गतं शोको न कर्तव्यो — Word-by-Word Meaning
गतं शोको न कर्तव्यो
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
गतम्
gatam
जो बीत गया, अतीत
शोकः
śokaḥ
शोक, दुःख, विलाप
न कर्तव्यः
na kartavyaḥ
नहीं करना चाहिए / नहीं (शोक) करना चाहिए
भविष्यम्
bhaviṣyam
भविष्य, जो अभी आना है
न एव
na eva
बिल्कुल नहीं, कभी नहीं
चिन्तयेत्
cintayet
चिन्ता करनी चाहिए / सोचते रहना चाहिए
वर्तमानेन
vartamānena
वर्तमान के साथ
कालेन
kālena
काल, समय
वर्तयन्ति
vartayanti
जीते हैं, चलते रहते हैं, अपना जीवन व्यतीत करते हैं
विचक्षणाः
vicakṣaṇāḥ
बुद्धिमान, विवेकी, दूरदर्शी
Complete Translation
जो बीत गया उसका शोक नहीं करना चाहिए, और जो आने वाला है उसकी चिन्ता भी नहीं करनी चाहिए; बुद्धिमान लोग केवल वर्तमान काल में ही अपना जीवन व्यतीत करते हैं। चाणक्य स्थिर मन का रहस्य सिखाते हैं — बीते हुए का पश्चाताप और आने वाले की चिन्ता छोड़कर जीवन के वर्तमान क्षण में पूर्णतया कर्म करना।
Origin & History
Source: Chanakya Niti
Author: Chanakya (Vishnugupta / Kautilya)
Period: Ancient India (c. 4th–3rd century BCE)
चाणक्य, जिनकी सलाह ने एक साम्राज्य खड़ा किया, जानते थे कि महान् कार्यों के लिए पश्चाताप या भय से अनाच्छादित मन चाहिए। यह श्लोक उसी व्यावहारिक ज्ञान को व्यक्त करता है: वे विचक्षण — दूरदर्शी — को ऐसा बताते हैं जो न अतीत का शोक करते हैं और न भविष्य से डरते हैं, अपितु स्वयं को पूर्णतया वर्तमान को समर्पित कर देते हैं, और इस प्रकार स्पष्टता और शान्ति से कर्म करते हैं।
Frequently Asked Questions
'गतं शोको न कर्तव्यः' कहाँ से आया है?▼
यह चाणक्य नीति (नीति दर्पण) का एक प्रसिद्ध श्लोक है, जो चाणक्य (कौटिल्य / विष्णुगुप्त) — नीति, राजनीति और व्यावहारिक ज्ञान के प्राचीन भारतीय आचार्य — को आरोपित सूक्तियों का संग्रह है।
इस श्लोक की केन्द्रीय शिक्षा क्या है?▼
कि बुद्धिमान न तो अतीत का शोक करते हैं और न भविष्य की चिन्ता, अपितु वर्तमान में पूर्णतया जीते हैं। पश्चाताप और चिन्ता को त्यागकर मनुष्य अपने मन को स्वच्छ और स्थिर रखता है, जो शान्ति और प्रभावी कर्म दोनों का आधार है।
यह श्लोक दैनिक जीवन में कैसे उपयोगी है?▼
यह अति-विचार का एक संक्षिप्त उपचार है। जब मन पुराने दुःखों या भविष्य के भयों में खिंच जाता है, तब इस श्लोक का स्मरण ध्यान को वर्तमान में वापस लाने में सहायता करता है, जहाँ ही जीवन वास्तव में जिया जा सकता है और उचित कर्म किया जा सकता है।
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