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गतं शोको न कर्तव्यो

🕉️ hindu·📿 3× जप·🕐 प्रातःकालीन चिन्तन में, अथवा जब भी मन पश्चाताप या चिन्ता में फँसा हो·📜 Chanakya Niti

अन्य नाम / खोज: gatam shoko na kartavyah · gata shoko na kartavyo · bhavishyam naiva chintayet · vartamanena kalena vartayanti vichakshanah · chanakya live in the present verse

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अर्थ

चाणक्य नीति का यह अत्यन्त प्रिय श्लोक शान्ति की कला को एक पंक्ति में समेट देता है — बीते का शोक मत करो, भविष्य की चिन्ता मत करो, क्योंकि बुद्धिमान वर्तमान में जीते हैं। यह समता एवं मनःस्थिरता की एक कालजयी सूक्ति बन गया है, जो सिखाता है कि सार्थक एवं शान्त जीवन उन्हीं का है जो वर्तमान क्षण को पूर्णतया समर्पित होते हैं।

उत्पत्ति और कथा

Chanakya Niti · Chanakya (Vishnugupta / Kautilya) · Ancient India (c. 4th–3rd century BCE)

चाणक्य, जिनकी सलाह ने एक साम्राज्य खड़ा किया, जानते थे कि महान् कार्यों के लिए पश्चाताप या भय से अनाच्छादित मन चाहिए। यह श्लोक उसी व्यावहारिक ज्ञान को व्यक्त करता है: वे विचक्षण — दूरदर्शी — को ऐसा बताते हैं जो न अतीत का शोक करते हैं और न भविष्य से डरते हैं, अपितु स्वयं को पूर्णतया वर्तमान को समर्पित कर देते हैं, और इस प्रकार स्पष्टता और शान्ति से कर्म करते हैं।

शास्त्रों में वर्णित

विद्वान कहते हैं कि इस एक श्लोक में डूबते हुए हृदय को तत्काल उठा देने की शक्ति है, क्योंकि जिस क्षण मनुष्य सचमुच अतीत का शोक और भविष्य का भय छोड़ देता है, उसी क्षण मन का बोझ गिर जाता है और केवल स्वच्छ, कर्मयोग्य वर्तमान शेष रह जाता है।

मंत्र

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गतं शोको कर्तव्यो भविष्यं नैव चिन्तयेत्। वर्तमानेन कालेन वर्तयन्ति विचक्षणाः॥

gataṁ śoko na kartavyo bhaviṣyaṁ naiva cintayet। vartamānena kālena vartayanti vicakṣaṇāḥ॥

अर्थ:जो बीत गया उसका शोक नहीं करना चाहिए, और जो आने वाला है उसकी चिन्ता भी नहीं करनी चाहिए; बुद्धिमान लोग केवल वर्तमान काल में ही अपना जीवन व्यतीत करते हैं। चाणक्य स्थिर मन का रहस्य सिखाते हैं — बीते हुए का पश्चाताप और आने वाले की चिन्ता छोड़कर जीवन के वर्तमान क्षण में पूर्णतया कर्म करना।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

गतम्🔊gatamजो बीत गया, अतीत
शोकः🔊śokaḥशोक, दुःख, विलाप
न कर्तव्यः🔊na kartavyaḥनहीं करना चाहिए / नहीं (शोक) करना चाहिए
भविष्यम्🔊bhaviṣyamभविष्य, जो अभी आना है
न एव🔊na evaबिल्कुल नहीं, कभी नहीं
चिन्तयेत्🔊cintayetचिन्ता करनी चाहिए / सोचते रहना चाहिए
वर्तमानेन🔊vartamānenaवर्तमान के साथ
कालेन🔊kālenaकाल, समय
वर्तयन्ति🔊vartayantiजीते हैं, चलते रहते हैं, अपना जीवन व्यतीत करते हैं
विचक्षणाः🔊vicakṣaṇāḥबुद्धिमान, विवेकी, दूरदर्शी

गतं शोको न कर्तव्यो पाठ के लाभ

पश्चाताप और चिन्ता को त्यागकर समता का विकास करता है

मन को वर्तमान क्षण में जीने और कर्म करने का अभ्यास कराता है

अतीत के शोक और भविष्य की चिन्ता को कम करता है

शान्त, स्पष्ट और प्रभावी कर्म को प्रोत्साहित करता है

तनाव, अति-विचार और बेचैनी के लिए एक सशक्त सहायक

दैनिक सजगता और चिन्तन के लिए एक छोटा, स्मरणीय श्लोक

गतं शोको न कर्तव्यो जप विधि

जप संख्या3बार
उत्तम समयप्रातःकालीन चिन्तन में, अथवा जब भी मन पश्चाताप या चिन्ता में फँसा हो

श्लोक को धीरे-धीरे बोलें और प्रत्येक चरण को मन की पकड़ ढीली करने दें: जो बीत गया वह गया — शोक छोड़ें; भविष्य अभी नहीं है — चिन्ता रख दें; बुद्धिमान अभी जीते हैं — वर्तमान में लौट आएँ। श्वास लें और ध्यान को वर्तमान क्षण में टिकाएँ। यह परम्परागत रूप से चाणक्य की स्थिर मन की शिक्षाओं में अध्ययन किया जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यह चाणक्य नीति (नीति दर्पण) का एक प्रसिद्ध श्लोक है, जो चाणक्य (कौटिल्य / विष्णुगुप्त) — नीति, राजनीति और व्यावहारिक ज्ञान के प्राचीन भारतीय आचार्य — को आरोपित सूक्तियों का संग्रह है।
कि बुद्धिमान न तो अतीत का शोक करते हैं और न भविष्य की चिन्ता, अपितु वर्तमान में पूर्णतया जीते हैं। पश्चाताप और चिन्ता को त्यागकर मनुष्य अपने मन को स्वच्छ और स्थिर रखता है, जो शान्ति और प्रभावी कर्म दोनों का आधार है।
यह अति-विचार का एक संक्षिप्त उपचार है। जब मन पुराने दुःखों या भविष्य के भयों में खिंच जाता है, तब इस श्लोक का स्मरण ध्यान को वर्तमान में वापस लाने में सहायता करता है, जहाँ ही जीवन वास्तव में जिया जा सकता है और उचित कर्म किया जा सकता है।

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