्धि, विपत्ति-हरण एवं धन की वृद्धि
परम्परा में आदि शंकराचार्य को आरोपित एवं अपनी सघन, सुन्दर काव्यकला हेतु प्रशंसित
गणेश की करुणा द्वारा विघ्न एवं विपत्ति (विपत्ति) को दूर करता है
गणाधिप के चरणकमल का स्मरणमात्र भक्त को समस्त विभूतियाँ देता है, ऐसा (छठा श्लोक) कहता है
वाणी एवं वाक्पटुता को तीक्ष्ण करता है — अन्तिम श्लोक स्तोत्र को निर्मल वाणी के कमल को खिलाने वाले सूर्य की उपमा देता है
समृद्धि, रक्षा एवं मन की निर्मलता हेतु दैनिक पाठ के लिए उपयुक्त
गणाधिप स्तोत्रम् (गणाधिपताष्टकम्) जप विधि
गणेश की प्रतिमा के सम्मुख बैठें, दीपक जलाएँ एवं दूर्वा, लाल पुष्प तथा मोदक अर्पित करें। आठों श्लोकों का भक्ति एवं उनके बिम्बों पर ध्यान देते हुए पाठ करें, प्रत्येक प्रार्थित आशीष — समृद्धि, पापमुक्ति, निर्मल बुद्धि, विपत्ति-हरण एवं धन-वृद्धि — पर मन को टिकाते हुए। जैसा अन्तिम श्लोक उपदेश देता है, सज्जन भक्त को यह गणाधिपाष्टक प्रतिदिन पढ़ना चाहिए; अन्त में गणाधिप को प्रणाम करके समापन करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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